तेलंगाना के हजार स्तंभ मंदिर में द्वारपाल मूर्तियों का संरक्षण शुरू, ASI ने अपनाई पारंपरिक तकनीक

तेलंगाना के हनुमाकोंडा स्थित हजार स्तंभ मंदिर में ASI ने द्वारपाल मूर्तियों का संरक्षण शुरू किया। मूल पत्थर से मेल खाते रंग, बनावट और सामग्री का इस्तेमाल होगा।

तेलंगाना के हनुमाकोंडा स्थित हजार स्तंभ मंदिर में ASI ने द्वारपाल मूर्तियों के संरक्षण और पुनर्स्थापना का काम शुरू किया है। इसमें पारंपरिक आइकोनोमेट्री और आइकोनोग्राफी के सिद्धांत अपनाए जा रहे हैं तथा मूल पत्थर से मेल खाती सामग्री का इस्तेमाल होगा।

हनुमाकोंडा: तेलंगाना के ऐतिहासिक हनुमाकोंडा स्थित हजार स्तंभ मंदिर (Thousand Pillar Temple) में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने प्राचीन द्वारपाल मूर्तियों के संरक्षण और पुनर्स्थापना का काम शुरू किया है। ASI के हैदराबाद सर्कल ने सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को इस महत्वपूर्ण संरक्षण परियोजना की शुरुआत की। यह पहल मंदिर की ऐतिहासिक और मूर्तिकला विरासत को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से की जा रही है। संरक्षण कार्य में इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि मूर्तियों की मूल संरचना, अनुपात, मुद्रा और कलात्मक विशेषताओं में अनावश्यक बदलाव न हो।

अधिकारियों के अनुसार, जहां मूर्तियों के किसी हिस्से को जोड़ने या बदलने की आवश्यकता होगी, वहां मूल पत्थर से मेल खाने वाले पत्थर का ही इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए रंग, बनावट, दानेदार संरचना और भौतिक गुणों को ध्यान में रखकर उपयुक्त पत्थर चुना जा रहा है।

हजार स्तंभ मंदिर क्यों है महत्वपूर्ण?

हजार स्तंभ मंदिर तेलंगाना के प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों में शामिल है। यह हनुमाकोंडा में स्थित है और दक्षिण भारत की मध्यकालीन मंदिर वास्तुकला तथा शिल्पकला की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है।

मंदिर का निर्माण काकतीय काल से जुड़ा माना जाता है। इसकी वास्तुकला में पत्थर पर की गई बारीक नक्काशी, स्तंभों की विशिष्ट संरचना और विभिन्न देवी-देवताओं से संबंधित मूर्तिकला देखने को मिलती है।

मंदिर परिसर में मौजूद मूर्तियां और स्थापत्य तत्व उस दौर की शिल्प तकनीक, धार्मिक मान्यताओं और कलात्मक दृष्टिकोण की जानकारी देते हैं। इसलिए यहां किसी भी संरक्षण कार्य का उद्देश्य केवल क्षतिग्रस्त हिस्सों को ठीक करना नहीं, बल्कि मूल विरासत को यथासंभव सुरक्षित रखना भी है।

द्वारपाल मूर्तियों का संरक्षण क्यों जरूरी?

द्वारपाल या द्वारपालक मंदिरों के प्रवेश द्वार से जुड़े महत्वपूर्ण शिल्प तत्व होते हैं। भारतीय मंदिर वास्तुकला में इन्हें अक्सर मंदिर की सुरक्षा और धार्मिक प्रतीकवाद से जोड़ा जाता है।

हजार स्तंभ मंदिर की द्वारपाल मूर्तियां भी इसके स्थापत्य और मूर्तिकला स्वरूप का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समय के साथ मौसम, नमी, प्रदूषण, प्राकृतिक क्षरण और अन्य पर्यावरणीय प्रभावों के कारण ऐतिहासिक पत्थर की मूर्तियों को नुकसान पहुंच सकता है।

ऐसे में संरक्षण का लक्ष्य मूर्तियों को नया रूप देना नहीं, बल्कि उनके मौजूदा ऐतिहासिक स्वरूप को स्थिर करना और क्षतिग्रस्त हिस्सों को वैज्ञानिक एवं पारंपरिक सिद्धांतों के अनुरूप सुरक्षित करना होता है।

पारंपरिक आइकोनोमेट्री और आइकोनोग्राफी का इस्तेमाल

ASI के अधिकारियों के अनुसार, द्वारपाल मूर्तियों के संरक्षण में पारंपरिक आइकोनोमेट्री (iconometry) और आइकोनोग्राफी (iconography) के सिद्धांतों का पालन किया जा रहा है।

आइकोनोमेट्री का संबंध मूर्ति के अनुपात और माप से है, जबकि आइकोनोग्राफी किसी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतिमा के स्वरूप, प्रतीकों, मुद्रा और विशेषताओं को समझने से संबंधित है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संरक्षण के दौरान मूर्ति के मूल अनुपात और पहचान से जुड़े तत्वों में बदलाव न आए। उदाहरण के लिए, शरीर की मुद्रा, हाथों की स्थिति, आयुध या अन्य प्रतीकात्मक विशेषताओं को ऐतिहासिक शैली के अनुरूप बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

यह दृष्टिकोण आधुनिक संरक्षण विज्ञान और पारंपरिक शिल्प ज्ञान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।

मूल पत्थर से मेल खाएगा नया पत्थर

संरक्षण परियोजना की एक अहम विशेषता पत्थर के चयन से जुड़ी है। अधिकारियों के अनुसार, जहां किसी क्षतिग्रस्त हिस्से को बदलने या उसकी मरम्मत की जरूरत होगी, वहां ऐसा पत्थर चुना जाएगा जो मूल पत्थर से अधिकतम संभव रूप से मेल खाता हो।

इसके लिए पत्थर के कई गुणों की तुलना की जाएगी। इनमें उसका रंग, बनावट, दानेदार संरचना और भौतिक विशेषताएं शामिल हैं।

नए पत्थर को भी सावधानी से तराशा और तैयार किया जाएगा, ताकि वह मौजूदा मूर्ति के साथ सहज रूप से जुड़ सके। संरक्षण का उद्देश्य नया और पुराना हिस्सा इस तरह जोड़ना है कि मूर्ति की ऐतिहासिक पहचान और संरचनात्मक अखंडता बनी रहे।

संरक्षण में ऐतिहासिक स्वरूप को प्राथमिकता

ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत करते समय मूल कलाकृति की पहचान प्रभावित न हो। यदि नए हिस्से को आधुनिक शैली में बनाया जाए, तो वह मूल मूर्ति की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को नुकसान पहुंचा सकता है।

हजार स्तंभ मंदिर में चल रहे कार्य में इसी कारण पारंपरिक अनुपात और शैली को प्राथमिकता दी जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, मूर्तियों की मूल मुद्रा, अनुपात और कलात्मक चरित्र को बनाए रखना संरक्षण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस तरह की सावधानी यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है कि आने वाली पीढ़ियां मंदिर की मूर्तियों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझ और देख सकें।

ASI की संरक्षण भूमिका

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देश के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्मारकों और सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाली प्रमुख संस्था है। ऐसे संरक्षण कार्यों में संरचनात्मक स्थिरता के साथ-साथ मूर्तियों और सजावटी स्थापत्य तत्वों की सुरक्षा भी शामिल होती है।

हजार स्तंभ मंदिर में द्वारपाल संरक्षण परियोजना इसी व्यापक विरासत संरक्षण प्रयास का हिस्सा है। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मंदिर दक्षिण भारत की मध्यकालीन वास्तुकला और शिल्प परंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है।

पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी महत्वपूर्ण

हजार स्तंभ मंदिर तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मंदिर की स्थापत्य विशेषताएं देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।

मूर्तियों का संरक्षण न केवल ऐतिहासिक संपदा को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है, बल्कि इससे सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है। बेहतर संरक्षण के जरिए पर्यटक मंदिर के मूल शिल्प और स्थापत्य को अधिक स्पष्ट रूप से देख सकेंगे।

ऐतिहासिक स्मारकों का संरक्षण किसी एक पीढ़ी की जिम्मेदारी नहीं है। पत्थर की मूर्तियों और स्थापत्य तत्वों में सदियों पुरानी तकनीक और सांस्कृतिक स्मृतियां दर्ज होती हैं। इसलिए वैज्ञानिक तरीके से किया गया संरक्षण इन्हें भविष्य के लिए सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आगे भी जारी रहेगा संरक्षण प्रयास

हजार स्तंभ मंदिर में शुरू किया गया द्वारपाल संरक्षण कार्य इस ऐतिहासिक परिसर की मूर्तिकला विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ASI का प्रयास है कि संरक्षण के दौरान मूल स्वरूप और ऐतिहासिक प्रामाणिकता से समझौता न हो।

पत्थर के चयन से लेकर मूर्तियों के अनुपात और मुद्रा तक, प्रत्येक चरण में सावधानी बरतने का उद्देश्य यही है कि मरम्मत के बाद भी द्वारपाल मूर्तियां मंदिर की मूल वास्तुशिल्प शैली के अनुरूप दिखाई दें।

ऐसे संरक्षण प्रयास भारत की प्राचीन स्थापत्य और मूर्तिकला परंपरा को सुरक्षित रखने के साथ वैश्विक स्तर पर देश की सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

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