विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र प्रभावी फैसले लेने में काफी हद तक विफल रहा है और इस समय वैश्विक संस्था गतिरोध की स्थिति में है।
S. Jaishankar on UN Reform: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में व्यापक सुधार की जरूरत को एक बार फिर रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था कई बड़े अंतरराष्ट्रीय संकटों पर प्रभावी निर्णय लेने में कठिनाई का सामना कर रही है। जयशंकर के मुताबिक, दुनिया तेजी से बदलकर अधिक बहुध्रुवीय और आपस में जुड़ी हुई हो चुकी है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र का संस्थागत ढांचा अभी भी पुराने समय की वास्तविकताओं के अनुरूप काम कर रहा है।
दिल्ली में आयोजित एक कॉन्क्लेव में बोलते हुए विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की मौजूदा संरचना, अफ्रीका के प्रतिनिधित्व, अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था और वैश्विक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज योंग बून येओ भी मौजूद थे।
बड़े वैश्विक संकटों पर UN की भूमिका पर सवाल
जयशंकर ने कहा कि दुनिया कई गंभीर संकटों से गुजर रही है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की निर्णय लेने की प्रक्रिया कई बार गतिरोध का शिकार हो जाती है। उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में वैश्विक संस्था की प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
उनके अनुसार, अफ्रीका से जुड़े कई मुद्दों और कोविड-19 महामारी जैसे वैश्विक संकटों के दौरान भी संयुक्त राष्ट्र की भूमिका अपेक्षित स्तर तक प्रभावी नहीं रही। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इसका समाधान संयुक्त राष्ट्र को कमजोर करना या उसे दरकिनार करना नहीं है। इसके बजाय संस्था को बदलती दुनिया के अनुरूप मजबूत और अधिक प्रतिनिधित्वकारी बनाने की जरूरत है।
UNSC का मौजूदा ढांचा क्यों चर्चा में है?

विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना को लेकर कहा कि यह आज की वैश्विक वास्तविकताओं का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करती। दुनिया में नए आर्थिक और राजनीतिक शक्ति केंद्र उभरे हैं और कई क्षेत्र वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी चाहते हैं। जयशंकर का तर्क है कि यदि वैश्विक समुदाय की संरचना बदल चुकी है तो निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी उसी के अनुरूप बदलाव होना चाहिए। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार के बिना संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता से जुड़े सवाल बने रहेंगे।
UN के सदस्य बढ़े, लेकिन संस्थागत ढांचा पुराना
जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना और उसके मौजूदा स्वरूप के बीच अंतर को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जब संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में आया था, तब इसमें करीब 51 सदस्य देश थे। आज सदस्य देशों की संख्या चार गुने के करीब पहुंच चुकी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब संस्था का सदस्य आधार इतना बदल गया है तो उसके प्रबंधन और निर्णय लेने की पुरानी संरचना को लंबे समय तक बनाए रखना कितना व्यावहारिक है। उनके मुताबिक, सुधार का मुद्दा अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस पर ठोस प्रगति की आवश्यकता है।
सुधार के विरोध पर क्या बोले जयशंकर?
विदेश मंत्री ने किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि कुछ देश संयुक्त राष्ट्र में सुधार की प्रक्रिया के खिलाफ हैं। उन्होंने बताया कि सुधार के विरोध में अफ्रीका और उसके हितों से जुड़े तर्क दिए जाते हैं। हालांकि, जयशंकर के अनुसार अफ्रीकी देश और उनका प्रतिनिधित्व करने वाले समूह अंतर-सरकारी वार्ताओं में अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर चुके हैं। इसलिए अफ्रीका के हितों का हवाला देकर सुधार प्रक्रिया को रोकना उचित नहीं माना जा सकता।
जयशंकर ने जोर दिया कि दुनिया को यह तय करना होगा कि मौजूदा कमियों के कारण संयुक्त राष्ट्र को नजरअंदाज किया जाए या उसे अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुधार किया जाए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संयुक्त राष्ट्र की जरूरत बनी रहेगी। उनके मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र ने दशकों से वैश्विक समुदाय की सेवा की है और इसे खत्म करने या समानांतर व्यवस्था बनाने के बजाय मौजूदा संस्था को बेहतर बनाना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है।











