उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी पारा तेजी से चढ़ रहा है। एक ओर जहां Bharatiya Janata Party और Samajwadi Party के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है, वहीं अब ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की एंट्री ने राज्य की सियासत में नया मोड़ ला दिया है।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी दल अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। राज्य में एक ओर जहां समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है, वहीं अब ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) भी इस राजनीतिक मैदान में सक्रिय दिख रही है।
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में मिली सफलता के बाद हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के हौसले बुलंद हैं और वे उत्तर प्रदेश में अपने दल की पैठ बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। इससे चुनावी समीकरण और जटिल होते दिखाई दे रहे हैं।
ओवैसी की एंट्री का रणनीतिक महत्व
ओवैसी ने बीते दिनों घोषणा की थी कि AIMIM उत्तर प्रदेश में पूरे दमखम के साथ चुनाव में उतरेगी। साल 2027 के विधानसभा चुनावों में यह कदम बीजेपी और सपा दोनों के लिए चुनौती साबित हो सकता है। ओवैसी ने कहा कि लोग उनकी पार्टी से पूछ रहे हैं कि यूपी में कितनी सीटें लड़ेंगी, और उनका इरादा पूरी ताकत से चुनाव लड़ने का है।
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में मुस्लिम मतदाताओं का असर 143 सीटों पर देखा गया है। इनमें 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20-30 प्रतिशत है, जबकि 73 सीटों पर यह 30 प्रतिशत से अधिक है। यही वजह है कि AIMIM की एंट्री विशेष रूप से मुस्लिम बहुल इलाकों में सियासत को प्रभावित कर सकती है।
सपा और बीजेपी पर संभावित असर
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ओवैसी की एंट्री सीधे तौर पर सपा के लिए चुनौती पेश कर सकती है। वर्ष 2022 के चुनाव में ओवैसी की वजह से सपा कई सीटें हार गई थीं, जिनमें सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, भदोही, सुल्तानपुर और जौनपुर शामिल हैं। वहीं, बीजेपी को भी मुस्लिम बहुल सीटों पर दिक्कत हो सकती है, खासकर यदि ओवैसी उम्मीदवार इन इलाकों में मजबूत पकड़ बनाते हैं।
संसदीय आंकड़ों के अनुसार, यूपी में मुस्लिम विधायकों की संख्या पिछले चुनावों में बदलती रही है। 2007 में बसपा के शासन में यह 56 थी, 2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो बढ़कर 68 हुई, जबकि 2017 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद 24 और 2022 में 34 तक पहुंच गई। इस हिसाब से AIMIM का फोकस मुस्लिम मतदाताओं पर राजनीतिक समीकरण बदल सकता है।
एआईएमआईएम की रणनीति और संभावित गठबंधन
AIMIM के यूपी इकाई के पूर्व अध्यक्ष Israr Ahmed का कहना है कि पार्टी 200 सीटों पर मजबूत चुनाव लड़ेगी और कोशिश करेगी कि सरकार उनकी मदद के बिना न बने। मुस्लिम मतदाताओं के अलावा विभिन्न वर्गों के लोग भी AIMIM से जुड़ रहे हैं। पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष Shaukat Ali ने संकेत दिया कि यूपी में तीसरे मोर्चे की संभावना तलाशी जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि बीएसपी और AIMIM के बीच गठबंधन होता है, तो यह स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना सकता है। सपा ने इशारों में AIMIM के साथ संभावित अलायंस की संभावना जताई है, जबकि कांग्रेस सतर्क है।
पूर्व सीएम Akhilesh Yadav ने कहा कि ओवैसी का दखल सपा के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। उनके मुताबिक, ओवैसी ‘साइकिल’ पर सवाल बनकर आएंगे। राजनीतिक विश्लेषक विजय उपाध्याय के अनुसार, ओवैसी सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा नहीं पहुंचाएंगे, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर उनकी मौजूदगी बीजेपी को चुनौती दे सकती है।
बीजेपी के Yogi Adityanath ने एक कार्यक्रम में स्पष्ट कर दिया कि बंटोगे तो कटोगे का संदेश लागू होगा, यानी अगर विपक्ष बंट जाएगा तो बीजेपी के लिए फायदेमंद स्थिति बनेगी।









