उत्तराखंड हाई कोर्ट ने शराब दुकानों के आवंटन रद्द किए, कहा- शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून की शराब दुकानों के आवंटन रद्द कर कहा कि शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं, पारदर्शिता जरूरी है।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 17 फरवरी 2026 के बाद देहरादून की विदेशी शराब दुकानों के आवंटन को रद्द कर दिया। अदालत ने प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाते हुए मामले की जांच के निर्देश भी दिए।

नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून की विदेशी शराब दुकानों के आवंटन से जुड़े मामले में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए 17 फरवरी 2026 के बाद किए गए आवंटनों को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं है और सरकार को हर स्थिति में निष्पक्ष एवं पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करना होगा।

हाई कोर्ट ने आवंटन प्रक्रिया को बताया अपारदर्शी

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देहरादून की विदेशी मदिरा दुकानों के आवंटन से जुड़े मामले में आबकारी विभाग की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने आबकारी आयुक्त के 17 फरवरी 2026 के आदेश और उसके आधार पर किए गए सभी विवादित आवंटनों को रद्द कर दिया।

अदालत ने अपने आदेश की प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजने का निर्देश भी दिया है, ताकि पूरे मामले की जांच कर कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

प्रक्रिया में जल्दबाजी और पारदर्शिता की कमी पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि शराब दुकानों के नवीनीकरण की प्रक्रिया 16 फरवरी 2026 को समाप्त हुई और अगले ही दिन जिला आबकारी अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट भेज दी। इसके बाद 18 फरवरी को सूचना जारी कर कुछ ही दिनों में ऑफर लेकर दुकानों का आवंटन कर दिया गया।

हाई कोर्ट ने कहा कि पूरी प्रक्रिया असामान्य रूप से तेजी से पूरी की गई, जिससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और व्यापक जनभागीदारी की संभावना प्रभावित हुई। अदालत ने टिप्पणी की कि सार्वजनिक सूचना में भी कई जरूरी जानकारियां शामिल नहीं थीं और इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।

'शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं'

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि शराब का व्यापार किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है। सरकार को आबकारी नीति के माध्यम से अधिकतम राजस्व प्राप्त करने का अधिकार जरूर है, लेकिन इसके लिए संविधान में निर्धारित निष्पक्षता, पारदर्शिता और गैर-मनमानेपन के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा कि केवल अधिक राजस्व प्राप्त करने का तर्क अपनाकर सरकार अपनी ही निर्धारित प्रक्रिया से अलग नहीं हो सकती। यदि नीति में किसी विशेष प्रक्रिया का उल्लेख है, तो उसका पालन करना आवश्यक है।

आबकारी नीति की अनदेखी पर कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि आबकारी नीति के अनुसार पहले लॉटरी, उसके बाद 'प्रथम आगत-प्रथम पावत' और इन दोनों चरणों के बाद ही अधिकतम ऑफर की प्रक्रिया अपनाई जानी थी। लेकिन इस मामले में इन अनिवार्य चरणों को छोड़कर सीधे अधिकतम ऑफर के आधार पर आवंटन कर दिया गया।

राज्य सरकार ने दलील दी कि आबकारी आयुक्त को नियम-42 के तहत अधिक राजस्व प्राप्त करने के लिए ऐसा करने का अधिकार था, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। हाई कोर्ट के निर्देश पर हुई विभागीय जांच में भी यह सामने आया कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

नए विज्ञापन में मिले लगभग दोगुने ऑफर

सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि उसके निर्देश के बाद राज्य सरकार ने 16 जुलाई को नई सार्वजनिक निविदा जारी कर इच्छुक लोगों से फिर से आवेदन मांगे। इस प्रक्रिया में प्राप्त सर्वोच्च बोलियां पहले किए गए आवंटनों की तुलना में लगभग दोगुनी रहीं।

अदालत ने इसे इस बात का संकेत माना कि यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक तरीके से अपनाई जाती, तो सरकार को पहले ही अधिक राजस्व मिल सकता था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने विवादित आवंटनों को रद्द करते हुए भविष्य में आबकारी नीति का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

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