साल 2022 में रिलीज़ हुई फिल्म 'वध' आम आदमी के शोषण और ताकतवर वर्ग के अत्याचार पर आधारित थी। फिल्म का मूल विचार यह था कि जब एक सामान्य व्यक्ति की सहनशक्ति जवाब दे देती है, तो वह अत्याचारी की हत्या को ‘वध’ कहकर न्यायसंगत ठहरा देता है।
एंटरटेनमेंट न्यूज़: साल 2022 में आई फिल्म ‘वध’ ने आम आदमी पर होने वाले अत्याचार और शक्तिशाली वर्ग के अत्याचारों को दिखाकर दर्शकों के दिलों में जगह बनाई थी। लगभग तीन साल बाद, सिनेमाघरों में ‘वध 2’ रिलीज हो रही है, जो उसी विचारधारा को आगे बढ़ाती है। फिल्म में पुराने पात्रों के नाम रखे गए हैं, लेकिन कहानी पूरी तरह से नई और सस्पेंस से भरपूर है।
वध 2 की कहानी मध्य प्रदेश के शिवपुरी जेल के इर्द-गिर्द बुनी गई है। युवा मंजू सिंह (मेहर देओल) को दो प्रेमियों की हत्या के आरोप में 28 साल की जेल की सजा मिलती है। कहानी वर्तमान में आती है और दिखाती है कि उम्रदराज मंजू (नीना गुप्ता) जल्द ही रिहा होने की उम्मीद कर रही हैं।
जेल का माहौल और पात्रों की जटिलता
जेल में तैनात शंभुनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) मंजू के लिए एक खास जगह रखते हैं और उसकी छोटी-मोटी जरूरतों में मदद करते हैं। शंभुनाथ का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा है; पत्नी का निधन, विदेश में पढ़ाई कर रहे बेटे के साथ दूरियाँ, और जेल में सब्जियों की चोरी कर अतिरिक्त आमदनी की कोशिशें। फिल्म में जेलर प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) जातिगत सोच से प्रभावित हैं और जेल के माहौल में अपनी पकड़ बनाए रखते हैं।
वहीं, बाहुबली विधायक के भाई केशव (अक्षय डोगरा) की क्रूरता जेल में डर का माहौल पैदा करती है। महिला जेल वॉर्डन रजनी शर्मा (शिल्पा शुक्ला) और कुछ पुलिसकर्मी केशव की नजर में खास होते हैं। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, प्रकाश सिंह और केशव के बीच संघर्ष और केशव की बेरहमी जेल के अंदर अलग-अलग राज सामने लाती है। अतीत सिंह (अमित के सिंह) की जांच नए मोड़ लाती है और क्लाइमेक्स तक कई अनकहे राज खुलते हैं, जो दर्शकों की धड़कनें बढ़ा देते हैं।

सस्पेंस और क्लाइमेक्स की ताकत
‘वध 2’ का सबसे बड़ा आकर्षण इसका सस्पेंस और क्लाइमेक्स है। शंभुनाथ का संवाद “इन्होंने हत्या नहीं, वध किया है” पूरी कहानी का सार पेश करता है। निर्देशक जसपाल सिंह संधू ने कहानी में जेल के अंदर और बाहर के मानवीय रिश्तों, जातिवाद, नैतिक द्वंद्व और आम आदमी की मजबूरी को बेहतरीन ढंग से पिरोया है।
फिल्म में कोई बेवजह का आइटम सॉन्ग या फालतू दृश्य नहीं है। हालांकि मंजू और शंभुनाथ के बीच बढ़ती नजदीकियों और मंजू की निजी भावनाओं को थोड़ा स्पष्ट नहीं दिखाया गया है, पर यह फिल्म की पूरी कहानी पर असर नहीं डालता।
अद्भुत अभिनय और किरदारों की सटीकता
संजय मिश्रा शंभुनाथ के किरदार में अपने अनुभव और संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। नीना गुप्ता ने निर्दोष मंजू की पीड़ा, धैर्य और सहनशीलता को सहज ढंग से निभाया है। कुमुद मिश्रा ने जातिवादी जेलर की भूमिका को प्रभावशाली बनाया, जबकि अक्षय डोगरा का क्रूर केशव डर और नफरत पैदा करता है। योगिता बिहानी ने मासूमियत से पात्र को जीवंत किया। अतीत सिंह के किरदार में अमित के सिंह ने संयमित और शांत भूमिका निभाई, जिसमें उनकी हल्की मुस्कान कई भावों को बयां करती है। शिल्पा शुक्ला की छोटी लेकिन प्रभावी भूमिका भी यादगार बनी।
कास्टिंग डायरेक्टर विकी सदाना ने किरदारों का बेहतरीन चयन किया। सपन नरूला का सिनेमेटोग्राफी जेल के माहौल और पात्रों की भावनाओं को बड़ी नज़ाकत से दर्शाती है। एडिटर भरत एस. रावत ने कहानी की गति बनाए रखी है, जबकि अद्वैत नेमलेकर का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के सस्पेंस और भावनाओं को और गहराई देता है।








