दिल्ली हाई कोर्ट ने IndiGo फ्लाइट कैंसिलेशन से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इसी मुद्दे पर मामला पहले से पेंडिंग है, इसलिए नई PIL स्वीकार नहीं की जा सकती।
New Delhi: दिल्ली हाई कोर्ट ने IndiGo एयरलाइंस से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। इस याचिका में फ्लाइट कैंसिलेशन, यात्रियों की परेशानी, DGCA की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। साथ ही एयरपोर्ट पर फंसे यात्रियों को चार गुना मुआवजा देने की मांग भी की गई थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि इस मुद्दे पर पहले से चल रहे मामले के रहते नई जनहित याचिका को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
क्या था जनहित याचिका का मुख्य उद्देश्य
यह जनहित याचिका NGO सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टमिक चेंज की ओर से दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि IndiGo की बड़ी संख्या में फ्लाइट्स कैंसिल होने से देशभर में एविएशन संकट पैदा हुआ। यात्रियों को घंटों एयरपोर्ट पर फंसे रहना पड़ा। उन्हें सही समय पर जानकारी नहीं दी गई। कई मामलों में रिफंड में देरी हुई। इसके अलावा DGCA पर यह आरोप भी लगाया गया कि उसने अपने नियामक कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहीं किया।
चार गुना मुआवजे की मांग का आधार
याचिका में कहा गया था कि फ्लाइट रद होने से प्रभावित यात्रियों को केवल रिफंड देना पर्याप्त नहीं है। यात्रियों को मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, समय की बर्बादी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसी वजह से याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि एयरलाइन को यात्रियों को चार गुना मुआवजा देना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को Consumer Protection Act 2019 के तहत क्लास एक्शन सूट शुरू करने का निर्देश देने की भी अपील की गई थी।
DGCA की भूमिका पर उठे सवाल
याचिका में यह भी कहा गया कि DGCA ने फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन यानी FDTL नियमों के पालन को लेकर सख्ती नहीं दिखाई। IndiGo द्वारा इन नियमों का पालन न करने से पायलटों की कमी बढ़ी। इसके कारण हजारों फ्लाइट्स कैंसिल हुईं। याचिकाकर्ता का दावा था कि DGCA की लापरवाही ने पूरे संकट को गंभीर बना दिया। इसी वजह से एक सेवानिवृत्त जज या लोकपाल से DGCA की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय तथा जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच के सामने हुई। बेंच ने स्पष्ट किया कि IndiGo फ्लाइट कैंसिलेशन से जुड़ा एक मामला पहले से ही हाई कोर्ट में पेंडिंग है। ऐसे में नई जनहित याचिका दायर करना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को पहले से लंबित PIL में खुद को पक्षकार बनाना चाहिए था।
सुनवाई से इनकार का कारण

कोर्ट ने कहा कि एक ही मुद्दे पर कई जनहित याचिकाएं दायर होने से समस्या का समाधान नहीं होता। इससे न्यायिक प्रक्रिया में भ्रम पैदा होता है। बेंच ने यह भी कहा कि PIL का उद्देश्य जनहित की रक्षा करना होता है न कि किसी तरह का लाभ उठाना। कोर्ट के अनुसार यदि याचिकाकर्ता पहले से पेंडिंग केस में इंप्लीमेंटेशन की मांग करता, तो कोर्ट उस पर विचार कर सकता था।
कोर्ट की टिप्पणी का कानूनी महत्व
अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि इस PIL में उठाए गए सभी मुद्दों पर पहले की जनहित याचिका में पहले से ही विचार किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट तथा विभिन्न हाई कोर्ट्स द्वारा विकसित PIL से जुड़े ज्यूरिस्प्रूडेंस के अनुसार कोर्ट के पास पहले से लंबित मामले के दायरे को बढ़ाने की शक्ति होती है। इसलिए नई याचिका की जरूरत नहीं थी। इसी आधार पर कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया।
IndiGo संकट से जुड़ी पेंडिंग PIL पर दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 दिसंबर को सुनवाई की थी। उस दौरान कोर्ट ने IndiGo को निर्देश दिया था कि वह प्रभावित यात्रियों को मुआवजा सुनिश्चित करे। साथ ही केंद्र सरकार को गलती करने वाली एयरलाइंस के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का भी आदेश दिया गया था। कोर्ट ने माना था कि यात्रियों को हुई परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता की दलीलें
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता संगठन की ओर से वकील विराग गुप्ता ने दलील दी कि IndiGo की वजह से करीब 12.5 लाख यात्रियों को नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि हर यात्री के लिए कंज्यूमर फोरम में अलग-अलग केस करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए सरकार को क्लास एक्शन सूट शुरू करना चाहिए। उनका कहना था कि IndiGo की पॉलिसी के अनुसार चार गुना मुआवजे का प्रावधान है, लेकिन अब तक यात्रियों को न तो पूरा रिफंड मिला है न ही मुआवजा।
केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कोर्ट में दखल दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि मुआवजा चार गुना तक ही क्यों सीमित रखा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मुआवजे की राशि तय करना कंज्यूमर फोरम का काम है। कोर्ट ने भी इसी बिंदु पर सवाल किया कि यदि क्लास एक्शन सूट शुरू होता है, तो मुआवजे की रकम तय करने का अधिकार किसके पास होगा।
चार गुना मुआवजे पर कोर्ट का नजरिया
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्लास एक्शन सूट तथा सीधे चार गुना मुआवजा देने की मांग एक साथ नहीं चल सकती। यदि क्लास एक्शन सूट शुरू किया जाता है, तो मुआवजे की राशि तय करने का अधिकार संबंधित कंज्यूमर कोर्ट को होगा। ऐसे में हाई कोर्ट सीधे चार गुना मुआवजा तय नहीं कर सकता। इसी वजह से कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं माना।











