चैत्र नवरात्रि का पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्रि के आखिरी दिनों में अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन का विशेष महत्व है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कन्या पूजन में सिर्फ कन्याओं का ही नहीं बल्कि एक विशेष बालक का भी स्थान होता है, जिसे लांगुर कहा जाता है। लांगुर के बिना कन्या पूजन को अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं क्यों।
लांगुर का धार्मिक महत्व: कौन होते हैं लांगुर?
नवरात्रि में कन्या पूजन के दौरान जिन कन्याओं को पूजने के लिए बुलाया जाता है, उनके साथ एक बालक को भी बुलाया जाता है, जिसे लांगुर या लांगुरिया कहा जाता है। जहां छोटी कन्याएं मां दुर्गा का स्वरूप मानी जाती हैं, वहीं लांगुर को भैरव बाबा का स्वरूप माना जाता है। भैरव बाबा को मां दुर्गा के रक्षक और पहरेदार के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जहां भी मां दुर्गा का वास होता है, वहां भैरव बाबा उनकी सुरक्षा में सदैव उपस्थित रहते हैं। इसी कारण से कन्या पूजन के दौरान लांगुर को भी बैठाना आवश्यक माना गया है।
दो लांगुर बुलाने की परंपरा
लांगुर को पूजा में सम्मिलित करना धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यह माना जाता है कि बिना लांगुर के कन्या पूजन का फल पूर्ण नहीं माना जाता। जहां कन्याएं मां दुर्गा का प्रतीक होती हैं, वहीं लांगुर भैरव का प्रतीक होते हैं। इस प्रकार, दोनों का एक साथ पूजन करना शुभ माना जाता है। कुछ परंपराओं में कन्या पूजन के दौरान सिर्फ एक नहीं बल्कि दो लांगुर बिठाने का भी विधान है।
इनमें से एक को भैरव बाबा का और दूसरे को भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। चूंकि किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश जी का आह्वान किया जाता है, इसलिए कुछ स्थानों पर दो लांगुर को बिठाकर पूजा की जाती है।
लांगुर के बिना क्यों अधूरी है पूजा?
लांगुर को पूजन में सम्मिलित न करने से ऐसा माना जाता है कि मां दुर्गा की सुरक्षा के प्रतीक भैरव बाबा की उपस्थिति नहीं रहती, जिससे व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। इसलिए श्रद्धालु लांगुर को भी विशेष रूप से भोजन करवाकर दक्षिणा देते हैं। लांगुर को कन्याओं के साथ ही समान रूप से भोजन कराया जाता है। उन्हें पूरी, हलवा, चने आदि का प्रसाद दिया जाता है। भोजन के बाद दक्षिणा भी दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इससे मां दुर्गा और भैरव बाबा की कृपा प्राप्त होती है।
आधुनिक समय में लांगुर की परंपरा
आजकल शहरों में यह परंपरा कहीं-कहीं कम हो गई है, लेकिन ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में अब भी इसे निभाया जाता है। भक्तजन लांगुर को विशेष सम्मान देते हैं और उन्हें परिवार का ही सदस्य मानकर पूजते हैं। कन्या पूजन में लांगुर का समावेश हमें यह सिखाता है कि शक्ति (दुर्गा) और संरक्षण (भैरव) एक-दूसरे के पूरक हैं। नवरात्रि के इस पवित्र पर्व पर लांगुर का महत्व न केवल धार्मिक है बल्कि यह हमारी परंपराओं और आस्थाओं को भी दर्शाता है।