बिल्ली का न्याय की कहानी, चकोर का चालाक दिमाग

बिल्ली का न्याय की कहानी, चकोर का चालाक दिमाग
Last Updated: 21 जून 2024

एक बार की बात है. एक वन में एक पेड़ की खोह में एक चकोर रहता था। पेड़ के आस-पास कै पेड़ और जिन पर फल और बीज उगते थे। उन फलों और बीजों से पेट भरकर चकोर मस्त रहता है। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए। एक दिन उड़ते-उड़ते एक और चकोर सांस लेने के लिए उस पेड़ की तहनी पर बैठा। दोनो में बातें हुई। दूसरे चकोर को यह जान कर आश्चर्य हुआ कि पहला चकोर सिर्फ पेड़ों के फल और बीज चुग कर जीवन गुजार रहा था। दूसरे चकोर ने उसे बताया, "भाई, दुनिया में खाने के लिए सिर्फ फल और बीज ही नहीं होते, और भी कई स्वादिष्ट चीजें हैं। खेतों में उगने वाले अनाज तो बेजोड होते हैं। कभी अपने खाने का स्वाद बदलकर तो देखो।

दूसरे चकोर के उड़ने के बाद पहला चकोर सोच में पड़ गया। उसने फैसला किया कि कल ही वह दूर नजर आने वाले खेतों की तरफ जाएगा और उस अनाज के नाम की चीज का स्वाद चखेगा। अगले दिन चकोर उड़कर एक खेत के पास उतरा। खेत में धान की फसल उगी थी। चकोर ने कोपलेन खाई। वो अति स्वादिष्ट लगे का प्रयोग करें। उस दिन के भोजन में उसे इतना आनंद आया कि खाकर तृप्त होकर वही आंखें मूंदकर सो गया। इसके बाद भी वो वही पड़ रहा है। रोज खाता-पीता और सो जाता। छे-सात दिन के बाद उसे सुध आई कि घर लौटना चाहिए। इस बीच एक खरगोश घर की तलाश में घूम रहा था।

उस इलाके में ज़मीन के नीचे पानी भरने के कारण उसका बिल नष्ट हो गया था। वह उसी चकोर वाले पेड़ के पास आया और उसे खाली पाकर उसने उस पर अधिकार जमा लिया और वहां रहने लगा। जब चकोर वापस लौटा तो उसने पाया कि उसके घर पर किसी और का क़ब्ज़ा हो गया है। चकोर क्रोधित होकर बोला, "ऐ भाई, तू कौन है और मेरे घर में क्या कर रहा है?" खरगोश ने दांत दिखाकर कहा, "मैं इस घर का मालिक हूं। मैं सात दिनों से यहां रह रहा हूं, यह घर मेरा है।" चकोर गुस्से से फट पड़ा, "सात दिन! भाई, मैं इस खोह में कई सालों से रह रहा हूँ। किसी भी आस-पास के पंछी या चौपाये से पूछ ले।" 

खरगोश चकोर की बात काटते हुए बोला, "सीधी-सी बात है। मैं यहाँ आया। ये बहुत खाली पड़ी थी और मैं यहाँ बस गया। अब मैं क्यों पड़ोसियों से पूछता फिरूँ?" चकोर गुस्से में बोला, "वाह! कोई घर खाली मिले तो इसका मतलब हुआ कि उसमें कोई नहीं रहता? मैं आखिरी बार शराफत से कह रहा हूं कि मेरा घर खाली कर दे वरना..." खरगोश ने भी उसे ललकार दिया, "वरना तू क्या कर लेगा? ये घर मेरा है। तुझे जो करना है, कर ले।" चकोर साहम गया। वो मदद और न्याय की फरियाद लेकर पड़ोसि जानवरों के पास गया। सबने दिखाया कि हूं-हूं की, पर उस रूप से कोई सहायता करने सामने नहीं आया। 

एक बूढ़े पड़ोसी ने कहा, "ज़्यादा झगड़े बढ़ाना ठीक नहीं होगा। तुम दोनो आपस में कोई समझौता कर लो।" पर समझौते की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी, क्योंकि शिकायत किसी शर्त पर छोड़ने को तैयार नहीं थी। अंत में लोमडी ने उन्हें सलाह दी, "तुम दोनो किसी ज्ञानी-ध्यानी को पांच बना कर अपने झगड़े का फैसला उससे करवाओ।" दोनो को ये सुझाव पसंद आया। अब दोनो पाँच की तलाश में इधर-उधर घूमने लगे। इसी प्रकार घूमते-घूमते और दोनों एक दिन गंगा किनारे आ निकले। वहां उनके जप तप में मगन एक बिल्ली नजर आई। 

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बिल्ली के माथे पर तिलक था। गले में जनेऊ और हाथ में माला लिए मृगचाल पर बैठी वह पूरी तपस्विनी लग रही थी। देख कर चकोर और खरगोश ख़ुशी से उछल पड़े। उन्हें भला इससे अच्छा ज्ञान-ध्यान कहां मिलेगा। खरगोश ने कहा, "चकोर जी, हम इसके अपने झगड़े का फैसला क्यों नहीं करवाएं?" चकोर पर भी बिल्ली का अच्छा प्रभाव पड़ा था, पर वो ज़रा घबराया हुआ था। चकोर बोला, "मुझे कोई आपत्ति नहीं है पर हमें ज़रा सावधान रहना चाहिए।" खरगोश पर तो बिल्ली का जादू चल गया था। उसने कहा, "अरे नहीं! देखते नहीं हो, ये बिल्ली सांसारिक मोह-माया त्याग कर तपस्विनी बन गई है।" सच तो यह है कि बिल्ली जैसे मूर्ख जीवों को फंसाने के लिए ही भक्ति का नाटक कर रही थी। फिर चकोर और खरगोश पर और प्रभाव डालने के लिए वो ज़ोर-ज़ोर से मंत्र पढने लगी।

 

कहानी का सारांश 

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि - दो के झगड़ों में तीसरे का ही फायदा होता है, इसलिए झगड़ों से दूर रहना चाहिए।

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