भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से देश के बड़े हिस्से का निर्यात, कच्चे तेल का आयात और विदेशी धन (रेमिटेंस) प्रवाह जुड़ा हुआ है।
बिजनेस न्यूज़: भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि पश्चिम एशिया में जारी मौजूदा संकट का भारत पर महत्वपूर्ण असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहां से देश का लगभग एक-छठा निर्यात होता है, लगभग आधा कच्चा तेल आयात किया जाता है और करीब दो-पांचवां विदेशी धन (रेमिटेंस) भी यहीं से आता है। ऐसे में क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारत की व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर देखने को मिल सकता है।
पश्चिम एशिया संकट का भारत पर प्रभाव
प्रिंसटन विश्वविद्यालय में 18 अप्रैल को दिए गए अपने संबोधन में आरबीआई गवर्नर ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट का प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था के कई अहम क्षेत्रों पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि भारत का लगभग:
- एक-छठा निर्यात पश्चिम एशिया को जाता है
- लगभग 50% कच्चा तेल आयात इसी क्षेत्र से आता है
- करीब 40% विदेशी रेमिटेंस इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है
इन आंकड़ों के आधार पर उन्होंने कहा कि वैश्विक अस्थिरता का असर भारतीय आर्थिक गतिविधियों पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।
भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत आधार पर: आरबीआई
आरबीआई गवर्नर ने कहा कि चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले दशक में लगातार मजबूत हुई है। उन्होंने इस मजबूती का श्रेय मजबूत नीतियों, वित्तीय स्थिरता और बेहतर राजकोषीय प्रबंधन को दिया। उन्होंने बताया कि पिछले 10 वर्षों में भारत की औसत आर्थिक वृद्धि दर लगभग 6.1 प्रतिशत रही है, जो वैश्विक औसत 3.2 प्रतिशत से काफी अधिक है।
तुलना के तौर पर चीन की वृद्धि दर 5.6 प्रतिशत और इंडोनेशिया की 4.2 प्रतिशत रही है। गवर्नर के अनुसार, यह प्रदर्शन भारत की आर्थिक नींव की स्थिरता और संस्थागत सुधारों का परिणाम है।

घरेलू तेल और गैस उत्पादन पर फोकस
संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।उन्होंने बताया कि देश में घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने के प्रयास तेज किए जा रहे हैं, साथ ही आयात स्रोतों को विविधीकृत किया जा रहा है ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के पास पर्याप्त तेल भंडार उपलब्ध हैं, जिससे तत्काल आपूर्ति संकट की संभावना कम है। हालांकि, औद्योगिक उपयोग के लिए प्राकृतिक गैस की उपलब्धता सीमित बनी हुई है, जिसके चलते उसका वितरण नियंत्रित किया जा रहा है।
कीमतों पर सरकार और आरबीआई की रणनीति
गवर्नर ने बताया कि तेल की कीमतों का कुछ बोझ सरकार और तेल कंपनियों द्वारा वहन किया गया है, जबकि गैस की कीमतों का आंशिक भार उपभोक्ताओं पर डाला गया है। उन्होंने कहा कि सरकार और आरबीआई दोनों मिलकर मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आपूर्ति-आधारित उपायों और मौद्रिक नीति का संतुलित उपयोग कर रहे हैं।
आरबीआई गवर्नर ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान में “वेट एंड वॉच” यानी प्रतीक्षा और निगरानी की रणनीति अपना रहा है। इसका उद्देश्य है कि किसी भी वैश्विक या घरेलू झटके के प्रभाव को पहले पूरी तरह समझा जाए, उसके बाद ही नीतिगत निर्णय लिए जाएं। उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति को तब तक अचानक सख्त नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि यह सुनिश्चित न हो जाए कि आपूर्ति बाधाएं दीर्घकालिक मुद्रास्फीति को जन्म देंगी।












