सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए। विशेषज्ञों का कहना है कि हटाने से समस्या बढ़ सकती है। प्रभावी नसबंदी, टीकाकरण और कचरा प्रबंधन से ही समाधान संभव है।
New Delhi: भारत में आवारा कुत्तों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों को निर्देश दिए कि वे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दें और कुत्तों के काटने के मामलों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं। हालांकि, पशु विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि आवारा कुत्तों को हटाने से समस्या और बढ़ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मकसद
जनवरी में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया कि स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर बच्चों और बुजुर्गों को कुत्तों के हमले से बचाने के लिए स्थानीय प्रशासन जिम्मेदार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जो लोग कुत्तों को पालते हैं या उन्हें भोजन देते हैं, उन्हें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और कुत्तों के व्यवहार पर निगरानी रखनी होगी।
न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि यदि कोई जानवर रखना चाहता है तो लाइसेंस लेना जरूरी है। सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को किसी भी प्रकार से डर या गंदगी फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2001 के अनुपालन की कमी पर भी चिंता जताई।
आवारा कुत्तों को हटाने का खतरा
पशु कल्याण कार्यकर्ताओं का कहना है कि आवारा कुत्तों को उनके परिचित इलाकों से हटाना खतरनाक हो सकता है। 'ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स' की निदेशक केरेन नाज़रेथ और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी का मानना है कि यह एक 'क्षेत्रीय शून्यता' पैदा करता है। जिस इलाके से कुत्तों को हटाया जाएगा, वहां नए और अधिक आक्रामक कुत्तों के आने की संभावना बढ़ जाती है। इससे काटने के मामलों में कमी आने की बजाय वृद्धि हो सकती है।
नसबंदी और टीकाकरण की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों की टीकाकरण और नसबंदी में अनियमितता पर चिंता जताई। अदालत के अनुसार, इन कार्यक्रमों की कमी से न केवल मानव जीवन जोखिम में आता है बल्कि सड़क दुर्घटनाओं और कुत्तों के काटने के मामलों में भी वृद्धि होती है।
आंकड़े बताते हैं गंभीरता
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में कुत्तों के काटने के 37 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए। हालांकि, 2025 में कुछ गिरावट देखी गई, लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है। इसके चलते सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।











