अब्राहम लिंकन: हार न मानने वाले राष्ट्रपति

अब्राहम लिंकन का जीवन संघर्ष, असफलताओं और अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है। जानिए कैसे बार-बार हारने के बाद भी वे अमेरिका के महान राष्ट्रपति बने।

अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जीवन संघर्ष और इच्छाशक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जो दुनिया में शायद ही कहीं और मिले। गरीबी में जन्म लेने और कदम-कदम पर हार का सामना करने के बावजूद, उन्होंने कभी अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। यह कहानी साबित करती है कि हार केवल तब होती है जब हम कोशिश करना छोड़ देते हैं।

कहानी 

अब्राहम लिंकन का जन्म अमेरिका के केंटकी राज्य में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। उनका घर लकड़ियों से बनी एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसमें न खिड़कियाँ थीं और न ही पक्का फर्श। उनके पिता एक गरीब किसान थे, इसलिए लिंकन को बचपन से ही कड़े संघर्षों का सामना करना पड़ा। जब वे केवल 9 वर्ष के थे, उनकी माँ का निधन हो गया। यह उनके जीवन का पहला बड़ा झटका था, जिसने उन्हें समय से पहले ही जिम्मेदार बना दिया।

लिंकन को पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन गरीबी के कारण वे स्कूल नहीं जा सके। पूरे जीवन में वे मुश्किल से कुल 12 महीने ही स्कूल जा पाए। लेकिन उनके अंदर ज्ञान की भूख इतनी ज्यादा थी कि वे मीलों पैदल चलकर दूसरों से किताबें उधार मांगते और रात में चूल्हे की आग की रोशनी में पढ़ा करते थे। उन्होंने खुद को एक वकील के रूप में तैयार किया, लेकिन उनका रास्ता कांटों से भरा था।

युवावस्था में उन्होंने एक दुकान शुरू की, लेकिन उसमें वे बुरी तरह असफल रहे। उनका पार्टनर चल बसा और उन पर भारी कर्ज हो गया, जिसे चुकाने में उन्हें कई साल लग गए। 1832 में उन्होंने विधायिका का चुनाव लड़ा और बुरी तरह हार गए। इसके बाद उन्होंने फिर से व्यापार करने की कोशिश की, लेकिन किस्मत ने फिर धोखा दिया और वे फिर से फेल हो गए।

दुखों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। 1835 में, जिस लड़की से वे बेइंतहा प्यार करते थे और शादी करना चाहते थे, उसकी मृत्यु हो गई। इस सदमे ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। वे इतने गहरे अवसाद (Depression) में चले गए कि उन्हें महीनों तक बिस्तर पर रहना पड़ा। लोग कहने लगे कि लिंकन अब कभी नहीं उठ पाएंगे और उनका जीवन खत्म हो चुका है।

लेकिन लिंकन के अंदर एक आग थी जो बुझी नहीं थी। उन्होंने फिर से खुद को समेटा। 1836 में उन्हें नर्वस ब्रेकडाउन हुआ। 1838 में वे 'स्पीकर' का चुनाव हार गए। 1843 में वे कांग्रेस के लिए नामांकन पाने में असफल रहे। 1848 में वे फिर से चुनाव हार गए। 1855 में सीनेट के चुनाव में उन्हें हार मिली। 1856 में उपराष्ट्रपति बनने की दौड़ में भी वे पीछे रह गए। 1858 में एक बार फिर सीनेट के चुनाव में उन्हें असफलता का मुँह देखना पड़ा।

जरा सोचिए, एक इंसान जो 21 साल की उम्र से लेकर 50 साल की उम्र तक लगातार फेल होता रहा हो, क्या वह उम्मीद रख सकता है? कोई आम इंसान होता तो कब का टूट चुका होता और अपनी किस्मत को कोस रहा होता। लेकिन लिंकन आम नहीं थे। उन्होंने एक बार अपने दोस्त से कहा था, 'रास्ता फिसलन भरा जरूर था, पर मैं गिरा नहीं। मैंने खुद को संभाला और कहा कि यह सिर्फ एक फिसलन है, पतन नहीं।'

आखिरकार, 1860 में वह दिन आया जिसने इतिहास बदल दिया। अब्राहम लिंकन अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए। जिस व्यक्ति को दुनिया ने 'हारा हुआ' मान लिया था, उसने देश की कमान संभाली। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उनके कार्यकाल में अमेरिका भयंकर गृहयुद्ध (Civil War) से गुजरा। देश टूटने की कगार पर था, लेकिन लिंकन ने अपनी समझदारी और धैर्य से देश को एकजुट रखा।

उन्होंने सबसे बड़ा और साहसिक फैसला लिया-गुलामी प्रथा (Slavery) को खत्म करने का। उन्होंने लाखों लोगों को दासता की जंजीरों से मुक्त कराया। जिस लड़के के पास कभी पहनने के लिए जूते नहीं थे, आज उसके कदमों पर पूरी दुनिया चल रही थी। लिंकन ने साबित कर दिया कि आपकी शुरुआत चाहे कैसी भी हो, आपका अंत शानदार हो सकता है।

सीख 

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सफलता का मतलब यह नहीं है कि आप कभी गिरेंगे नहीं। असली सफलता इसमें है कि आप कितनी बार गिरकर वापस खड़े होते हैं। अगर आपके पास धैर्य है और आप अपनी धुन के पक्के हैं, तो दुनिया की कोई भी असफलता आपको अपनी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।

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