देश में राजनीतिक दल-बदल पर रोक लगाने के उद्देश्य से वर्ष 1985 में लागू किए गए दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे का मानना है कि चार दशक बीत जाने के बावजूद यह कानून अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका है।
नई दिल्ली: भारत में 1985 में लागू किए गए दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) का उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा राजनीतिक दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक स्थिर बनाना था। हालांकि, चार दशक बाद भी इस कानून की प्रभावशीलता को लेकर बहस जारी है। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने हाल ही में इस कानून, संविधान की दसवीं अनुसूची, न्यायपालिका की भूमिका और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।
दवे का मानना है कि दल-बदल विरोधी कानून अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर सका है। उनके अनुसार, समय के साथ कानून की विभिन्न व्याख्याओं और राजनीतिक परिस्थितियों ने इसकी प्रभावशीलता को प्रभावित किया है।
दल-बदल विरोधी कानून क्यों लाया गया था?
1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ते हुए दल-बदल विरोधी कानून लागू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य "आया राम, गया राम" जैसी राजनीतिक संस्कृति पर रोक लगाना, निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही बढ़ाना और सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करना था।दुष्यंत दवे ने इस कानून को उस समय का एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी संवैधानिक सुधार बताया।
हालांकि उनका कहना है कि समय के साथ इसकी मूल भावना कमजोर पड़ गई और कानून के कई प्रावधानों की अलग-अलग व्याख्याओं ने इसके उद्देश्य को सीमित कर दिया।
दल-बदल के पीछे केवल सत्ता नहीं, कई अन्य कारण भी
दवे के अनुसार, दल-बदल की घटनाओं को केवल मंत्री पद या सत्ता हासिल करने की इच्छा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा, पार्टी नेतृत्व से असंतोष, संगठनात्मक ढांचे की कमजोरियां और राजनीतिक दलों की आर्थिक क्षमता भी कई बार नेताओं के फैसलों को प्रभावित करती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेताओं ने अतीत में पार्टी छोड़ने के पीछे आंतरिक लोकतंत्र की कमी, नेतृत्व तक सीमित पहुंच और संगठन के भीतर असंतोष जैसे कारणों का उल्लेख किया है।

दसवीं अनुसूची की व्याख्या पर जताई चिंता
दुष्यंत दवे ने संविधान की दसवीं अनुसूची की वर्तमान व्याख्या पर भी सवाल उठाए। उनका मत है कि यदि कोई विधायक या सांसद उस राजनीतिक दल को स्वेच्छा से छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ था, तो उसे तत्काल अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए, चाहे उसके साथ कितने भी अन्य जनप्रतिनिधि क्यों न हों।
उनका तर्क है कि यदि कानून को उसकी मूल भावना और शाब्दिक अर्थ के अनुरूप लागू किया जाए, तो दल-बदल से जुड़े अधिकांश विवादों को रोका जा सकता है और राजनीतिक स्थिरता को मजबूती मिलेगी।
न्यायपालिका की भूमिका पर भी रखी राय
वरिष्ठ अधिवक्ता ने दल-बदल से जुड़े मामलों में न्यायपालिका की भूमिका पर भी अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि राजनीतिक दल बदलना चाहता है, तो पहले उसे अपने पद से इस्तीफा देकर दोबारा जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करना चाहिए। दवे ने यह भी कहा कि दल-बदल से जुड़े संवैधानिक मामलों में न्यायपालिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और ऐसे मामलों में स्पष्ट संवैधानिक सिद्धांत लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों और न्यायपालिका के समक्ष मौजूद चुनौतियों का भी उल्लेख किया।
'ऑपरेशन लोटस' और राजनीतिक बहस
दुष्यंत दवे ने तथाकथित 'ऑपरेशन लोटस' को लेकर चल रही राजनीतिक बहस का भी संदर्भ दिया। उनका कहना है कि यदि दल-बदल विरोधी कानून को उसकी मूल भावना के अनुरूप सख्ती से लागू किया जाए, तो इस प्रकार के विवादों की संभावना काफी हद तक कम हो सकती है। हालांकि, इस विषय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों की अलग-अलग राय रही है।











