अपर्णा यादव से क्यों असहज है BJP? चार साल में सामने आए पांच बड़े विवाद, पार्टी की बढ़ीं चुनौतियां

बीजेपी को अपर्णा यादव को लेकर चार साल में 5 बड़े विवादों का सामना करना पड़ा। जानिए कौन-कौन से मुद्दे पार्टी के लिए चुनौती बने और राजनीति में इसके असर।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए अपर्णा यादव एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई हैं। समाजवादी पार्टी (SP) संस्थापक परिवार से जुड़ाव और बाद में भाजपा में शामिल होने के बाद से अपर्णा यादव लगातार सुर्खियों में रही हैं। 

लखनऊ: समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के छोटे भाई प्रतीक यादव ने अपनी पत्नी और भारतीय जनता पार्टी की नेता अपर्णा यादव से तलाक लेने की घोषणा की है। प्रतीक यादव ने सोशल मीडिया पर अपर्णा को स्वार्थी महिला बताते हुए कहा कि उनका उद्देश्य केवल प्रसिद्धि हासिल करना है। इस पोस्ट के बाद उत्तर प्रदेश महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव को लेकर राजनीतिक हलचलें तेज हो गई हैं। अपर्णा पहली बार सुर्खियों में नहीं हैं; बीजेपी में शामिल होने के बाद वह कई बार पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर चुकी हैं।

निजी विवाद से फिर बढ़ी सियासी हलचल

हाल ही में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के छोटे भाई प्रतीक यादव द्वारा अपनी पत्नी अपर्णा यादव से तलाक की घोषणा के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई। प्रतीक यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट में अपर्णा पर गंभीर आरोप लगाए, जिससे मामला निजी होते हुए भी सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष के रूप में अपर्णा यादव की भूमिका और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं और तेज हो गईं।

अपर्णा यादव ने जनवरी 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। उस समय यह माना जा रहा था कि भाजपा उन्हें लखनऊ कैंट या आसपास की किसी प्रमुख सीट से टिकट दे सकती है। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया। इसके बावजूद अपर्णा यादव ने सार्वजनिक रूप से खुद को भाजपा की “समर्पित कार्यकर्ता” बताते हुए संगठन को मजबूत करने की बात कही, लेकिन टिकट न मिलने की नाराजगी राजनीतिक गलियारों में साफ महसूस की गई।

पद की तलाश और उपचुनाव विवाद

2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी लोकसभा सीट समेत तीन सीटों पर उपचुनाव घोषित हुए। इस दौरान भी अपर्णा यादव के नाम को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं। पार्टी सूत्रों के अनुसार उन्होंने टिकट के लिए दबाव बनाया, जिससे भाजपा के भीतर असहजता बढ़ी। हालांकि अंततः पार्टी ने किसी अन्य रणनीति के तहत उम्मीदवार उतारे और अपर्णा को एक बार फिर निराशा हाथ लगी।

लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी अपर्णा यादव ने टिकट पाने के लिए कई स्तरों पर कोशिशें कीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर दिल्ली स्थित पार्टी नेतृत्व तक उनकी सक्रियता देखी गई। कभी मुख्यमंत्री को अपनी गोशाला में आमंत्रित करना, तो कभी समाजवादी पार्टी के खिलाफ आक्रामक प्रचार करना—अपर्णा लगातार सुर्खियों में बनी रहीं। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि भाजपा नेतृत्व उनके राजनीतिक रोल को लेकर सतर्क है।

महिला आयोग उपाध्यक्ष पद पर असंतोष

सितंबर 2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपर्णा यादव को उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। यह एक संवैधानिक और प्रतिष्ठित पद माना जाता है, लेकिन अपर्णा यादव इससे संतुष्ट नजर नहीं आईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने कई दिनों तक पदभार ग्रहण नहीं किया, जिससे पार्टी की किरकिरी हुई। भाजपा के लिए यह स्थिति इसलिए भी असहज थी क्योंकि विपक्ष ने इसे “आंतरिक असंतोष” का संकेत बताया।

हाल ही में किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से जुड़े एक धर्मांतरण विवाद में अपर्णा यादव का नाम फिर चर्चा में आया। आरोप है कि वे बिना पूर्व सूचना अपने समर्थकों के साथ विश्वविद्यालय पहुंचीं और कुलपति के कक्ष में तीखी बहस हुई। इस घटना ने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर विवाद खड़ा कर दिया, जिससे भाजपा को सफाई देनी पड़ी।

अपर्णा यादव का राजनीतिक सफर भाजपा के लिए दोधारी तलवार जैसा साबित हुआ है। एक ओर वे समाजवादी परिवार से आने के कारण प्रतीकात्मक राजनीतिक महत्व रखती हैं, वहीं दूसरी ओर उनके बयानों, नाराजगी और विवादों से पार्टी बार-बार असहज होती रही है। पिछले चार वर्षों में कम से कम पांच बड़े मामलों ने यह संकेत दिया है कि अपर्णा यादव भाजपा के लिए एक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण चेहरा बनी हुई हैं।

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