असम ने 403.62 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त वन भूमि को संरक्षित क्षेत्र में शामिल किया है। सरकार के मुताबिक, इससे जंगलों, वन्यजीव आवास और पारिस्थितिक गलियारों को मजबूती मिलेगी तथा गैंडे, हाथी और बाघों के संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
गुवाहाटी: असम ने वन और वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 403.62 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त वन भूमि को संरक्षित वन क्षेत्र में शामिल किया है। राज्य सरकार के अनुसार, यह देश में संरक्षित वन क्षेत्र के विस्तार की सबसे बड़ी पहलों में से एक है। इस फैसले से असम के वन क्षेत्र, वन्यजीवों के आवास और पारिस्थितिक गलियारों को मजबूती मिलने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि नए संरक्षित क्षेत्र से जैव विविधता की रक्षा के साथ-साथ वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए अधिक निरंतर और जुड़ा हुआ प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध होगा।
असम में संरक्षण क्षेत्र बढ़ाने का फैसला
असम के वन मंत्री जयंत मल्लबरुआ ने बताया कि 403.62 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त क्षेत्र को संरक्षित वन भूमि में शामिल किया गया है। उनके मुताबिक, इस विस्तार से राज्य की प्राकृतिक विरासत की सुरक्षा को नया आधार मिलेगा और जंगलों के बीच बेहतर पारिस्थितिक संपर्क विकसित होगा।
असम देश के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों में शामिल है। यहां घने जंगलों, घास के मैदानों, नदियों, आर्द्रभूमियों और पहाड़ी क्षेत्रों का विस्तृत नेटवर्क मौजूद है। यही विविध प्राकृतिक परिस्थितियां राज्य को कई दुर्लभ और संकटग्रस्त वन्यजीव प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास बनाती हैं।
नए संरक्षित क्षेत्र के जुड़ने से इन प्राकृतिक आवासों को कानूनी और प्रशासनिक संरक्षण मजबूत होने की उम्मीद है। साथ ही, वन भूमि के संरक्षण से मानव गतिविधियों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
लाओखोवा-बुरहाचापोरी क्षेत्र पर विशेष ध्यान
संरक्षित वन क्षेत्र के विस्तार में लाओखोवा-बुरहाचापोरी लैंडस्केप को विशेष महत्व दिया गया है। यह क्षेत्र असम के महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों में गिना जाता है और काजीरंगा क्षेत्र के आसपास के पारिस्थितिक परिदृश्य से जुड़ा हुआ है।
अतिरिक्त संरक्षित क्षेत्र इस पूरे लैंडस्केप के बीच प्राकृतिक संपर्क को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। इसका सीधा लाभ उन वन्यजीवों को मिल सकता है, जिन्हें भोजन, पानी और सुरक्षित प्रजनन स्थलों की तलाश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने की आवश्यकता होती है।
वन्यजीव संरक्षण में केवल किसी एक राष्ट्रीय उद्यान या अभयारण्य की सुरक्षा पर्याप्त नहीं मानी जाती। अलग-अलग संरक्षित क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक गलियारों का मौजूद रहना भी महत्वपूर्ण है। ऐसे गलियारे हाथियों, बाघों और अन्य बड़े स्तनधारियों को सुरक्षित रूप से आवाजाही करने का अवसर देते हैं।
काजीरंगा क्षेत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह विस्तार?
असम की पहचान दुनिया के सबसे प्रसिद्ध वन्यजीव संरक्षण क्षेत्रों में से एक काजीरंगा के कारण भी है। काजीरंगा क्षेत्र एक सींग वाले भारतीय गैंडे के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है। इसके अलावा यहां हाथी, बाघ, जंगली भैंसे, हिरण और कई अन्य वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं।
काजीरंगा और इसके आसपास के क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त और जुड़े हुए आवास का होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जानवर केवल संरक्षित पार्क की सीमाओं के भीतर ही नहीं रहते। वे मौसम, भोजन, जल स्रोत और प्रजनन जैसी जरूरतों के आधार पर अलग-अलग इलाकों में आवाजाही कर सकते हैं।
लाओखोवा-बुरहाचापोरी क्षेत्र में संरक्षण का विस्तार इस व्यापक परिदृश्य को जोड़ने में मदद कर सकता है। इससे वन्यजीवों के लिए उपलब्ध प्राकृतिक स्थान बढ़ेगा और अलग-अलग आवासों के बीच संपर्क मजबूत हो सकता है।
एक सींग वाले गैंडे को मिलेगा लाभ
असम लंबे समय से एक सींग वाले भारतीय गैंडे के संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर जाना जाता है। राज्य में इस प्रजाति की महत्वपूर्ण आबादी मौजूद है। नए संरक्षित क्षेत्र का विस्तार गैंडे समेत कई अन्य प्रजातियों के लिए अतिरिक्त आवास और सुरक्षित क्षेत्र उपलब्ध करा सकता है।
गैंडे मुख्य रूप से घास के मैदानों और आर्द्र क्षेत्रों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों का संरक्षण उनके भोजन और प्रजनन के लिए आवश्यक है। वन क्षेत्रों और आर्द्रभूमियों के संरक्षण से केवल गैंडे ही नहीं, बल्कि पक्षियों, सरीसृपों, उभयचरों और अन्य जीव-जंतुओं को भी फायदा होता है।
इसलिए संरक्षित वन क्षेत्र में वृद्धि को केवल पेड़ों की सुरक्षा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और उससे जुड़े जीवों के संरक्षण की दिशा में कदम है।
हाथियों और बाघों के लिए भी महत्वपूर्ण
असम के जंगल एशियाई हाथियों और बाघों के लिए भी महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र हैं। बड़े स्तनधारियों को अपने जीवनचक्र के दौरान काफी बड़े क्षेत्र की आवश्यकता होती है। यदि जंगल अलग-अलग छोटे हिस्सों में बंट जाते हैं, तो वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में जंगलों के बीच मौजूद प्राकृतिक गलियारों को संरक्षित करना महत्वपूर्ण हो जाता है। नए संरक्षित क्षेत्र के विस्तार से ऐसे गलियारों को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
हाथियों के मामले में यह पहल मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भी उपयोगी हो सकती है, बशर्ते संरक्षण योजना में वन्यजीवों की पारंपरिक आवाजाही और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए।
जैव विविधता संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा
असम की जैव विविधता केवल बड़े वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। राज्य के जंगलों और आर्द्रभूमियों में हजारों पौधों, पक्षियों, कीटों, मछलियों और छोटे जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं।
संरक्षित वन क्षेत्र बढ़ने से प्राकृतिक आवासों पर विकास गतिविधियों का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। इससे वन पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता बनाए रखने और प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालिक संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
इसके अलावा, स्वस्थ जंगल कार्बन को अवशोषित करने, मिट्टी के कटाव को रोकने और जल चक्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस लिहाज से वन संरक्षण जलवायु परिवर्तन से निपटने की व्यापक रणनीति का भी हिस्सा है।
पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए बड़ा कदम
असम सरकार ने संरक्षित वन क्षेत्र के विस्तार को राज्य की पारिस्थितिक सुरक्षा और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण से जोड़कर देखा है। वन क्षेत्र बढ़ने से नदियों, आर्द्रभूमियों और आसपास के प्राकृतिक इलाकों की सुरक्षा में भी मदद मिल सकती है।
जंगलों का संरक्षण स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने और वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने में योगदान देता है। इसके अलावा, वन भूमि मिट्टी को स्थिर रखने और बाढ़ तथा कटाव के प्रभाव को कम करने में भी भूमिका निभाती है।
असम जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य में जंगलों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि, इन क्षेत्रों के संरक्षण के साथ वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी होगी।
स्थानीय समुदायों की भूमिका अहम
वन संरक्षण की किसी भी बड़ी योजना की सफलता स्थानीय समुदायों की भागीदारी से जुड़ी होती है। असम के कई ग्रामीण और आदिवासी समुदाय लंबे समय से जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहे हैं।
नए संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में स्थानीय लोगों की आजीविका, पारंपरिक अधिकारों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखना जरूरी होगा। यदि संरक्षण और स्थानीय विकास के बीच संतुलन बनाया जाता है, तो नई संरक्षित भूमि लंबे समय तक प्रभावी ढंग से सुरक्षित रह सकती है।
वन्यजीव संरक्षण के साथ शिक्षा, जागरूकता और वैकल्पिक आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना भी इस दिशा में उपयोगी हो सकता है।
असम की संरक्षण नीति को नई दिशा
403.62 वर्ग किलोमीटर संरक्षित वन क्षेत्र का विस्तार असम की संरक्षण नीति में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इससे राज्य के वन्यजीव आवासों को विस्तार मिलेगा और अलग-अलग संरक्षण क्षेत्रों के बीच बेहतर संपर्क स्थापित करने की संभावना बढ़ेगी।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने भी इस कदम को असम के जंगलों और वन्यजीव आवासों को मजबूत करने वाला बताया है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिक सुरक्षा और राज्य की प्राकृतिक विरासत की दीर्घकालिक स्थिरता को बढ़ावा देना है।
आगे की चुनौतियां क्या होंगी?
संरक्षित क्षेत्र घोषित करना संरक्षण की दिशा में पहला कदम है। इसके बाद वास्तविक चुनौती इन क्षेत्रों की प्रभावी निगरानी, अवैध शिकार पर नियंत्रण, वन अतिक्रमण रोकने, मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने और प्राकृतिक आवासों को स्वस्थ बनाए रखने की होगी।
इसके लिए पर्याप्त वनकर्मी, वैज्ञानिक निगरानी, आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदायों के साथ सहयोग की आवश्यकता होगी। साथ ही, जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम के प्रभावों को भी संरक्षण योजनाओं में शामिल करना होगा।










