भागलपुर: भागलपुर की लाइफलाइन माने जाने वाले विक्रमशिला सेतु को मरम्मत के लिए बंद करने की तैयारी के बीच विरोध शुरू हो गया है। नेताओं और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि पुल को बंद करने से पहले लोगों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था की जाए। उनका तर्क है कि अचानक पुल बंद होने से भागलपुर के साथ-साथ नवगछिया, कोसी और सीमांचल के लोगों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होगी।
विक्रमशिला सेतु पर क्षतिग्रस्त हिस्से की स्थायी मरम्मत और पुनर्निर्माण का काम होना है। इसके लिए अस्थायी बेली ब्रिज को हटाकर नया सुपर स्ट्रक्चर तैयार किया जाना प्रस्तावित है। इस काम के दौरान पुल पर वाहनों का परिचालन पूरी तरह रोकना जरूरी बताया जा रहा है। हाल में बिहार राज्य पुल निर्माण निगम की ओर से तीन महीने के मेगा ब्लॉक का कार्यक्रम सामने आया है।
लेकिन पुल बंद होने की खबर के साथ ही सबसे बड़ा सवाल वैकल्पिक यातायात व्यवस्था को लेकर खड़ा हो गया है। नेताओं का कहना है कि जब तक लोगों के आने-जाने का ठोस इंतजाम नहीं होता, तब तक पुल को बंद करने का फैसला नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल, विक्रमशिला सेतु भागलपुर को उत्तर बिहार और सीमांचल के कई जिलों से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इसके जरिए रोजाना बड़ी संख्या में यात्री, मालवाहक वाहन, व्यापारी और दूसरे जरूरी कामों से यात्रा करने वाले लोग आवाजाही करते हैं। पुल बंद होने पर इन सभी को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ेगा।
भागलपुर के जदयू सांसद अजय मंडल ने भी पुल बंद करने के समय और वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भागलपुर के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर छठ पर्व के बाद पुल पर परिचालन बंद करने और उसके बाद स्टील बैली ब्रिज का निर्माण कराने की मांग की है।
वहीं दूसरी ओर बिहार सरकार के ऊर्जा मंत्री और गोपालपुर विधायक बूलो मंडल की ओर से 29 अगस्त से पुल पर परिचालन बंद करने की बात कही गई है। इस तरह पुल बंद करने की तारीख को लेकर भी राजनीतिक स्तर पर अलग-अलग राय सामने आई है।
नेताओं का कहना है कि सिर्फ डायवर्जन का ऐलान कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यह देखना जरूरी है कि भारी वाहनों, बसों, एंबुलेंस और निजी वाहनों को किस रास्ते से भेजा जाएगा और उस रास्ते पर पहले से मौजूद ट्रैफिक का दबाव कितना है।
पुल बंद होने के बाद मुंगेर और सुल्तानगंज की ओर जाने वाले मार्गों पर वाहनों का दबाव बढ़ने की आशंका है। इससे पहले भी विक्रमशिला सेतु पर आवागमन बाधित होने के बाद वैकल्पिक मार्गों पर यातायात प्रभावित हो चुका है।
सरकार की ओर से पहले ही अधिकारियों को विक्रमशिला सेतु की समस्या के दौरान वैकल्पिक यातायात व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मई में अधिकारियों से लोगों के लिए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करने और स्टीमर के परिचालन में सुरक्षा मानकों की निगरानी के निर्देश दिए थे।
ऐसे में अब नेताओं का कहना है कि पुल की मरम्मत जरूरी है, लेकिन इसके साथ आम लोगों की परेशानी को भी ध्यान में रखना होगा। उनका कहना है कि निर्माण कार्य लंबे समय तक चलने वाला है, इसलिए वैकल्पिक मार्ग, फेरी सेवा और ट्रैफिक डायवर्जन की पूरी योजना पहले से सार्वजनिक की जानी चाहिए।
विक्रमशिला सेतु को लेकर यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं है। पुल बंद होने का सीधा असर व्यापार, परिवहन, इलाज, शिक्षा, नौकरी और कृषि उत्पादों की आवाजाही पर पड़ सकता है। भागलपुर से सीमांचल के जिलों तक जाने वाले लोगों को अतिरिक्त दूरी और समय दोनों का सामना करना पड़ेगा।
खासकर मालवाहक वाहनों के लिए समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है। वैकल्पिक मार्ग लंबा होने पर ईंधन और परिवहन लागत बढ़ेगी। इसका असर सामान की कीमतों पर भी पड़ सकता है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि सरकार को पुल बंद करने से पहले मालवाहक वाहनों के लिए अलग से ट्रैफिक प्लान तैयार करना चाहिए।
इसके अलावा आपातकालीन सेवाओं को लेकर भी सवाल हैं। यदि कोई मरीज भागलपुर से दूसरे जिले या दूसरे जिले से भागलपुर इलाज के लिए जा रहा है, तो लंबा डायवर्जन उसके लिए परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए एंबुलेंस के लिए वैकल्पिक मार्ग को प्राथमिकता देने की मांग भी महत्वपूर्ण होगी।
वर्तमान में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पुल की मरम्मत का काम भी समय पर हो और लोगों को आवागमन में कम से कम परेशानी हो। सरकार का लक्ष्य स्थायी मरम्मत पूरी करके पुल को दोबारा सुरक्षित तरीके से चालू करना है। करीब 98 करोड़ रुपये की लागत से होने वाले काम की जिम्मेदारी एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शन को दी गई है और 30 नवंबर 2026 तक पुल को फिर से चालू करने का लक्ष्य बताया गया है।
पुल की मरम्मत का काम इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मई में विक्रमशिला सेतु का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर गंगा में गिर गया था। इसके बाद यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई और अस्थायी व्यवस्था के जरिए संपर्क बहाल किया गया। अब स्थायी समाधान के लिए बड़े स्तर पर निर्माण कार्य किया जाना है।
नेताओं का कहना है कि सरकार को लोगों को यह स्पष्ट बताना चाहिए कि पुल कब से पूरी तरह बंद होगा, कितने दिनों तक बंद रहेगा, भारी वाहनों के लिए कौन सा रास्ता होगा, छोटे वाहनों के लिए क्या व्यवस्था होगी और नदी के रास्ते आवागमन की सुविधा किस तरह उपलब्ध कराई जाएगी।
फिलहाल विक्रमशिला सेतु बंद करने को लेकर राजनीतिक विरोध तेज हो रहा है। जनप्रतिनिधियों की मांग है कि पहले वैकल्पिक मार्ग और यातायात व्यवस्था जमीन पर तैयार की जाए, उसके बाद ही पुल को पूरी तरह बंद किया जाए। लोगों की नजर अब प्रशासन की ओर है कि वह पुल बंद होने से पहले कितनी प्रभावी तैयारी करता है।











