बिहार में SC/ST के नाम पर कथित फर्जी केस कराने का नेटवर्क: पत्नियां दर्ज करातीं शिकायत, पति बनते गवाह

बिहार में SC/ST एक्ट के नाम पर कथित फर्जी केस कराने वाले नेटवर्क का दावा सामने आया है। एजेंट के 2.5 लाख पैकेज और गवाह बनाने की बात की जांच होगी।
बिहार में SC/ST के नाम पर कथित फर्जी केस कराने का नेटवर्क: पत्नियां दर्ज करातीं शिकायत, पति बनते गवाह
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पटना। बिहार में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों को लेकर एक कथित संगठित नेटवर्क का मामला सामने आने के बाद पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने कई सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि कुछ लोग आपसी विवाद, जमीन-जायदाद, पैसे के लेनदेन या व्यक्तिगत रंजिश जैसे मामलों को SC/ST एक्ट के तहत गंभीर आपराधिक मुकदमे में बदलने के लिए कथित तौर पर पूरा नेटवर्क संचालित कर रहे हैं। इस नेटवर्क में महिलाओं को शिकायतकर्ता और उनके पतियों या परिचित पुरुषों को गवाह बनाए जाने की बात कही जा रही है। सबसे चौंकाने वाला दावा एक कथित एजेंट से जुड़ा है, जिसके बारे में बताया जा रहा है कि वह करीब 2.5 लाख रुपये में पूरा 'पैकेज' उपलब्ध कराने की बात करता था और रकम को नेटवर्क से जुड़े लोगों के बीच बांटे जाने की बात सामने आई है।

हालांकि इस तरह के आरोपों को अभी जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल आरोप लगने से यह साबित नहीं होता कि उसने फर्जी मुकदमा कराया या किसी आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा था। पुलिस की जांच, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, कॉल डिटेल, बैंक लेनदेन, शिकायतकर्ताओं और गवाहों के बयान तथा अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही मामले की वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।

बताया जा रहा है कि कथित नेटवर्क का तरीका बेहद सुनियोजित होने का आरोप है। इसमें पहले किसी व्यक्ति या परिवार के साथ विवाद की स्थिति तैयार की जाती थी या पहले से चल रहे विवाद को कानूनी मुकदमे में बदलने का रास्ता तलाशा जाता था। इसके बाद SC/ST एक्ट समेत अन्य गंभीर धाराओं को शिकायत में शामिल कराने की कोशिश की जाती थी। आरोपों के मुताबिक, शिकायतकर्ता के तौर पर महिला को सामने रखा जाता और उसके पति या परिवार से जुड़े किसी व्यक्ति को घटनास्थल का प्रत्यक्षदर्शी या गवाह बताया जाता। इस तरह शिकायत में एक ऐसा घटनाक्रम तैयार करने की कोशिश की जाती, जिससे पुलिस के सामने मामला प्रथम दृष्टया गंभीर दिखाई दे।

कथित तौर पर एजेंट इस पूरी प्रक्रिया को एक 'पैकेज' की तरह पेश करते थे। दावा है कि करीब 2.5 लाख रुपये की रकम में शिकायत तैयार कराने से लेकर मुकदमा दर्ज कराने और गवाह उपलब्ध कराने तक की व्यवस्था की बात कही जाती थी। रकम के बंटवारे में अलग-अलग लोगों की हिस्सेदारी होने का भी आरोप है। हालांकि इन दावों में कितनी सच्चाई है और वास्तव में कितने मामलों में ऐसा हुआ, इसका पता विस्तृत पुलिस जांच के बाद ही चल सकेगा।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि किसी कानून का इस्तेमाल किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाने के लिए किया जाता है तो जांच एजेंसियां उस साजिश तक कैसे पहुंचेंगी। ऐसे मामलों में केवल शिकायत की भाषा को आधार बनाना पर्याप्त नहीं हो सकता। पुलिस को घटनास्थल, मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, CCTV फुटेज, डिजिटल चैट, बैंकिंग लेनदेन और कथित गवाहों की मौजूदगी जैसे पहलुओं की जांच करनी पड़ सकती है। अगर शिकायत में बताए गए घटनास्थल पर गवाह की मौजूदगी ही तकनीकी साक्ष्यों से गलत साबित होती है तो यह जांच की दिशा बदलने वाला महत्वपूर्ण तथ्य हो सकता है।

बिहार में SC/ST मामलों की जांच से जुड़े हालिया अदालती रिकॉर्ड भी बताते हैं कि जांच के दौरान जुटाए गए स्वतंत्र साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सितंबर 2026 में पटना हाई कोर्ट के एक मामले में अदालत ने यह नोट किया था कि जांच के दौरान स्वतंत्र गवाहों के बयान और शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराई गई वीडियो क्लिप आरोपितों की कथित भागीदारी का समर्थन नहीं करती थी। अदालत ने भूमि विवाद, काउंटर केस और जांच में सामने आए तथ्यों को ध्यान में रखते हुए संबंधित आरोपितों को अग्रिम जमानत का लाभ दिया था।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि SC/ST एक्ट के तहत दर्ज हर मुकदमे को स्वतः फर्जी मानना सही नहीं होगा। इस कानून का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जातीय उत्पीड़न, अपमान, हिंसा और भेदभाव से कानूनी सुरक्षा देना है। इसलिए किसी वास्तविक पीड़ित की शिकायत को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि किसी दूसरे मामले में फर्जी शिकायत के आरोप सामने आए हैं। प्रत्येक केस में उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच जरूरी है।

दूसरी तरफ, यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी ने जानबूझकर झूठी कहानी तैयार कर निर्दोष लोगों को गंभीर धाराओं में फंसाने की कोशिश की, तो यह भी कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का गंभीर मामला होगा। ऐसे मामलों में कथित शिकायतकर्ता के साथ-साथ फर्जी गवाह तैयार करने वाले, एजेंट की भूमिका निभाने वाले और आर्थिक लेनदेन में शामिल लोगों की भूमिका की जांच जरूरी हो सकती है।

कथित नेटवर्क में 'पति गवाह' बनाए जाने का आरोप भी जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है। यदि एक ही प्रकार के कई मामलों में शिकायतकर्ता और गवाहों का पैटर्न समान मिलता है, उनके बयान में एक जैसी भाषा या घटनाक्रम दिखाई देता है और मोबाइल लोकेशन अथवा दूसरे तकनीकी साक्ष्य उनकी मौजूदगी से मेल नहीं खाते, तो जांच एजेंसी को यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि शिकायत स्वतः दर्ज हुई थी या किसी तीसरे व्यक्ति की भूमिका थी।

इसी तरह कथित 2.5 लाख रुपये के पैकेज की बात की भी वित्तीय जांच के जरिए पुष्टि की जा सकती है। यदि किसी व्यक्ति ने इस तरह के मुकदमे कराने के लिए पैसा लिया था, तो बैंक ट्रांसफर, UPI भुगतान, नकद लेनदेन, फोन कॉल, चैट और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। जांच एजेंसियां यह भी देख सकती हैं कि एक ही व्यक्ति या समूह से जुड़े कितने मुकदमे अलग-अलग थानों में दर्ज हुए और उन मामलों में शिकायतकर्ता तथा गवाहों के बीच पहले से क्या संबंध था।

किसी मामले में FIR दर्ज होना अपने आप में आरोपों के सही साबित होने का प्रमाण नहीं है। FIR जांच की शुरुआत होती है। पुलिस को आरोपों की पुष्टि के लिए साक्ष्य जुटाने होते हैं और अंततः अदालत में आरोपों का परीक्षण होता है। इसी तरह किसी व्यक्ति का गवाह बनना भी यह साबित नहीं करता कि उसने जानबूझकर झूठ बोला है। गवाह की विश्वसनीयता का आकलन उसके बयान और उपलब्ध स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।

बिहार पुलिस के State Crime Records Bureau के पोर्टल पर भी FIR और अपराध संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध कराए जाते हैं, हालांकि विभाग स्वयं स्पष्ट करता है कि पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़े जिलों और इकाइयों से प्राप्त स्रोतों पर आधारित हैं तथा प्रमाणित रिकॉर्ड के लिए संबंधित जिला या इकाई से संपर्क किया जाना चाहिए।

इस कथित नेटवर्क की जांच में यह भी देखा जाना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायतकर्ताओं ने पहले किसी स्थानीय विवाद, जमीन के झगड़े, पैसे के लेनदेन या व्यक्तिगत रंजिश को लेकर पुलिस या पंचायत स्तर पर शिकायत की थी या नहीं। यदि बाद में अचानक गंभीर धाराओं वाला मुकदमा दर्ज कराया गया, तो उससे पहले और बाद की घटनाओं की पूरी टाइमलाइन तैयार करना जांच में मददगार हो सकता है।

कई मामलों में विवाद दो पक्षों के बीच शुरू होता है और बाद में दोनों तरफ से शिकायतें दर्ज हो जाती हैं। ऐसे मामलों में पुलिस के सामने चुनौती यह होती है कि वह किसी एक पक्ष के आरोप को अंतिम सत्य मानने के बजाय दोनों पक्षों की शिकायत, स्वतंत्र गवाहों के बयान और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों की जांच करे। अदालतों ने भी कई मामलों में संबंधित और रुचि रखने वाले गवाहों की गवाही को सावधानी से परखने की जरूरत बताई है।

फिलहाल 2.5 लाख रुपये के कथित पैकेज और उसमें अलग-अलग लोगों की हिस्सेदारी से जुड़े दावों की वास्तविकता जांच का विषय है। यदि पुलिस के पास एजेंट की बातचीत, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, चैट, भुगतान का रिकॉर्ड या ऐसे अन्य दस्तावेज उपलब्ध होते हैं, तो उनसे कथित नेटवर्क की संरचना और उसकी कार्यप्रणाली को समझने में मदद मिल सकती है। वहीं यदि ऐसे ठोस साक्ष्य नहीं मिलते हैं, तो केवल मौखिक आरोपों के आधार पर किसी बड़े नेटवर्क के अस्तित्व का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि गंभीर और संवेदनशील कानूनों के इस्तेमाल में जांच की गुणवत्ता कितनी महत्वपूर्ण है। वास्तविक पीड़ितों को त्वरित न्याय और सुरक्षा मिलना जरूरी है, वहीं यदि किसी निर्दोष को झूठे मुकदमे में फंसाने की साजिश होती है तो उसके खिलाफ भी कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए निष्पक्ष जांच, तकनीकी साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।

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