पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की भारत की नीति ने पिछले एक दशक में बड़ी छलांग लगाई है। आज देश में E20 पेट्रोल यानी करीब 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उपलब्ध है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एथेनॉल ब्लेंडिंग 2013-14 में 1.5% से भी कम थी, जो 2025-26 में बढ़कर 20% हो गई।
बिजनेस न्यूज़: भारत सरकार एथनॉल ब्लेंडिंग की सफलता को अब बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) के क्षेत्र में दोहराने की कोशिश कर रही है। CBG के अनिवार्य मिश्रण से कचरे को ईंधन में बदलने, किसानों की आय बढ़ाने और आयातित गैस पर निर्भरता घटाने की उम्मीद है। भारत में स्वच्छ ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की कोशिशों के बीच बायोगैस सेक्टर एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है।
जिस तरह सरकार ने पेट्रोल में एथनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा देकर एक बड़ा लक्ष्य हासिल किया, अब उसी नीति मॉडल का इस्तेमाल कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। इसका उद्देश्य कृषि अवशेष, पशु अपशिष्ट और जैविक कचरे को उपयोगी ईंधन में बदलना है।
एथनॉल से मिली सरकार को बड़ी सीख
भारत में एथनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को शुरुआती वर्षों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उत्पादन क्षमता, कीमत, खरीद और आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं के कारण इस योजना को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी। बाद में सरकार ने खरीद की व्यवस्था मजबूत की, कीमतों को लेकर स्पष्टता बढ़ाई और तेल कंपनियों के लिए ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया।
इस नीति का असर यह हुआ कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल किया गया। इससे घरेलू कृषि उत्पादों के लिए एक नया बाजार तैयार हुआ और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में मदद मिली।
CBG के लिए SATAT योजना की शुरुआत
बायोगैस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 2018 में SATAT यानी Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation पहल शुरू की थी। इसका उद्देश्य देश में बड़े पैमाने पर कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट स्थापित करना था। हालांकि, CBG सेक्टर को एथनॉल की तरह तेजी से बढ़ने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ा।
प्लांट के लिए लगातार कच्चे माल की उपलब्धता, निवेश, लॉजिस्टिक्स और उत्पाद की निश्चित खरीद जैसी समस्याओं ने इस क्षेत्र की रफ्तार को प्रभावित किया। अब सरकार मांग को सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है।

CNG और PNG में CBG मिश्रण का लक्ष्य
सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन यानी CGD कंपनियों के लिए CBG मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। योजना के तहत CNG और PNG की आपूर्ति में CBG की हिस्सेदारी को धीरे-धीरे बढ़ाने का प्रावधान है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह लक्ष्य 1 प्रतिशत से शुरू होकर 2028-29 तक 5 प्रतिशत तक पहुंचने की दिशा में है।इससे CBG उत्पादकों को एक बड़ा फायदा मिल सकता है, क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद के लिए संभावित बाजार और खरीदारों की बेहतर दृश्यता मिलेगी। मांग सुनिश्चित होने पर निजी कंपनियों के लिए नए बायोगैस प्लांट में निवेश करने का आकर्षण भी बढ़ सकता है।
रिलायंस, अदाणी और GAIL जैसी कंपनियों की बढ़ी दिलचस्पी
CBG सेक्टर में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी ऊर्जा कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ रही है। रिलायंस, अदाणी समूह और GAIL जैसी कंपनियां बायोगैस से जुड़े प्रोजेक्ट्स और सप्लाई चेन में अवसर तलाश रही हैं। इसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। किसानों से कृषि अवशेष और अन्य जैविक सामग्री खरीदने से उनके लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती है कच्चे माल की सप्लाई
हालांकि CBG सेक्टर की संभावनाएं बड़ी हैं, लेकिन इसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। एथनॉल के मुकाबले बायोगैस के लिए कच्चे माल की सप्लाई चेन ज्यादा जटिल है। पराली, गोबर और नगर निकायों से निकलने वाले गीले कचरे को नियमित रूप से एकत्र करके बायोगैस प्लांट तक पहुंचाना जरूरी है। अलग-अलग क्षेत्रों में कचरे की मात्रा और गुणवत्ता में अंतर होने से उत्पादन लागत और गैस की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा, बायोगैस प्लांट स्थापित करने के लिए शुरुआती निवेश भी काफी अधिक हो सकता है। इसलिए लंबे समय तक स्थिर नीतियां, वित्तीय सहायता और मजबूत लॉजिस्टिक्स इस सेक्टर की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
किसानों से लेकर शहरों तक को फायदा
अगर CBG सेक्टर बड़े पैमाने पर सफल होता है तो इसका फायदा केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। किसानों को कृषि अवशेषों से अतिरिक्त आय मिल सकती है और पराली जलाने की समस्या कम हो सकती है। पशुपालकों के लिए गोबर एक आर्थिक संसाधन बन सकता है। दूसरी ओर, शहरों में जैविक कचरे के बेहतर प्रबंधन से लैंडफिल पर दबाव घट सकता है। इससे कचरे से ऊर्जा पैदा करने और प्रदूषण कम करने के लक्ष्य को भी बढ़ावा मिलेगा।
लंबी अवधि में घरेलू स्तर पर CBG उत्पादन बढ़ने से आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर उत्पादन क्षमता, लागत, वितरण नेटवर्क और उपभोक्ताओं तक इसकी पहुंच पर निर्भर करेगा।












