बंगाल-तमिलनाडु ने मतदाता सूची पुनरीक्षण पर रोक की मांग की, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

बंगाल-तमिलनाडु ने मतदाता सूची पुनरीक्षण पर रोक की मांग की, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

भारत में आगामी चुनावों की तैयारी के बीच मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के राजनीतिक दलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। 

SIR Controversy: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के खिलाफ पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के कई राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा दाखिल याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी करते हुए इस मामले में 24 नवंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। 

अदालत ने याचिकाकर्ताओं से यह भी कहा कि वे एसआईआर प्रक्रिया को हर मतदाता तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास करें। वहीं, अंतरिम रोक की मांग पर भी नोटिस जारी किया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी।

क्या है मामला?

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें डीएमके (DMK) और टीएमसी (TMC) जैसे प्रमुख दल शामिल थे। दोनों दलों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग द्वारा SIR प्रक्रिया जल्दबाजी में की जा रही है, जिससे लाखों मतदाता अपने नाम जोड़ने या संशोधित करने से वंचित रह सकते हैं।वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, जो याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए, ने अदालत से मांग की कि आयोग को SIR प्रक्रिया पर रोक लगानी चाहिए। 

इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, आप मतदाता सूची में सुधार का विरोध क्यों कर रहे हैं? आप सुधार प्रक्रिया को बेहतर बनाने के सुझाव दे सकते हैं, रोक की मांग क्यों? हालांकि अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक की मांग पर स्पष्टीकरण मांगा।

कपिल सिब्बल का तर्क - मानसून और फसल कटाई से प्रभावित होगा पुनरीक्षण

कपिल सिब्बल ने कहा कि नवंबर और दिसंबर के महीनों में दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्व मानसून के कारण भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति रहती है। ऐसे में बीएलओ (Booth Level Officers), ईआरओ (Electoral Registration Officers) और एईआरओ (Assistant EROs) बाढ़ राहत कार्यों में व्यस्त रहते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खुद बाढ़ की तैयारी में लगे रहते हैं, जिससे वे मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाएंगे।सिब्बल ने आगे कहा कि दिसंबर और जनवरी में किसानों के लिए फसल कटाई का समय होता है। उस दौरान किसान अपने घरों में नहीं मिलेंगे। इसके बाद क्रिसमस और पोंगल की छुट्टियां आती हैं। ऐसे में 24 दिसंबर से 18 जनवरी तक कोई भी नागरिक SIR में भाग नहीं ले सकेगा,”
उन्होंने दलील दी।

‘पहले चलता था लंबा अभियान, अब सिर्फ एक महीना’

सिब्बल ने कहा कि पहले चुनाव आयोग SIR प्रक्रिया को कई महीनों तक चलाता था ताकि अधिक से अधिक लोग मतदाता सूची में अपना नाम जोड़ या संशोधित कर सकें। लेकिन इस बार आयोग ने इसे सिर्फ एक महीने में पूरा करने की योजना बनाई है। इससे लाखों नागरिकों के मताधिकार से वंचित होने का खतरा बढ़ गया है।

टीएमसी सांसदों ने अपनी याचिका में बताया कि पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में 4G और 5G इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिसके चलते लोग चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर अपने डेटा में सुधार या नाम जोड़ने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्रक्रिया पर निर्भर रहना ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों के लोगों के लिए मताधिकार से वंचित होने के समान है।

चुनाव आयोग की दलील

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि मतदाता सूची के अद्यतन में पारदर्शिता जरूरी है और राज्यों को इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की बजाय सहयोग करना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, जब मतदाता सूची में सुधार की बात आती है तो हर राज्य यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह कितना पिछड़ा है।

सुनवाई के दौरान एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दावा किया कि चुनाव आयोग के पास ऐसा सॉफ्टवेयर उपलब्ध है जो डुप्लीकेट मतदाता प्रविष्टियों को पहचानकर हटाने में सक्षम है, लेकिन आयोग उसका इस्तेमाल नहीं कर रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से पूछा कि क्या वह इस तकनीक का उपयोग करके मतदाता सूची की पारदर्शिता और सटीकता बढ़ाने के लिए तैयार है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से 24 नवंबर तक लिखित जवाब दाखिल करने को कहा है। इसके बाद 26 नवंबर को अगली सुनवाई होगी।

 

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