ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल देखा गया। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से सप्लाई बाधित, भारत में महंगाई का खतरा बढ़ा और निवेशकों में भू-राजनीतिक तनाव के कारण सावधानी की चेतावनी।
Crude Oil Price Today: पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और ईरानी सरकार के होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के फैसले के चलते कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन तेज उछाल देखा गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संघर्ष जितना लंबा चलेगा, तेल की कीमतों में उतनी ही तेजी बनी रहेगी। वैश्विक बाजार में सप्लाई बाधित होने की आशंका ने ब्रेंट क्रूड और अन्य कच्चे तेल वायदा दामों को ऊपर धकेला है।
ब्रेंट क्रूड की कीमतें और उछाल
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार मंगलवार को ब्रेंट क्रूड वायदा 1.4 प्रतिशत यानी 1.10 डॉलर बढ़कर 78.83 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। सोमवार को यह कीमत 82.37 डॉलर तक पहुंच चुकी थी, जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है। हालांकि इसके बाद कुछ नरमी आई, लेकिन दिन की समाप्ति पर ब्रेंट क्रूड ने 6.7 प्रतिशत की मजबूती के साथ बंद किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तेजी पिछले तीन दिनों से लगातार जारी है और ईरान-इजरायल संघर्ष इस समर्थन का मुख्य कारण है। यदि युद्ध और तनाव लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है।
होर्मुज स्ट्रेट पर बाधा
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में से एक है। इस रूट से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई होती है। ईरानी सरकार के बंद करने के फैसले से वैश्विक तेल सप्लाई बाधित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह बाधा लंबी अवधि तक बनी रहती है, तो कच्चे तेल के दाम 100 से 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। गंभीर स्थिति में यह 120 से 140 डॉलर तक भी जा सकता है।
तेल उत्पादक देशों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास अतिरिक्त 4 से 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की उत्पादन क्षमता है। लेकिन इस अतिरिक्त सप्लाई का बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर है, जिससे सप्लाई बाधा का खतरा अभी भी बना हुआ है।
भारत पर असर
भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 85 प्रतिशत जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है। कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं।
इससे रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाएंगी और आम जनता को महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल के दाम लंबे समय तक ऊंचे बने रहते हैं, तो यह देश की आर्थिक स्थिति और उपभोक्ता खर्च पर भी दबाव डाल सकता है।
निवेशकों के लिए संकेत
तेल के दामों में लगातार उछाल और भू-राजनीतिक तनाव निवेशकों के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई बाधा और बढ़ती कीमतें शेयर बाजार और ऊर्जा स्टॉक्स पर भी असर डाल सकती हैं। निवेशक इस समय सावधानी से अपने पोर्टफोलियो को देख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर ऊर्जा और कच्चे तेल संबंधित निवेशों में अपनी स्थिति समायोजित कर सकते हैं।












