महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल को कलिना लाइब्रेरी भ्रष्टाचार मामले में मुंबई की विशेष अदालत ने आरोपमुक्त कर दिया। ACB ने उन पर निजी डेवलपर को फायदा पहुंचाने और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप लगाए थे, लेकिन अदालत को अपराध से लाभ या quid pro quo का पर्याप्त सबूत नहीं मिला।
मुंबई: महाराष्ट्र के मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) नेता छगन भुजबल को मुंबई की विशेष सांसद-विधायक अदालत से पुराने भ्रष्टाचार मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने मुंबई विश्वविद्यालय के कलिना कैंपस में सेंट्रल लाइब्रेरी निर्माण से जुड़े 2015 के एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) मामले में भुजबल को आरोपमुक्त कर दिया।
भुजबल के साथ मामले में आरोपी रहे कुछ पूर्व लोक निर्माण विभाग (PWD) अधिकारियों को भी अदालत ने आरोपमुक्त किया। ACB ने आरोप लगाया था कि भुजबल के PWD मंत्री रहते एक निजी डेवलपर को फायदा पहुंचाने के लिए लाइब्रेरी परियोजना और जमीन से जुड़ी प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं की गईं और इससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।
अदालत के इस फैसले के साथ भुजबल के खिलाफ उनके PWD मंत्री कार्यकाल से जुड़े ACB के लंबित मामलों में यह आखिरी प्रमुख मामला भी समाप्त हो गया।
2015 में दर्ज हुआ था मामला
कलिना लाइब्रेरी मामला करीब एक दशक से अधिक समय से कानूनी प्रक्रिया में था। ACB ने जून 2015 में भुजबल और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। उस समय भुजबल महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग के मंत्री थे।
जांच एजेंसी का आरोप था कि मुंबई विश्वविद्यालय की कलिना स्थित करीब चार एकड़ जमीन को सेंट्रल लाइब्रेरी के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया जाना था। ACB के अनुसार, 2009 में इस जमीन के एक हिस्से पर लाइब्रेरी निर्माण के लिए प्रक्रिया शुरू की गई, जबकि शेष जमीन को एक निजी डेवलपर को 99 साल की लीज पर देने का निर्णय लिया गया।
जांच एजेंसी ने इस लीज की दर को लेकर भी सवाल उठाए थे। आरोप था कि जमीन को महज 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर 99 साल के लिए लीज पर दिया गया। ACB ने दावा किया था कि इस पूरी प्रक्रिया से राज्य सरकार को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
भुजबल पर क्या थे आरोप?
ACB का आरोप था कि तत्कालीन PWD मंत्री भुजबल और विभाग के कुछ अधिकारियों ने लाइब्रेरी परियोजना से जुड़ी प्रक्रिया में निजी डेवलपर को फायदा पहुंचाने के लिए अपने पद का कथित दुरुपयोग किया।
जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि मुंबई विश्वविद्यालय की जमीन से जुड़े फैसलों और लाइब्रेरी निर्माण के लिए अपनाई गई प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं। एजेंसी के अनुसार, इससे राज्य को कथित तौर पर करीब ₹79 करोड़ का नुकसान हुआ।
ACB ने यह भी आरोप लगाया था कि संबंधित निजी कंपनी की ओर से भुजबल से जुड़े एक ट्रस्ट को धन दिया गया और इसे कथित तौर पर परियोजना से जुड़े लाभ के बदले भुगतान यानी ‘quid pro quo’ के रूप में देखा गया।
हालांकि, अदालत ने भुजबल के खिलाफ ऐसे संबंध को स्थापित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं पाई।
अदालत ने कहा- अपराध से हुई कमाई का पर्याप्त सबूत नहीं
अदालत ने भुजबल को आरोपमुक्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष उनके आधिकारिक कार्यों और कथित आपराधिक उद्देश्य के बीच आवश्यक संबंध स्थापित नहीं कर सका।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने यह भी कहा कि भुजबल और परियोजना से जुड़े कथित आपराधिक उद्देश्य के बीच आवश्यक कड़ी साबित नहीं हुई। अदालत को उनके खिलाफ कथित अपराध से हुई कमाई या ‘quid pro quo’ को स्थापित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं मिली।
अदालत ने कथित ‘इनविजिबल सपोर्ट’ और ‘मोडस ऑपरेंडी’ जैसे अभियोजन के तर्कों को भी स्वतंत्र सामग्री से समर्थित नहीं माना। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि भुजबल और संबंधित PWD अधिकारियों के बीच किसी स्पष्ट संवाद, निर्देश या समझौते का पर्याप्त स्वतंत्र सबूत नहीं था।
BOT मॉडल पर भी अदालत की टिप्पणी
मामले में लाइब्रेरी परियोजना के लिए बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर यानी BOT मॉडल का भी उल्लेख हुआ था।
अदालत के अवलोकन के अनुसार, BOT प्रस्ताव भुजबल की कथित भूमिका से पहले का था। रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2007 में हुई उस बैठक में BOT मॉडल पर आगे बढ़ने का फैसला लिया गया था, जिसमें भुजबल शामिल नहीं थे। इसके बाद परियोजना कई विभागीय स्तरों से होकर गुजरी और फिर खुली निविदा जारी की गई।
इस तथ्य को अदालत ने अभियोजन की उस कहानी के संदर्भ में देखा जिसमें भुजबल पर पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया गया था।
अन्य आरोपियों को भी राहत
इस मामले में भुजबल के अलावा PWD के तत्कालीन अधिकारियों और अन्य लोगों पर भी आरोप लगाए गए थे। विशेष अदालत ने कई अन्य आरोपियों को भी आरोपमुक्त किया।
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, विशेष न्यायाधीश महेश के. जाधव ने भुजबल के साथ तत्कालीन PWD डिविजनल डिप्टी इंजीनियर गजानन अनंत सावंत, तत्कालीन एग्जीक्यूटिव इंजीनियर हरीश श्रवण पाटिल और चार्टर्ड अकाउंटेंट रवींद्र मनोहर सावंत को भी आरोपमुक्त किया।
मामले में मूल रूप से सात आरोपी थे। इनमें तत्कालीन PWD सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर अनिलकुमार बालिराम गायकवाड़ और तत्कालीन अंडरसेक्रेटरी संजय श्रीराम सोलंकी को 2021 में ही आरोपमुक्त किया जा चुका था। तत्कालीन PWD सचिव (कंस्ट्रक्शन) माणिकलाल हिराचंद शाह के खिलाफ कार्यवाही उनकी मृत्यु के बाद समाप्त हो गई थी।
बचाव पक्ष ने आरोपों को किया था खारिज
भुजबल की ओर से अधिवक्ता सुदर्शन खवासे ने अदालत में पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने उन आरोपों का खंडन किया था जिनमें भुजबल को कथित वित्तीय लाभ या निजी डेवलपर को फायदा पहुंचाने से जोड़ा गया था।
बचाव पक्ष की दलील थी कि मामले में ऐसा ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि भुजबल को परियोजना से कोई अवैध वित्तीय लाभ मिला या किसी लाभ के बदले उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल किया।
विशेष अदालत ने आरोपमुक्त करने की अर्जी स्वीकार करते हुए अभियोजन के पास मौजूद सामग्री को पर्याप्त नहीं माना। हालांकि, फैसले का विस्तृत और कारणयुक्त आदेश तत्काल उपलब्ध नहीं था।
भुजबल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
यह फैसला भुजबल के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उनके PWD मंत्री के कार्यकाल से जुड़े ACB मामलों में लंबित आखिरी मामले के रूप में सामने आया था।
भुजबल ने 2004 से 2014 के बीच महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग के मंत्री के रूप में काम किया था। उनके इसी कार्यकाल के दौरान लिए गए विभिन्न फैसलों को लेकर भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच हुई थी।
सितंबर 2021 में भुजबल, उनके बेटे पंकज और भतीजे समीर को महाराष्ट्र सदन मामले में भी ACB की कार्यवाही में राहत मिली थी। जनवरी 2026 में विशेष PMLA अदालत ने संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में भी तीनों को आरोपमुक्त किया था।
पहले भी कानूनी मामलों में मिली है राहत
कलिना मामले से पहले भुजबल को महाराष्ट्र सदन निर्माण और नवी मुंबई की एक आवासीय परियोजना से जुड़े मामलों में भी कानूनी राहत मिल चुकी थी। कलिना लाइब्रेरी मामले में आरोपमुक्त होने के बाद उनके खिलाफ PWD मंत्री के कार्यकाल से जुड़े ACB मामलों की लंबित कार्यवाही भी समाप्त हो गई है।
हालांकि, मौजूदा फैसले को कानूनी रूप से ‘आरोपमुक्त’ के तौर पर रिपोर्ट करना अधिक सटीक है, क्योंकि यह मामला ट्रायल के चरण में था। अदालत ने अभियोजन द्वारा पेश सामग्री के आधार पर आरोप तय करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया।
विस्तृत आदेश का इंतजार
विशेष अदालत का विस्तृत कारणयुक्त आदेश अभी सार्वजनिक नहीं हुआ था। इसलिए अदालत ने किन-किन साक्ष्यों को किस आधार पर अस्वीकार किया, इसका पूरा विवरण आदेश उपलब्ध होने के बाद स्पष्ट होगा।
फिलहाल अदालत के आदेश का मुख्य आधार यही है कि अभियोजन पक्ष भुजबल को कथित आपराधिक साजिश, व्यक्तिगत आर्थिक लाभ और ‘quid pro quo’ से जोड़ने वाली पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सका।
कलिना लाइब्रेरी मामला करीब एक दशक से अधिक समय तक चला। अब विशेष अदालत के आरोपमुक्त करने के फैसले के साथ इस मामले में भुजबल के खिलाफ मौजूदा कार्यवाही समाप्त हो गई है। विस्तृत आदेश आने के बाद फैसले में अदालत की कानूनी reasoning और साक्ष्यों के मूल्यांकन की तस्वीर और स्पष्ट होगी।











