सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी स्कूल के अधिकारी को किसी बच्चे के यौन शोषण की शिकायत मिलती है, तो वह स्वयं जांच-पड़ताल कर मामले को दबा या रफा-दफा नहीं कर सकता।
POCSO Act Judgment: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी स्कूल अधिकारी को यदि बच्चे के साथ यौन अपराध की जानकारी मिलती है, तो उसकी जिम्मेदारी तत्काल इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को देना है। स्कूल प्रशासन अपने स्तर पर जांच करके मामले को खत्म नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत घटना की रिपोर्ट करना अनिवार्य है। यदि कोई जिम्मेदार व्यक्ति इसकी जानकारी होने के बावजूद रिपोर्ट नहीं करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
POCSO एक्ट की धारा 19 और 21 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि POCSO एक्ट की धारा 19 के तहत किसी बच्चे के यौन शोषण की जानकारी मिलने पर उसकी रिपोर्ट करना अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी स्कूल अधिकारी, शिक्षक या प्रशासनिक कर्मचारी खुद जांच-पड़ताल कर यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि अपराध हुआ है या नहीं। यदि शिकायत प्राप्त होती है, तो उसे कानून के अनुसार संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट दर्ज न करने पर POCSO एक्ट की धारा 21 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी तय हो सकती है। इस प्रावधान के तहत दोषी पाए जाने पर छह महीने तक की जेल या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान है।
क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका से जुड़ा है, जिन पर आरोप था कि उन्होंने एक छात्र द्वारा आठ वर्षीय छात्रा के कथित यौन शोषण की शिकायत को पुलिस तक पहुंचाने के बजाय खुद जांच करने की कोशिश की। पीड़िता की मां ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर निचली अदालत और गुवाहाटी हाईकोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें स्कूल की प्रधानाध्यापिका, प्रिंसिपल, शिक्षक और हॉस्टल वार्डन समेत अन्य अधिकारियों को आरोपों से राहत दे दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों को रद्द करते हुए मामले में प्रधानाध्यापिका को मिली राहत समाप्त कर दी। मामले के अनुसार, पीड़िता ने बताया था कि आठवीं कक्षा के एक छात्र ने उसके साथ यौन शोषण किया। उसने इसकी जानकारी अपनी बहन और स्कूल की प्रधानाध्यापिका को दी थी। आरोप है कि POCSO एक्ट के तहत पुलिस को सूचना देने के बजाय प्रधानाध्यापिका ने खुद मामले की जांच शुरू कर दी। पूछताछ के दौरान आरोपी छात्र ने घटना से इनकार कर दिया।
इसके बाद प्रधानाध्यापिका ने कथित तौर पर यह निष्कर्ष निकाला कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई और मामले को आगे नहीं बढ़ाया गया। आरोप यह भी था कि उन्होंने छात्रों को इस विषय में किसी अन्य व्यक्ति से बात नहीं करने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया कानून के उद्देश्य के विपरीत है, क्योंकि POCSO कानून का मकसद बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना और ऐसी घटनाओं की तुरंत रिपोर्ट सुनिश्चित करना है।
स्कूल अधिकारियों की जिम्मेदारी पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान होने चाहिए और वहां काम करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी सामान्य नागरिकों से अधिक होती है। यदि किसी शिक्षक, प्रधानाचार्य या स्कूल अधिकारी को बच्चे के साथ यौन अपराध की जानकारी मिलती है, तो उन्हें कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी।
वे केवल आंतरिक जांच के आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि बच्चों से जुड़े अपराधों में देरी या मामले को दबाने की कोशिश पीड़ित बच्चे को और अधिक नुकसान पहुंचा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की शिकायतों को गंभीरता से लेना और तुरंत रिपोर्ट करना अनिवार्य है। POCSO एक्ट के तहत रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी केवल पुलिस या जांच एजेंसियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी व्यक्तियों पर लागू होती है जिन्हें ऐसे अपराध की जानकारी मिलती है।











