बॉलीवुड एक्ट्रेस अदा शर्मा, जिन्होंने 1920, कमांडो, हंसी तो फंसी और द केरल स्टोरी जैसी फिल्मों में दमदार अभिनय किया है, आज भी अपने मासूम, मज़ेदार और दिलचस्प सोशल मीडिया पोस्ट के कारण बच्चों की पसंदीदा कलाकारों में शामिल हैं।
एंटरटेनमेंट न्यूज़: अभिनेत्री अदा शर्मा, जिन्होंने 1920, कमांडो, हंसी तो फंसी और द केरल स्टोरी जैसी फिल्मों में अपने प्रदर्शन से दर्शकों का दिल जीता, सोशल मीडिया पर अपने दिलचस्प, मासूम और क्यूट पोस्ट्स की वजह से बच्चों के बीच भी काफी लोकप्रिय हैं। एनिमल लवर के रूप में उनकी पोस्ट उन्हें युवा और बच्चों से और अधिक जोड़ती हैं।
एनिमल वेलफेयर, सेल्फ डिफेंस और चाइल्ड एजुकेशन जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम करने वाली अदा बाल दिवस के अवसर पर अपने बचपन और बच्चों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करती हैं।
आज भी मेरा बचपना ज़िंदा है – अदा शर्मा
अपने बचपन की शरारतों का ज़िक्र करते हुए अदा हंसते हुए बताती हैं कि उनमें बचपन की मासूमियत आज भी बाकी है। वे कहती हैं, स्कूल आते-जाते मैं जंगली बिल्लियों से बात करती थी और स्ट्रे डॉग्स को खाना खिलाती थी। हमारे कमरे की खिड़की पर आने वाले कौवों के लिए मैं रोज़ खाना रखती थी। वे आगे बताती हैं कि वे बचपन में बहुत शरारती थीं और लोगों को डराने में उन्हें खूब मज़ा आता था।
हमारी बिल्डिंग में पाँच फ्लैट थे। मैं दरवाज़े की कुंडी या घंटी बजाकर दीवार के पीछे छुप जाती थी। जैसे ही कोई दरवाज़ा खोलता, मैं भूत जैसी आवाज़ निकालकर लोगों को डरा देती। मैं इस काम में इतनी मशहूर हो गई थी कि बच्चों की किसी भी डराने वाली प्लानिंग में मुझे ज़रूर बुलाया जाता। अदा बताती हैं कि वे झूठ बोल नहीं पाती थीं। अगर मैं झूठ बोलती, तो तनाव में बीमार पड़ जाती थी, इसलिए किसी भी शरारत के बाद मैं खुद जाकर सब मान लेती थी।

चिल्ड्रन्स डे की सबसे मजेदार याद
अदा के अनुसार, उनके स्कूल में चिल्ड्रन्स डे बेहद खास होता था। उस दिन बच्चों को खूब प्यार मिलता था, लेकिन सबसे मजेदार बात ये थी कि हमारी टीचर्स स्कूल यूनिफॉर्म पहनती थीं, जबकि हम बच्चे पार्टी ड्रेस में जाते थे। साफ तेल लगी चोटी या सख्त ड्रेस कोड से उस दिन छुटकारा होता था। टीचर्स उस दिन स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर छात्रों के लिए नाटक भी प्रस्तुत करती थीं, हम दर्शक होते थे और हमारे टीचर्स स्टूडेंट्स बनकर अभिनय करते थे। सच में उस दिन हमारे ठाट होते थे।
अपने घर के माहौल पर बात करते हुए अदा बताती है, मैं दस साल की हुई तब जाकर घर में टीवी आया। मां चाहती थीं कि मैं टीवी में वक्त बिताने के बजाय पियानो, डांस और दूसरी गतिविधियों में समय दूं। हालाँकि वे पुरानी फिल्मों की डीवीडी देखकर खूब खुश होती थीं मिस्टर इंडिया देखना मुझे बेहद पसंद था, जबकि मेरे दोस्त मोगेंबो से डरते थे। मुझे वो बहुत कूल लगता था।
आज का बचपन और AI की बढ़ती भूमिका
अदा मानती हैं कि आज के बच्चों का बचपन तकनीक से घिर गया है। बच्चे आज फोन और सोशल मीडिया के बहुत ज्यादा एक्सपोज़ हो रहे हैं। हमारे समय में आउटडोर गेम्स ही सब कुछ थे। टेक्नॉलजी इतनी तेज़ है कि बच्चों को उससे दूर रखना लगभग नामुमकिन है। वे आगे कहती हैं, शायद आने वाले दस सालों में बच्चों के असली दोस्त कम और AI दोस्त ज्यादा होंगे।
अदा न केवल एनिमल वेलफेयर और सेल्फ-डिफेंस से जुड़ी हैं, बल्कि चाइल्ड एजुकेशन पर भी सक्रिय हैं। वे अपील करती हैं, घर में अंडर-एज बच्चों को काम पर न रखें। अगर आप सच में बदलाव लाना चाहते हैं, तो अपनी हाउस हेल्प के बच्चों की पढ़ाई में मदद करें। इससे उनकी अगली पीढ़ी शिक्षित और आत्मनिर्भर बन सकती है।








