चीन के राजदूत ने दावा किया कि जापान के पास 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम है, जिससे सैद्धांतिक रूप से करीब 5,500 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। हालांकि, जापान परमाणु हथियार संपन्न देश नहीं है और उसकी आधिकारिक नीति गैर-परमाणु है।
बीजिंग: चीन ने जापान के परमाणु कार्यक्रम और उसके पास मौजूद प्लूटोनियम के भंडार को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रूस में चीन के राजदूत झांग हानहुई ने दावा किया है कि जापान के पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम मौजूद है। उनके मुताबिक, इस मात्रा के आधार पर सैद्धांतिक रूप से करीब 5,500 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। हालांकि, यह आंकड़ा जापान के पास मौजूद परमाणु हथियारों की संख्या नहीं है, बल्कि प्लूटोनियम की मात्रा से निकाला गया एक सैद्धांतिक अनुमान है।
झांग हानहुई ने रूसी सरकारी समाचार एजेंसी तास को दिए इंटरव्यू में जापान की परमाणु ईंधन को दोबारा संसाधित करने की क्षमता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जापान इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन से प्लूटोनियम अलग करने की तकनीक रखता है। चीन का कहना है कि यह क्षमता भविष्य में जापान को परमाणु हथियार विकसित करने की संभावित तकनीकी क्षमता दे सकती है।
जापान के पास परमाणु हथियार होने का दावा नहीं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जापान को परमाणु हथियार संपन्न देश कहना इस समय सही नहीं होगा। जापान परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT का सदस्य है और उसने परमाणु हथियार विकसित करने या रखने की आधिकारिक नीति नहीं अपनाई है।
चीन का 5,500 परमाणु हथियारों वाला दावा केवल इस आधार पर है कि उपलब्ध अलग किए गए प्लूटोनियम को सैद्धांतिक रूप से हथियारों के निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। वास्तविक परमाणु हथियार बनाने के लिए केवल प्लूटोनियम की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए हथियार डिजाइन, इंजीनियरिंग, परीक्षण, सुरक्षा व्यवस्था और अन्य तकनीकी क्षमताओं की भी जरूरत होती है।
इसलिए जापान के पास 5,500 परमाणु हथियार होने या वह इतने हथियार तैयार कर चुका है, ऐसा निष्कर्ष निकालना चीन के बयान से संभव नहीं है।
प्लूटोनियम क्या होता है?
प्लूटोनियम एक रेडियोधर्मी तत्व है, जो परमाणु रिएक्टरों में यूरेनियम ईंधन के इस्तेमाल के दौरान बन सकता है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से निकलने वाले इस्तेमाल किए गए ईंधन में प्लूटोनियम समेत कई तत्व मौजूद होते हैं।
कुछ देश पुनर्प्रसंस्करण यानी रीप्रोसेसिंग तकनीक के जरिए इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन से उपयोगी सामग्री अलग करते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए प्लूटोनियम को भी अलग किया जा सकता है।
प्लूटोनियम का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में कुछ प्रकार के ईंधन के निर्माण में किया जा सकता है। वहीं, कुछ प्रकार का प्लूटोनियम परमाणु हथियारों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी दोहरे उपयोग की वजह से प्लूटोनियम का उत्पादन, भंडारण और पुनर्प्रसंस्करण अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार व्यवस्था के लिए संवेदनशील विषय माना जाता है।
जापान के पास इतना प्लूटोनियम कैसे आया?
जापान ने अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए लंबे समय तक परमाणु ऊर्जा पर भरोसा किया है। देश के पास परमाणु ईंधन के पुनर्प्रसंस्करण की क्षमता भी विकसित हुई। इसी प्रक्रिया के दौरान कई दशकों में जापान के पास अलग किया हुआ प्लूटोनियम जमा हुआ।
चीन के राजदूत के अनुसार, 2024 के अंत तक जापान के पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम था। इसके अलावा इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन में मौजूद लगभग 191 टन प्लूटोनियम का भी उल्लेख किया गया है।
इन दोनों आंकड़ों को एक ही तरह से देखना सही नहीं होगा। 44.4 टन वह मात्रा है जिसे परमाणु ईंधन से अलग किया जा चुका है, जबकि 191 टन का आंकड़ा उस प्लूटोनियम से जुड़ा है जो अभी इस्तेमाल किए गए ईंधन में मौजूद बताया गया है।
यही 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम चीन के 5,500 परमाणु हथियारों के सैद्धांतिक अनुमान का आधार है।
चीन जापान की परमाणु क्षमता से क्यों चिंतित है?
चीन और जापान के बीच पहले से ही ऐतिहासिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी तनाव मौजूद हैं। पूर्वी एशिया में चीन की सैन्य ताकत बढ़ने, ताइवान को लेकर तनाव और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के बीच जापान की सुरक्षा नीति भी पिछले कुछ वर्षों में अधिक सक्रिय हुई है।
इसी व्यापक सुरक्षा माहौल में चीन जापान की परमाणु क्षमता को लेकर चिंता जता रहा है। झांग हानहुई ने कहा कि जापान के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, लेकिन उसके पास परमाणु ईंधन को दोबारा संसाधित करने और प्लूटोनियम अलग करने की तकनीकी क्षमता मौजूद है।
चीनी राजदूत का तर्क है कि अगर भविष्य में जापान की सरकार परमाणु हथियार विकसित करने का राजनीतिक फैसला करती है, तो उसके पास इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी और औद्योगिक आधार पहले से मौजूद होंगे।
हालांकि, यह चीन की ओर से जताई गई आशंका है। इससे यह साबित नहीं होता कि जापान वर्तमान में परमाणु हथियार बनाने की तैयारी कर रहा है।
जापान की परमाणु नीति तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों पर आधारित
जापान की परमाणु नीति को समझने के लिए उसके तीन गैर-परमाणु सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं। इन सिद्धांतों की घोषणा 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ईसाकु सातो ने की थी। बाद में जापानी संसद ने भी इन्हें स्वीकार किया।
इनके तहत जापान ने तीन नीतिगत प्रतिबद्धताएं रखी हैं। पहली, वह परमाणु हथियारों का निर्माण नहीं करेगा। दूसरी, वह परमाणु हथियारों को अपने पास नहीं रखेगा। तीसरी, वह जापान में परमाणु हथियारों के प्रवेश की अनुमति नहीं देने की नीति रखता है।
इन सिद्धांतों पर हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों की ऐतिहासिक छाप का भी गहरा प्रभाव माना जाता है। जापान दुनिया का एकमात्र देश है जिसने युद्ध के दौरान परमाणु हमलों का सामना किया है।
हालांकि, ये तीन सिद्धांत संवैधानिक कानून के समान कानूनी प्रावधान नहीं हैं, लेकिन दशकों से जापान की परमाणु नीति और सार्वजनिक बहस का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
जापान की परमाणु ऊर्जा नीति क्यों महत्वपूर्ण है?
जापान लंबे समय से ऊर्जा के लिए परमाणु शक्ति का इस्तेमाल करता रहा है। देश के पास प्राकृतिक ऊर्जा संसाधनों की सीमित उपलब्धता है और वह ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर रहा है। इसी वजह से परमाणु ऊर्जा को उसकी ऊर्जा रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान मिला।

2011 में फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद जापान की परमाणु ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव आया। कई परमाणु रिएक्टर बंद किए गए और परमाणु सुरक्षा नियमों को कड़ा किया गया। इसके बावजूद जापान ने परमाणु ऊर्जा को पूरी तरह छोड़ने के बजाय धीरे-धीरे कुछ रिएक्टरों को सुरक्षा मानकों के तहत फिर से शुरू करने की दिशा में कदम उठाए।
यही परमाणु ऊर्जा ढांचा और ईंधन पुनर्प्रसंस्करण क्षमता जापान के प्लूटोनियम भंडार के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील बनाती है।
प्लूटोनियम का बड़ा भंडार और परमाणु हथियार में अंतर
किसी देश के पास बड़ी मात्रा में प्लूटोनियम होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह परमाणु हथियार बनाने की योजना बना रहा है। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और परमाणु हथियार कार्यक्रम तकनीकी रूप से कुछ समान सामग्रियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन उनके उद्देश्य और पूरी व्यवस्था अलग हो सकती है।
जापान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उपयोग और अंतरराष्ट्रीय निगरानी के ढांचे के भीतर संचालित करता है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA की निगरानी और परमाणु अप्रसार व्यवस्था इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसलिए चीन द्वारा बताए गए 5,500 हथियारों के आंकड़े को जापान के वास्तविक हथियार भंडार के रूप में पेश करना भ्रामक होगा।
पूर्वोत्तर एशिया में बढ़ सकती है परमाणु बहस
चीन की चिंता ऐसे समय सामने आई है जब पूर्वोत्तर एशिया में सुरक्षा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता, उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम तथा जापान की रक्षा क्षमता में बदलाव ने क्षेत्रीय सुरक्षा बहस को तेज किया है।
जापान अमेरिका का प्रमुख सुरक्षा सहयोगी है और उसकी सुरक्षा नीति में अमेरिकी परमाणु छतरी की भी अहम भूमिका है। ऐसे में जापान के अपने परमाणु हथियार विकसित करने की संभावना पर चर्चा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
अगर जापान कभी परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो इससे दक्षिण कोरिया और अन्य क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा नीतियों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल जापान की आधिकारिक नीति परमाणु हथियारों के खिलाफ ही है।
चीन के बयान का व्यापक संदेश
चीनी राजदूत का बयान केवल प्लूटोनियम की मात्रा को लेकर चिंता नहीं है, बल्कि पूर्वी एशिया के बदलते रणनीतिक समीकरण का संकेत भी माना जा सकता है। बीजिंग लगातार जापान की बढ़ती रक्षा क्षमता और अमेरिका के साथ उसके सुरक्षा सहयोग पर नजर रखता है।
वहीं, जापान का पक्ष यह रहा है कि उसकी परमाणु ऊर्जा गतिविधियां शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं और उसकी परमाणु नीति अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था के अनुरूप है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि जापान के पास बड़ी मात्रा में अलग किया हुआ प्लूटोनियम जरूर है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके पास हजारों परमाणु हथियार मौजूद हैं। चीन का 5,500 का आंकड़ा एक सैद्धांतिक गणना है, जबकि जापान की आधिकारिक नीति परमाणु हथियार विकसित करने और रखने के खिलाफ है। आने वाले समय में चीन-जापान संबंधों और पूर्वोत्तर एशिया की सुरक्षा स्थिति के साथ यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक बहस में बना रह सकता है।










