CJI सूर्यकांत की बड़ी टिप्पणी: 'संविधान सबका है, सिर्फ खास लोगों का नहीं'

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने संविधान की समानता और समावेशिता पर जोर देते हुए कहा कि ‘संविधान सबका है, सिर्फ खास लोगों का नहीं।’ उनके इस बयान को

Justice Surya Kant ने कहा कि संविधान किसी खास या संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक का समान अधिकार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्याय और संवैधानिक अधिकार केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होने चाहिए जो महंगी कानूनी प्रक्रिया का खर्च उठा सकते हैं या बड़े वकीलों की सेवाएं लेने में सक्षम हैं।

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant ने कहा है कि भारतीय संविधान किसी खास वर्ग, संपन्न लोगों या शक्तिशाली संस्थाओं की जागीर नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक का समान अधिकार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान केवल उन लोगों के लिए नहीं है जो महंगे वकीलों और लंबी कानूनी प्रक्रिया का खर्च उठा सकते हैं, बल्कि यह समाज के हर व्यक्ति के लिए न्याय और समानता का आधार है।

चीफ जस्टिस ने यह टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता Indira Jaising की आत्मकथा “The Constitution Is My Home: Conversations on a Life in Law” के विमोचन कार्यक्रम के लिए भेजे गए वीडियो संदेश में की। उन्होंने कहा कि संविधान “देश के हर नागरिक का साझा घर” है और इसकी भावना गांव, शहर, गरीब, हाशिये पर खड़े समुदायों और लोकतंत्र की मूल संरचना में जीवित रहती है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने CJI को लिखा खुला पत्र

इस बीच, 72 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षकों और कानूनी कार्यकर्ताओं के समूह ने मुख्य न्यायाधीश को खुला पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों पर चिंता जताई है। यह मामला विकास परियोजनाओं के खिलाफ दायर पर्यावरणीय याचिकाओं से जुड़ा है। 11 मई की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की थी कि देश में शायद ही कोई ऐसी परियोजना हो जिसका पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने समर्थन किया हो। 

इसके बाद नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटबिलिटी एंड राइट्स (NAJAR) से जुड़े सदस्यों ने पत्र लिखकर कहा कि ऐसी टिप्पणियां पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी दायरे में काम करने वाले नागरिकों और समूहों पर अनुचित सवाल खड़े करती हैं। पत्र में यह भी कहा गया कि पर्यावरणीय जनहित याचिकाएं और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में दायर अपीलें संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों की रक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

राष्ट्रपति को विश्वविद्यालय कर्मचारी पर कार्रवाई का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि Rajiv Gandhi National Aviation University के ‘विजिटर’ होने के नाते भारत के राष्ट्रपति को विश्वविद्यालय कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने और सेवा समाप्त करने का अधिकार है। यह मामला विश्वविद्यालय के पहले रजिस्ट्रार जितेंद्र सिंह से जुड़ा था, जिनकी प्रोबेशन अवधि के दौरान सेवा समाप्त कर दी गई थी। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले इस कार्रवाई को रद्द कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि राष्ट्रपति द्वारा अधिकारों का इस्तेमाल “उचित और न्यायसंगत” था।

राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124A (राजद्रोह) से जुड़े मामलों की सुनवाई अदालतें कर सकती हैं, यदि आरोपी को इस पर कोई आपत्ति न हो। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें आरोपी 17 वर्षों से जेल में बंद है। 

अदालत ने कहा कि यदि अभियुक्त स्वयं मुकदमे या अपील की सुनवाई के लिए सहमत है, तो अदालतें ऐसे मामलों का गुण-दोष के आधार पर फैसला कर सकती हैं। गौरतलब है कि 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से औपनिवेशिक दौर के राजद्रोह कानून की समीक्षा पूरी होने तक इस प्रावधान के उपयोग पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य फैसले में कहा कि पहली अपील का अधिकार किसी भी पक्षकार का “अनमोल अधिकार” है। अदालत ने प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) में अपील दायर करने में हुई 1059 दिनों की देरी को माफ करते हुए कहा कि मामलों का फैसला मेरिट के आधार पर होना चाहिए। यह मामला Securities and Exchange Board of India (SEBI) और खेलो एमसीएक्स रिसर्च सर्विसेज के बीच विवाद से जुड़ा था।

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