पाकिस्तान में सियासी भूचाल: मौलाना फजलुर रहमान ने सेना पर लगाए गंभीर आरोप, जान का खतरा जताया

पाकिस्तान में मौलाना फजलुर रहमान ने सेना पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कुछ हुआ तो पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान जिम्मेदार होगा और विरोध तेज किया।

Pakistan में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। मौलाना फजलुर रहमान ने आरोप लगाया कि अगर उन्हें कुछ हुआ तो पाकिस्तानी सेना जिम्मेदार होगी। उन्होंने देश की विदेश और आंतरिक नीतियों पर भी गंभीर सवाल उठाए।

इस्लामाबाद: पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर बड़े विवाद की ओर बढ़ गई है। वरिष्ठ धार्मिक और राजनीतिक नेता मौलाना फजलुर रहमान ने कराची में एक सार्वजनिक रैली के दौरान देश के सैन्य प्रतिष्ठान पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (JUI-F) प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने दावा किया कि उन्हें लगातार धमकी भरे फोन कॉल और संदेश मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि उनके साथ कोई अनहोनी होती है तो इसके लिए “पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान” जिम्मेदार होगा।

उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान की सियासत में एक बार फिर सिविल-मिलिट्री तनाव खुलकर सामने आ गया है।

“अगर मैं मारा गया तो फौज जिम्मेदार होगी”

कराची में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए मौलाना ने भावुक और आक्रामक लहजे में कहा कि उनकी जान को खतरा है। उन्होंने मंच से सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि देश में सत्ता संरचना ऐसी बन चुकी है जिसमें सैन्य संस्थान का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है।

उन्होंने कहा, “अगर मुझे कल कुछ हो गया, तो इसके लिए एस्टैब्लिशमेंट जिम्मेदार होगी।”

इस बयान को पाकिस्तान की राजनीति में सैन्य प्रतिष्ठान पर अब तक के सबसे तीखे हमलों में से एक माना जा रहा है।

“हाइब्रिड सिस्टम में बंधा है पाकिस्तान”

मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान की मौजूदा शासन व्यवस्था को “सिविल-मिलिट्री हाइब्रिड सिस्टम” बताया। उनके अनुसार, देश की नीतियां लोकतांत्रिक संस्थाओं की बजाय शक्तिशाली सैन्य ढांचे के प्रभाव में तय होती हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि इसी व्यवस्था के कारण पाकिस्तान की विदेश नीति प्रभावित हुई है और पड़ोसी देशों के साथ संबंध खराब हुए हैं।

भारत और अफगानिस्तान पर भी टिप्पणी

अपने भाषण में मौलाना ने भारत और अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा नीति के कारण भारत के साथ तनाव बढ़ा है और अफगानिस्तान के साथ भी संबंध स्थिर नहीं रह पाए हैं।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्रीय अस्थिरता के चलते पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हुई है और इसका असर अन्य देशों के साथ संबंधों पर भी पड़ा है।

चीन और विदेश नीति पर सवाल

मौलाना ने केवल भारत और अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि चीन के साथ संबंधों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की वर्तमान विदेश नीति के कारण अंतरराष्ट्रीय साझेदारों का भरोसा कमजोर हो सकता है।

हालांकि उन्होंने किसी विशिष्ट घटना का उल्लेख नहीं किया, लेकिन उनका संकेत पाकिस्तान की समग्र विदेश नीति पर था।

इमरान खान से तुलना और राजनीतिक संदर्भ

फजलुर रहमान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान भी लंबे समय से सेना पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगाते रहे हैं।

पाकिस्तान में यह बहस नई नहीं है कि देश की राजनीति में सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका कितनी प्रभावशाली है। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक निर्णयों में सेना की अहम भूमिका रहती है।

विश्लेषकों का मानना है कि मौलाना का यह बयान इसी लंबे राजनीतिक टकराव का हिस्सा है, जो समय-समय पर तेज हो जाता है।

देशव्यापी आंदोलन का ऐलान

मौलाना फजलुर रहमान ने अपने भाषण में सरकार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की भी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि 22 मई से महंगाई, घरेलू नीतियों और विदेश नीति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे।

उन्होंने गाजा युद्ध का भी उल्लेख करते हुए मुस्लिम देशों से एकजुट होने की अपील की और एक इस्लामिक ब्लॉक बनाने का सुझाव दिया।

सुरक्षा और राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रिया

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फजलुर रहमान पाकिस्तान की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली नेता रहे हैं और उनके बयान अक्सर राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा होते हैं।

हालांकि, इस बार उनके सीधे सैन्य प्रतिष्ठान पर आरोप ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बयान पाकिस्तान में राजनीतिक तनाव को और बढ़ा सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब देश आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है।

पाकिस्तान में सिविल-मिलिट्री तनाव की पुरानी कहानी

पाकिस्तान के इतिहास में सैन्य और नागरिक सरकारों के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है। कई बार निर्वाचित सरकारों और विपक्षी नेताओं ने सैन्य हस्तक्षेप के आरोप लगाए हैं।

इस संदर्भ में फजलुर रहमान का बयान एक बार फिर उसी बहस को जीवित कर रहा है, जिसमें सत्ता संतुलन और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं।

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