म्यांमार में युवाओं पर जबरन सैन्य भर्ती का खतरा, सड़कों से उठा ले जाने के डर में जी रहे लोग

म्यांमार में युवाओं को कथित तौर पर उठाकर सेना में भर्ती किए जाने के आरोप बढ़े हैं। जानें अनिवार्य भर्ती कानून, अपहरण के आरोप और परिवारों पर इसके असर की पूरी खबर

म्यांमार में गृहयुद्ध के बीच युवाओं को कथित तौर पर अगवा कर सेना में भर्ती किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। अनिवार्य भर्ती कानून, स्थानीय भर्ती लक्ष्य और अवैध लेन-देन के आरोपों से परिवारों में डर बढ़ रहा है।

नेपीडॉ: म्यांमार में सैन्य शासन के खिलाफ जारी संघर्ष के बीच युवाओं के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया है। देश के कई इलाकों में युवा पुरुषों को कथित तौर पर सड़कों, चेकपॉइंट और कार्यस्थलों से उठाकर सेना में भर्ती किया जा रहा है। दक्षिणी म्यांमार के कयिन राज्य की राजधानी ह्पा-आन में इस डर का असर रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखाई दे रहा है। परिवार अपने बेटों को शाम होने से पहले घर लौटने की हिदायत दे रहे हैं, जबकि काम के लिए बाहर निकलने वाले युवाओं को लगातार सतर्क रहना पड़ रहा है। आरोप हैं कि अनिवार्य सैन्य भर्ती के नियमों का इस्तेमाल कुछ स्थानों पर जबरन हिरासत, धमकी और अवैध लेन-देन के लिए किया जा रहा है।

ह्पा-आन में युवाओं के बीच बढ़ा डर

ह्पा-आन में रहने वाले 26 वर्षीय टुकटुक चालक जॉ मिन के मुताबिक, उन्हें रोजी-रोटी के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है, लेकिन परिवार को हमेशा उनकी सुरक्षा की चिंता रहती है। सुरक्षा कारणों से उन्होंने अपनी असली पहचान सार्वजनिक नहीं करने का अनुरोध किया है।

उनका कहना है कि परिवार के सदस्य लगातार फोन करके सावधान रहने और यात्रियों को दूर-दराज के इलाकों में ले जाने से बचने की सलाह देते हैं। उनके आसपास के कुछ लोगों को कथित तौर पर उठाया जा चुका है। ऐसे माहौल में युवाओं के लिए काम करना और सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो गया है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, सादे कपड़ों में घूमने वाले कुछ लोग युवाओं को निशाना बना रहे हैं। आरोप है कि किशोरों से लेकर 30 वर्ष की उम्र तक के पुरुषों को हिरासत में लेकर सैन्य सेवा के लिए भेजा जा रहा है। हालांकि, इन घटनाओं की व्यापकता और प्रत्येक मामले में जिम्मेदार लोगों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद गहराया संकट

म्यांमार में फरवरी 2021 में सेना ने तख्तापलट कर लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई नेता आंग सान सू ची की सरकार को सत्ता से हटा दिया था। इसके बाद देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति लगातार गंभीर होती गई। सेना को जातीय सशस्त्र संगठनों, लोकतंत्र समर्थक समूहों और नागरिक प्रतिरोध आंदोलनों से चुनौती मिलती रही है।

लंबे संघर्ष के दौरान सेना को सैनिकों की कमी, मनोबल में गिरावट और जवानों के सेना छोड़ने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसी पृष्ठभूमि में 2024 में अनिवार्य सैन्य भर्ती कानून लागू किया गया। इस कानून के तहत सामान्यतः 18 से 35 वर्ष के पुरुषों और 18 से 27 वर्ष की महिलाओं को कम से कम दो साल सैन्य सेवा करने का प्रावधान है। नियमों का उल्लंघन करने पर पांच साल तक की जेल का प्रावधान बताया गया है।

म्यांमार डिफेंस एंड सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट से जुड़े और पहले सेना में रह चुके अधिकारी नाउंग यो के अनुसार, इस कानून ने नागरिक आबादी पर व्यापक असर डाला है। उनका कहना है कि भर्ती के लिए निर्धारित लक्ष्य पूरा करने का दबाव स्थानीय स्तर पर जबरन कार्रवाई को बढ़ावा दे रहा है।

हजारों युवाओं के भर्ती होने का अनुमान

उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, 2024 की शुरुआत से लगभग ढाई वर्षों में करीब एक लाख युवाओं को सेना में भर्ती किया जा चुका है। इनमें से कई लोगों को कथित तौर पर दबाव, जबरन हिरासत, धमकी या अवैध वसूली के जरिए भर्ती किया गया।

आरोप है कि अधिकारियों को अलग-अलग क्षेत्रों से तय संख्या में लोगों को भर्ती करने के लक्ष्य दिए जाते हैं। जब निर्धारित संख्या पूरी नहीं होती, तो कुछ स्थानीय प्रशासनिक इकाइयां दूसरे इलाकों से लोगों को लाने की कोशिश करती हैं। इससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

बीबीसी बर्मी ने इस मामले में म्यांमार सरकार की सैन्य भर्ती से संबंधित केंद्रीय संस्था से संपर्क किया था। रिपोर्ट में दर्ज घटनाओं और जबरन भर्ती के आरोपों पर संस्था ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

पति को भर्ती केंद्र ले जाने का मामला

जबरन भर्ती के आरोपों को समझने के लिए यांगून की रहने वाली मा मोए सान पान का मामला महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि 8 मई 2025 को उन्होंने अपने 33 वर्षीय पति फ्यो वाई को आखिरी बार घर से जाते हुए देखा था। घर में विवाद के बाद वह बाहर चले गए थे।

महिला के मुताबिक, उनके एक रिश्तेदार ने स्थानीय वार्ड प्रशासन कार्यालय से संपर्क कर पति को वापस लाने में मदद मांगी थी। दो दिन बाद फ्यो वाई ने फोन करके बताया कि वह शहर के दूसरी ओर स्थित सैन्य भर्ती केंद्र में हैं।

महिला का आरोप है कि उनके रिश्तेदार ने पति को स्थानीय प्रशासनिक कार्यालय पहुंचाया, जहां से उन्हें दूसरे वार्ड में भेज दिया गया। उनका दावा है कि भर्ती का लक्ष्य पूरा करने के लिए उनके पति को चार लाख क्यात में दूसरे वार्ड को सौंप दिया गया था। बीबीसी उस रिश्तेदार से संपर्क नहीं कर सकी।

महिला ने बताया कि पति को छुड़ाने का वादा करने वाले कुछ लोगों ने उनसे 45 लाख क्यात भी ठग लिए। बाद में संबंधित वार्ड के प्रशासक ने बीबीसी से बातचीत में फ्यो वाई को सैन्य भर्ती अधिकारियों तक पहुंचाने में अपनी भूमिका स्वीकार की, लेकिन पैसे के लेन-देन से इनकार किया। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लक्ष्य पूरे नहीं होने पर दूसरे क्षेत्रों से लोगों को स्थानांतरित किया जाता है।

मा मोए सान पान ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात कही। उनके अनुसार, पुलिस ने शिकायत स्वीकार की, लेकिन मानव तस्करी का मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया। उन्हें अब तक यह जानकारी नहीं है कि उनके पति कहां हैं।

भर्ती के नाम पर अवैध नेटवर्क के आरोप

विशेषज्ञों का कहना है कि भर्ती के लिए तय लक्ष्यों और सैनिकों की कमी ने कुछ क्षेत्रों में युवाओं की अवैध खरीद-फरोख्त का खतरा बढ़ा दिया है। आरोपों के अनुसार, युवाओं को सड़क पर रोकने, यात्रा के दौरान पकड़ने, घरों में प्रवेश करने और फर्जी नौकरी के विज्ञापनों के जरिए फंसाने जैसी गतिविधियां सामने आई हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि अगस्त के आखिर में यांगून में अग्निशमन विभाग से जुड़े एक कर्मचारी और उनके दामाद को चार युवकों के कथित अपहरण के मामले में गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि युवकों को नौकरी दिलाने का लालच देकर एक घर में बुलाया गया और उन्हें बंद रखने के लिए बनाए गए कमरों में कैद किया गया। संबंधित कर्मचारी पर अपहरण और अवैध रूप से बंधक बनाने का आरोप लगाया गया। ये आरोप न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं।

नाउंग यो ने इन गतिविधियों को जबरन भर्ती और मानव तस्करी के गंभीर रूप से जोड़ा है। उनका कहना है कि कुछ स्थानीय प्रशासनिक निकाय, सैन्यकर्मी और आपराधिक गिरोह कथित तौर पर युवाओं को सैन्य इकाइयों तक पहुंचाने में शामिल हैं। इन आरोपों की जांच और स्वतंत्र पुष्टि महत्वपूर्ण है।

आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं पर अधिक दबाव

कागजों पर भर्ती के नियम विभिन्न गांवों, वार्डों और कस्बों से आबादी के अनुपात में लोगों को बुलाने की व्यवस्था पर आधारित हैं। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ संपन्न लोग कथित तौर पर पैसे देकर सैन्य सेवा से बचने की कोशिश करते हैं, जबकि उनकी जगह आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भर्ती किए जाने का खतरा रहता है।

इससे गरीब परिवारों पर दोहरा दबाव पड़ता है। एक ओर उन्हें अपने परिवार की आजीविका चलानी होती है, वहीं दूसरी ओर युवाओं को हिरासत या जबरन भर्ती से बचाने की चिंता रहती है। कुछ लोग थाईलैंड जैसे पड़ोसी देशों में चले गए हैं, जबकि अन्य रिश्तेदारों के घरों में शरण ले रहे हैं।

म्यांमार विटनेस नामक ओपन-सोर्स शोध संगठन ने 2021 से 2025 के बीच फेसबुक पर प्रकाशित सैकड़ों गुमशुदगी संबंधी विज्ञापनों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी में गुमशुदगी की सूचनाएं 2021 में चार थीं, जो 2025 में बढ़कर 82 हो गईं। शोधकर्ताओं ने कहा कि कई मामलों में भर्ती की प्रक्रिया औपचारिक बुलावे के बजाय हिरासत, दबाव और लोगों के लापता होने के रूप में सामने आती है। ये आंकड़े सोशल मीडिया पर उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें देश में गुमशुदगी के सभी मामलों का पूर्ण आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

गृहयुद्ध और भविष्य पर पड़ता असर

म्यांमार में जबरन भर्ती के आरोप केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल नहीं हैं। इनका असर परिवारों, रोजगार और देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। युवा सैन्य सेवा के डर से काम छोड़ रहे हैं या दूसरे इलाकों में जा रहे हैं। इससे पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था में श्रमिकों की कमी और आंतरिक विस्थापन की समस्या बढ़ सकती है।

सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े सैन्य अध्ययन शोधकर्ता डॉ. संदीप सिंह के अनुसार, जबरन भर्ती की स्थिति इस बात का संकेत हो सकती है कि सैन्य शासन संघर्ष के बीच सैनिकों की कमी से जूझ रहा है। उनके मुताबिक, लगातार अपहरण की आशंका युवाओं और उनके परिवारों के लिए अतिरिक्त कठिनाइयां पैदा कर रही है।

फिलहाल म्यांमार में जारी संघर्ष के बीच युवाओं की सुरक्षा, भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकार बड़े सवाल बने हुए हैं। जबरन भर्ती और अवैध लेन-देन के आरोपों की स्वतंत्र जांच, प्रभावित परिवारों को जानकारी और प्रभावी शिकायत व्यवस्था ऐसे कदम हैं, जो इस संकट से निपटने में अहम हो सकते हैं।

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