इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए चुनौती बढ़ती दिख रही है। चार प्रमुख सर्वे में किसी भी खेमे को बहुमत नहीं मिला। ऐसे में छोटे दल सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
तेल अवीव: इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ती दिखाई दे रही है। चुनाव से पहले सामने आए चार प्रमुख सर्वे में से दो में विपक्षी खेमा आगे है, एक में दोनों खेमों के बीच बराबरी का मुकाबला है, जबकि एक सर्वे में नेतन्याहू का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। हालांकि, किसी भी सर्वे में किसी एक खेमे को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है।
इजराइल की संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा चुनावी अनुमानों के मुताबिक, किसी भी गठबंधन के लिए यह आंकड़ा हासिल करना आसान नहीं होगा। ऐसे में चुनाव के बाद छोटे राजनीतिक दलों और अरब पार्टियों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
नेतन्याहू के नेतृत्व पर उठ रहे सवाल
इजराइल में इस चुनाव का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सरकार की सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
उस हमले में लगभग 1,200 लोग मारे गए थे। इसके बाद गाजा में इजराइली सैन्य कार्रवाई के दौरान 74,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत होने का आंकड़ा उपलब्ध विवरण में दिया गया है। युद्ध के मानवीय प्रभाव, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की नीतियां चुनावी बहस के प्रमुख विषय बने हुए हैं।
विपक्ष के कुछ नेता और हमले में अपनों को खोने वाले परिवार चाहते हैं कि सरकार इस घटना की जिम्मेदारी स्वीकार करे। दूसरी ओर, नेतन्याहू के समर्थकों का मानना है कि देश को सुरक्षा चुनौतियों के बीच मजबूत नेतृत्व की जरूरत है।
इस तरह चुनाव केवल सरकार बदलने या उसे दोबारा मौका देने तक सीमित नहीं है। इसमें सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक जवाबदेही और इजराइल के भविष्य की दिशा जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
येरुशलम और तेल अवीव में मतदाताओं की राय बंटी
चुनाव से पहले इजराइल के अलग-अलग शहरों में मतदाताओं की राय में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। येरुशलम के महाने येहुदा बाजार में 76 वर्षीय फल विक्रेता अब्राहम लेवी को भरोसा है कि नेतन्याहू दोबारा सरकार बनाएंगे। उनका कहना है कि नेतन्याहू को अपना काम पूरा करना चाहिए।
इसके विपरीत, येरुशलम की जाफा स्ट्रीट पर दुकान चलाने वाली इल्डा का मानना है कि हमास के हमले की जिम्मेदारी नेतन्याहू को लेनी चाहिए। तेल अवीव के जाफा इलाके में रहने वाले तुर्गेमान भी राजनीतिक बदलाव के पक्ष में हैं। उन्होंने गादी आइजनकोट को अपना समर्थन देने की बात कही।
ये प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि मतदाताओं के बीच सुरक्षा, नेतृत्व और जवाबदेही को लेकर अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोग नेतन्याहू को दोबारा अवसर देना चाहते हैं, जबकि अन्य सरकार की नीतियों में बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं।
हालांकि, कुछ मतदाताओं की राय पूरे देश के चुनावी रुझान का प्रतिनिधित्व नहीं करती। वास्तविक तस्वीर मतदान और अंतिम परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
हमास हमले के पीड़ित परिवारों में भी मतभेद
7 अक्टूबर 2023 के हमले में अपने प्रियजनों को खोने वाले परिवारों के बीच भी नेतन्याहू के नेतृत्व को लेकर एक जैसी राय नहीं है।
किबुत्ज बेरी की मेराव के माता-पिता हमले में मारे गए थे। मेराव का मानना है कि जिस सरकार के कार्यकाल में इतनी बड़ी सुरक्षा चूक हुई, उसे दोबारा सत्ता में नहीं आना चाहिए।
वहीं, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी की उम्मीदवार तालिक देश के लिए मजबूत नेतृत्व की जरूरत पर जोर देती हैं। यह अंतर दिखाता है कि हमले से प्रभावित परिवारों के विचार भी राजनीतिक रूप से अलग-अलग हो सकते हैं।
इन परिवारों के लिए चुनाव केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सुरक्षा, जवाबदेही और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने से जुड़े सवालों का विषय भी है।
फिलिस्तीन को अलग देश बनाने का मुद्दा चर्चा में सीमित
इजराइल के चुनावी विमर्श में फिलिस्तीन को अलग देश बनाने का मुद्दा प्रमुख यहूदी राजनीतिक दलों की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पा रहा है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इजराइल का सुरक्षा नियंत्रण बनाए रखने के पक्षधर हैं। विपक्षी दलों में भी सुरक्षा के मामले पर सख्त रुख रखने वाले नेता मौजूद हैं।
इसका अर्थ है कि नेतन्याहू का विरोध करने वाले सभी दल फिलिस्तीन के भविष्य को लेकर उनसे पूरी तरह अलग नीति नहीं रखते। इसलिए संभावित सत्ता परिवर्तन के बावजूद इस मुद्दे पर बड़े नीतिगत बदलाव की संभावना का आकलन करना आसान नहीं है।
उपलब्ध सर्वे संबंधी विवरण के मुताबिक, विपक्षी मतदाताओं में 36% और अरब नागरिकों में 57% लोग दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करते हैं। इस व्यवस्था में इजराइल और फिलिस्तीन दो अलग-अलग देशों के रूप में अस्तित्व में रहेंगे।
इन आंकड़ों को समझने के लिए सर्वे के नमूने, तारीख और सवालों की जानकारी भी जरूरी है। फिलहाल, ये आंकड़े संबंधित समूहों के विचारों की झलक देते हैं, लेकिन पूरे देश की राय का पूर्ण चित्र नहीं पेश करते।
छोटे दल बन सकते हैं सरकार गठन में किंगमेकर
इजराइल की आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली चुनाव प्रणाली में छोटे दल अक्सर सरकार बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि कोई बड़ा गठबंधन 61 सीटों का आंकड़ा हासिल नहीं कर पाता, तो उसे अन्य दलों का समर्थन जुटाना पड़ सकता है।
उपलब्ध अनुमानों में राअम पार्टी को पांच सीटें, संयुक्त अरब सूची को सात से नौ सीटें, ओफर विंटर की पार्टी को पांच सीटें और हेंडेल-जेलखा को चार सीटें मिलने की संभावना बताई गई है।
इन अनुमानों के अनुसार, छोटे दलों के पास सरकार गठन के समीकरण को प्रभावित करने की क्षमता हो सकती है। हालांकि, इन दलों के अंतिम सीट आंकड़े और संभावित गठबंधन चुनाव परिणामों तथा राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेंगे।
यदि नेतन्याहू का खेमा बहुमत से दूर रहता है, तो उसे नए सहयोगियों की तलाश करनी पड़ सकती है। विपक्ष को भी सरकार बनाने के लिए विभिन्न दलों के बीच सहमति कायम करनी होगी। ऐसे में चुनाव के बाद गठबंधन वार्ता काफी अहम हो सकती है।
चुनाव के नतीजे तय करेंगे इजराइल की अगली राजनीतिक दिशा
27 अक्टूबर का चुनाव नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ इजराइल की सुरक्षा और क्षेत्रीय नीतियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हमास के हमले की जवाबदेही, गाजा युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा और फिलिस्तीन के भविष्य से जुड़े सवाल मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
चार प्रमुख सर्वे में किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से चुनाव के बाद गठबंधन की राजनीति की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, सर्वे केवल संभावित रुझान दिखाते हैं और उन्हें चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता।
अंतिम नतीजों के बाद यह स्पष्ट होगा कि नेतन्याहू सत्ता में बने रहते हैं या विपक्ष सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचता है। यदि किसी भी पक्ष को बहुमत नहीं मिलता, तो छोटे दलों और संभावित सहयोगियों की भूमिका इजराइल की अगली सरकार तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।









