जलवायु वैज्ञानिक टापियो श्नाइडर ने कहा है कि शुरुआती चेतावनी प्रणालियों का दायरा केवल बारिश की घटनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इनमें नेपाल में अचानक आई बाढ़ जैसी आपदाओं के कारणों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में अत्यधिक गर्मी, भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में समय रहते लोगों को सतर्क करने वाली शुरुआती चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Caltech) के पर्यावरण विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर टापियो श्नाइडर ने भारत सहित दक्षिण एशिया में जलवायु संबंधी जोखिमों को लेकर चिंता जताई है।
श्नाइडर ने कहा कि अर्ली वार्निंग सिस्टम को केवल बारिश के पूर्वानुमान तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इनमें अचानक आने वाली बाढ़, पहाड़ी क्षेत्रों में मलबा खिसकने और ग्लेशियर या बर्फ पिघलने से उत्पन्न आपदाओं की निगरानी भी शामिल होनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को कुछ मिनट पहले भी खतरे की जानकारी मिल जाए, तो उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और जान बचाने में मदद मिल सकती है।
नेपाल में बाढ़ की घटना से बढ़ी चिंता
जलवायु वैज्ञानिक टापियो श्नाइडर छात्रों से बातचीत और एक परिचर्चा में भाग लेने के लिए अशोक विश्वविद्यालय पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने नेपाल में आई भीषण बाढ़ जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने पर जोर दिया। प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, 26 अगस्त को नेपाल के ऊंचाई वाले क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के खिसकने के बाद बाढ़ की स्थिति बनी। इस घटना से जुड़ा मलबा तिब्बत से मध्य नेपाल तक पहुंचा, जिसके कारण बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ।
रिपोर्ट में 1,200 से अधिक लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने की बात कही गई है। ऐसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि बाढ़ का खतरा हमेशा केवल स्थानीय बारिश से नहीं जुड़ा होता, बल्कि पहाड़ी भूगोल, बर्फ पिघलने और भूस्खलन जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। श्नाइडर ने कहा कि धरती का तापमान बढ़ने के साथ बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में इस तरह की आपदाओं का जोखिम बढ़ने की आशंका है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर आपदा के पीछे तत्काल कारण अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए जोखिम का आकलन स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए।

वैश्विक तापमान वृद्धि पर वैज्ञानिक की चेतावनी
श्नाइडर के अनुसार, वैश्विक तापमान में औद्योगिक युग से पहले की तुलना में लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि जलवायु संकट की गंभीरता को दर्शाती है। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में दुनिया को लंबे समय तक अधिक गर्म परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। वह ‘क्लाइमेट मॉडलिंग अलायंस’ का नेतृत्व भी करते हैं।
इस गठबंधन में कैलटेक, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से जुड़े वैज्ञानिक, इंजीनियर और अप्लाइड गणितज्ञ शामिल हैं। टीम का उद्देश्य आधुनिक कंप्यूटिंग तकनीक और बड़े स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करके पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के अधिक उन्नत मॉडल तैयार करना है।
भारत में गर्मी और भारी बारिश का बढ़ता प्रभाव
श्नाइडर ने कहा कि वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए उठाए जा रहे कदमों के बावजूद भारत को जलवायु परिवर्तन के कई प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है। देश में अत्यधिक गर्म दिनों और भारी बारिश की घटनाओं में बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसका असर स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों, शहरी बुनियादी ढांचे और आजीविका पर पड़ सकता है।
भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में बारिश का सटीक पूर्वानुमान लगाना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए श्नाइडर ने कम लागत वाले कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मौसम मॉडल विकसित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के समूह ऐसे मॉडल तैयार कर सकते हैं, जिन्हें भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के साथ इस्तेमाल किया जा सके।












