संविधान संशोधन विधेयक पर सरकार की परीक्षा, महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती

Constitution Amendment Bill: महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को मंजूरी दिलाने के लिए केंद्र सरकार को संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाने की चुनौती का सामना

संसद के मॉनसून सत्र में अगर केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पेश करती है, तो इस बार उसकी स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत दिखाई दे सकती है।

नई दिल्ली: संसद के आगामी मानसून सत्र में यदि केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पेश करती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सदन में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की होगी। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत जरूर हुई है, लेकिन लोकसभा में वह अभी भी संविधान संशोधन के लिए जरूरी आंकड़े से पीछे दिखाई दे रही है।

संविधान में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। इसके तहत उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत की जरूरत होती है। यही वजह है कि सरकार को विपक्षी दलों या अन्य क्षेत्रीय दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है।

लोकसभा में क्या है मौजूदा गणित?

मौजूदा लोकसभा संख्या के अनुसार, एनडीए और सरकार समर्थक सांसदों की संख्या लगभग 324 मानी जा रही है। इसमें वे पांच सांसद भी शामिल हैं जो औपचारिक रूप से एनडीए का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन अप्रैल में हुए एक महत्वपूर्ण मतदान के दौरान उन्होंने सरकार का समर्थन किया था। यदि लोकसभा के सभी 540 सांसद मतदान करते हैं, तो संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए सरकार को लगभग 360 वोटों की आवश्यकता होगी। इस स्थिति में एनडीए और उसके समर्थक दलों के पास उपलब्ध 324 वोटों से सरकार करीब 36 वोट पीछे है।

डीएमके के समर्थन से भी पूरी नहीं होगी कमी

तमिलनाडु की प्रमुख राजनीतिक पार्टी डीएमके के लोकसभा में 22 सांसद हैं। यदि डीएमके सरकार के पक्ष में मतदान करती है, तो समर्थन का आंकड़ा बढ़कर लगभग 346 तक पहुंच सकता है। हालांकि, इसके बाद भी सरकार को जरूरी 360 वोटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए करीब 14 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। यानी केवल डीएमके का समर्थन संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

यह स्थिति सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाती है, क्योंकि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दे व्यापक संवैधानिक बदलाव से जुड़े हुए हैं और इनके लिए बड़े स्तर पर समर्थन जुटाना जरूरी होगा।

अगर डीएमके वॉकआउट करती है तो क्या होगा?

संविधान संशोधन विधेयक पर सरकार की परीक्षा, महिला आरक्षण और परिसीमन बिल के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती

यदि डीएमके मतदान में हिस्सा नहीं लेती और सदन से वॉकआउट करती है, तो सदन में मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या कम हो जाएगी। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी घट सकता है। माना जा रहा है कि यदि लोकसभा में प्रभावी संख्या 518 रह जाती है, तो दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा लगभग 345 हो जाएगा। 

लेकिन इस स्थिति में भी सरकार के पास 324 वोट ही होंगे और वह करीब 21 वोट पीछे रह जाएगी। इससे स्पष्ट है कि विपक्ष की रणनीति और क्षेत्रीय दलों का रुख इस विधेयक के भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

राज्यसभा में भी समर्थन जुटाना जरूरी

संविधान संशोधन विधेयक को केवल लोकसभा से मंजूरी मिलना पर्याप्त नहीं होगा। इसे राज्यसभा में भी विशेष बहुमत से पारित कराना होगा। राज्यसभा के मौजूदा समीकरणों में भी सरकार कुछ अतिरिक्त समर्थक सांसदों पर निर्भर कर सकती है। अनुमान के अनुसार, कुछ ऐसे सांसद भी सरकार के संभावित समर्थकों में शामिल हैं जिन्होंने पहले के मतदान में केंद्र सरकार का साथ दिया था।

हालांकि, उच्च सदन में क्षेत्रीय दलों और विपक्षी दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक निश्चित प्रतिशत सीटें आरक्षित करना है। वहीं परिसीमन विधेयक लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं और संख्या में बदलाव से जुड़ा है।

दोनों मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। महिला आरक्षण को लेकर कई दल समर्थन जताते रहे हैं, जबकि परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों में अलग-अलग चिंताएं सामने आती रही हैं।

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