दरभंगा में स्वर्ण इंडिया कंपनी से जुड़े वित्तीय अनियमितता और जमाकर्ताओं की राशि वापस नहीं मिलने का मामला एक बार फिर सामने आया है। मामला जनसुनवाई में पहुंचने के बाद कंपनी में पैसा जमा करने वाले लोगों की चिंताएं फिर चर्चा में आ गई हैं। शिकायतकर्ताओं की ओर से कंपनी पर करीब 4 से 5 करोड़ रुपये की ठगी और वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाया गया है। साथ ही संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले की जांच कराने, जमाकर्ताओं की फंसी राशि वापस दिलाने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
उपलब्ध पुराने पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, स्वर्ण इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े मामले में दरभंगा में पहले भी प्राथमिकी दर्ज हुई थी। वर्ष 2023 की एक रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से बताया गया था कि कंपनी पर दरभंगा के लोगों से पांच करोड़ रुपये से अधिक की ठगी का आरोप था। पुलिस के अनुसार, अधिक ब्याज देने का प्रलोभन देकर लोगों से राशि जमा कराई गई और भुगतान का समय आने पर कंपनी से जुड़े लोग कथित तौर पर फरार हो गए।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई को बेहतर रिटर्न और सुरक्षित निवेश की उम्मीद में कंपनी से जुड़ी योजनाओं में लगाया था। समय बीतने के बाद जब जमा राशि वापस लेने की बारी आई तो कथित तौर पर लोगों को भुगतान नहीं मिला। इसके बाद कई जमाकर्ताओं ने पुलिस और प्रशासन से शिकायत की। अब जनसुनवाई के माध्यम से भी इस मामले को उठाकर राशि वापस कराने की मांग की गई है।
स्वर्ण इंडिया का मामला केवल दरभंगा तक सीमित नहीं बताया गया है। पुलिस की पुरानी जांच से संबंधित रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी के खिलाफ दरभंगा के अलावा मुजफ्फरपुर, बेतिया सहित दूसरे जिलों में भी मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी से जुड़ी शिकायतों का दायरा एक जिले तक सीमित नहीं था।
दरभंगा में कंपनी की शाखा नगर थाना क्षेत्र में पुअर होम के पास बताई गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने दरभंगा में वर्ष 2009 में शाखा स्थापित की थी। उस समय कंपनी के संचालन से जुड़े कई पदाधिकारियों और कर्मचारियों के नाम भी पुलिस जांच में सामने आए थे। पुलिस ने कंपनी के खिलाफ शिकायत मिलने के बाद उसके संचालन और जमाकर्ताओं से जुड़ी राशि की जांच शुरू की थी।
पुलिस की पुरानी कार्रवाई में कंपनी से जुड़े कुछ लोगों की गिरफ्तारी की बात भी सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार, मुकेश कुमार चौधरी और प्रभास ठाकुर को पहले गिरफ्तार किया गया था, जबकि बाद में सोनू कुमार चौधरी और सुनीता चौधरी को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया। कंपनी के अध्यक्ष अनिल कुमार की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने दिल्ली और मुजफ्फरपुर स्थित उनके संभावित ठिकानों पर छापेमारी की थी।
जांच के दौरान पुलिस ने कंपनी से संबंधित कई दस्तावेज भी जब्त किए थे। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को कंपनी से जुड़ी 26 फाइलें, अलग-अलग बैंकों की 36 चेकबुक, एक लैपटॉप, चार हार्ड डिस्क और 26 मुहर समेत कई कागजात मिले थे। इन दस्तावेजों के आधार पर कंपनी के वित्तीय लेनदेन और जमाकर्ताओं से जुड़ी जानकारी की जांच की गई थी।
शिकायतकर्ताओं की मौजूदा मांग का मुख्य केंद्र उनकी जमा राशि की वापसी है। जिन लोगों ने कंपनी में पैसा लगाया था, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनकी रकम कब और किस प्रक्रिया से वापस मिलेगी। जनसुनवाई में मामला पहुंचने के बाद जमाकर्ताओं को उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले में संबंधित विभागों और जांच एजेंसियों से रिपोर्ट लेकर आगे की कार्रवाई करेगा।
जमाकर्ताओं का आरोप है कि कंपनी के संचालन में वित्तीय अनियमितताएं हुईं और लोगों की रकम को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती गई। हालांकि, किसी कंपनी या व्यक्ति पर लगाए गए वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों को अंतिम रूप से साबित करने के लिए जांच और न्यायिक प्रक्रिया जरूरी होती है। इसलिए फिलहाल इन आरोपों को शिकायतकर्ताओं के दावे और पहले दर्ज मामलों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
बिहार में इस तरह की निवेश और जमा राशि से जुड़ी शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। वर्ष 2023 की एक राज्यस्तरीय रिपोर्ट में बताया गया था कि बिहार में चिटफंड कंपनियों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं से जुड़े बड़ी संख्या में मामले दर्ज हुए थे। उस रिपोर्ट में दरभंगा में भी ऐसे कई मामलों का उल्लेख किया गया था।
ऐसे मामलों में जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी कंपनी ने लोगों से जमा राशि लेकर निर्धारित समय पर भुगतान नहीं किया है या निवेश के नाम पर नियमों का उल्लंघन किया है, तो संबंधित रिकॉर्ड, बैंक लेनदेन, कंपनी के दस्तावेज और जमाकर्ताओं के बयान जांच में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
जनसुनवाई में शिकायत पहुंचने के बाद प्रशासन के सामने कई सवालों की जांच की जरूरत होगी। इसमें कंपनी ने कितने लोगों से कितनी राशि जमा कराई, किस योजना के तहत राशि ली गई, भुगतान की शर्तें क्या थीं, कितने लोगों को भुगतान हुआ और कितनी राशि अब भी बकाया है, जैसे बिंदु शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही कंपनी के बैंक खातों और संपत्तियों से जुड़ी जानकारी भी जांच का हिस्सा बन सकती है।
जमाकर्ताओं की ओर से यह भी मांग की जा रही है कि यदि जांच में वित्तीय अनियमितता या धोखाधड़ी के आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही जिन लोगों की मेहनत की कमाई फंसी हुई है, उन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत राशि वापस दिलाने की व्यवस्था की जाए।
पुरानी पुलिस जांच में यह भी सामने आया था कि कंपनी के पदाधिकारियों के खिलाफ अलग-अलग जिलों में मामले दर्ज थे। पुलिस के अनुसार, जमाकर्ताओं को अधिक ब्याज का लालच दिए जाने और बाद में भुगतान नहीं होने की शिकायतें सामने आई थीं। इस आधार पर पुलिस ने कंपनी से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कंपनी के खिलाफ शिकायतों और पुलिस कार्रवाई के बावजूद यदि बड़ी संख्या में जमाकर्ताओं की राशि अब भी वापस नहीं हुई है, तो प्रशासन को वर्तमान स्थिति की समीक्षा करनी होगी। जनसुनवाई में शिकायत आने के बाद संबंधित रिकॉर्ड मंगाकर यह देखा जा सकता है कि पहले हुई जांच और कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची है और जमाकर्ताओं को राहत दिलाने के लिए अब क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
जमाकर्ताओं के लिए रकम केवल निवेश नहीं बल्कि वर्षों की बचत और परिवार की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी होती है। ऐसे में राशि वापस नहीं मिलने से परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। शिकायतकर्ताओं की मांग है कि मामले को केवल प्राथमिकी और जांच तक सीमित न रखते हुए उनकी जमा पूंजी की वापसी के लिए भी ठोस प्रक्रिया अपनाई जाए।
फिलहाल जनसुनवाई में मामला पहुंचने के बाद प्रशासनिक स्तर पर इसकी समीक्षा की उम्मीद है। जांच में यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो संबंधित कानूनों के तहत आगे की कार्रवाई हो सकती है। वहीं पहले से दर्ज मामलों और पुलिस जांच के रिकॉर्ड को भी वर्तमान शिकायत के साथ जोड़कर देखा जा सकता है।
दरभंगा में स्वर्ण इंडिया से जुड़े इस मामले ने एक बार फिर जमाकर्ताओं की रकम और वित्तीय संस्थाओं की जवाबदेही का सवाल सामने ला दिया है। शिकायतकर्ताओं की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, कंपनी से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड की जांच की जाए और जिन लोगों की राशि फंसी है, उन्हें नियमानुसार वापस दिलाने की प्रक्रिया शुरू की जाए। अभी आगे की कार्रवाई प्रशासनिक जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तय होगी।











