आदित्य धर के निर्देशन में बनी Dhurandhar 2 अपने एक्शन और विजुअल इफेक्ट्स के लिए दर्शकों को रोमांचित करती है, लेकिन कहानी और लॉजिक के मामले में यह थोड़ी कमजोर नजर आती है।
- फिल्म रिव्यू: धुरंधर 2
- स्टार रेटिंग: 3/5
- पर्दे पर: 18.03.2026
- डायरेक्टर: आदित्य धर
- शैली: एक्शन और थ्रिलर ड्रामा
एंटरटेनमेंट न्यूज़: Dhurandhar में यह सवाल उठाया गया है कि जब एक हंसता-खेलता परिवार व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है, तो क्या होता है? और क्या होता है जब प्रतिशोध की आग एक रक्षक को भक्षक बनने पर मजबूर कर देती है? आदित्य धर के निर्देशन में बनी यह फिल्म महज एक एक्शन ड्रामा नहीं है, बल्कि उन अनकही परतों की कहानी है जो अक्सर फाइलों के नीचे दबी रह जाती हैं।
फिल्म की शुरुआत एक भावुक झटके के साथ होती है, जहां Ranveer Singh का किरदार एक ऐसे दलदल में कदम रखता है, जहां से वापसी का रास्ता सिर्फ मौत या मुकम्मल कामयाबी से होकर गुजरता है। इलाहाबाद की गलियों से शुरू हुआ यह सफर जब कराची के खतरनाक Lyari इलाके तक पहुंचता है, तो दर्शकों की सांसें थम जाती हैं।
कहानी की शुरुआत
फिल्म की शुरुआत भावुक और गंभीर ढंग से होती है। जसकीरत का परिवार अनुशासित सैन्य पृष्ठभूमि से आता है, लेकिन जमीन विवाद और क्रूर अपराधों के कारण उनका जीवन बिखर जाता है। पिता की हत्या और बहनों के साथ हुए अत्याचार से जसकीरत की प्रतिशोध की आग भड़कती है। वहीं, जेल में उसका सामना अजय सान्याल से होता है, जो कहानी को थ्रिलर टच देता है।
शुरुआत में फिल्म दर्शकों को एक सलीके से बुनी गई जासूसी और एक्शन कहानी की उम्मीद देती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह हाइपर-रियलिज्म और कल्पना के बीच झूलने लगती है।
कहानी का विस्तार

फिल्म का ट्रैक चकिया (इलाहाबाद) से शुरू होकर कराची के कुख्यात इलाके ल्यारी तक जाता है। यहाँ गैंगवार और ड्रग्स, हथियारों की तस्करी को 'आतिफ अहमद' जैसे किरदारों के जरिए दिखाया गया है। रणवीर सिंह का किरदार हमजा, नवाज शरीफ के साथ हाथ मिलाकर कराची का बेताज बादशाह बन जाता है।
हालांकि, यह कहानी दृश्यगत रूप से रोमांचक है, लेकिन कई हिस्सों में अतार्किक प्रतीत होती है। भारत-पाकिस्तान की घटनाओं को एक ही सूत्र में जोड़ना फिल्म को दर्शकों के लिए समझने में चुनौतीपूर्ण बना देता है।
अभिनय
रणवीर सिंह अपने किरदार में शुरू में भावुक और बाद में आक्रामक नजर आते हैं। एक्शन सीक्वेंस में उनकी ऊर्जा बरकरार है, लेकिन मध्य भाग में पात्र की गंभीरता कमजोर पड़ती है। संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और राकेश बेदी ने कम स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ा है। संजय दत्त का व्यक्तित्व फिल्म में मजबूती लाता है, वहीं अर्जुन रामपाल की भूमिका कहानी को गति देती है।
आर माधवन को कम जगह मिली है, जबकि सारा अर्जुन और सौम्या टंडन ने छोटे लेकिन प्रभावशाली प्रदर्शन किए। यामी गौतम और दानिश के रोल काफी कमज़ोर लगते हैं।
पटकथा और निर्देशन
निर्देशक आदित्य धर ने शुरुआती हाइप और बिल्ड-अप तो तैयार किया है, लेकिन सेकंड हाफ में कहानी बिखर जाती है। लॉजिक की कमी और कई ऐतिहासिक या राजनीतिक घटनाओं का अत्यधिक सिनेमाईकरण फिल्म के प्रभाव को घटा देता है। सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है। ल्यारी की गलियों और गैंगवार के दृश्य वास्तविकता का अहसास दिलाते हैं। VFX और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के रोमांच को बढ़ाते हैं।
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर प्रभावशाली है, तनावपूर्ण दृश्यों में सही इमोशन लाता है। गाने अधिक प्रभावशाली नहीं हैं, ज्यादातर पुराने गानों के रीमिक्स शामिल हैं।









