डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 91 के पार पहुंच गया है। केवल 5 कारोबारी सत्रों में भारतीय मुद्रा करीब 1 प्रतिशत टूटी है। FII की बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितता से रुपये पर दबाव बढ़ा है।
Rupee@91: भारतीय मुद्रा बाजार में मंगलवार को एक ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली, जब रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहली बार 91 के स्तर को पार कर गया। इंट्रा-डे कारोबार में रुपया 36 पैसे टूटकर 91.14 प्रति डॉलर तक फिसल गया।
यह गिरावट सिर्फ एक दिन की नहीं है, बल्कि पिछले कुछ कारोबारी सत्रों से लगातार जारी दबाव का नतीजा है। पिछले 10 ट्रेडिंग सेशंस में रुपया 90 से सीधे 91 प्रति डॉलर तक आ गया है। केवल बीते 5 सत्रों में ही भारतीय करेंसी करीब 1 प्रतिशत टूट चुकी है, जिसने निवेशकों और कारोबारियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
इंटरबैंक बाजार में कैसे टूटा रुपया
इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में मंगलवार को रुपया 90.87 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर खुला, जो पिछले बंद भाव से 9 पैसे कमजोर था। शुरुआती कारोबार में यह 90.77 से 90.87 के दायरे में घूमता रहा, लेकिन जैसे-जैसे डॉलर की मांग बढ़ी, रुपये पर दबाव और गहराता चला गया। सोमवार को रुपया 90.78 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था, उस दिन इसमें 29 पैसे की गिरावट दर्ज की गई थी। लगातार दो कारोबारी सत्रों में आई इस तेज कमजोरी ने साफ कर दिया है कि बाजार में रुपये को लेकर सेंटीमेंट कमजोर बना हुआ है।
व्यापार घाटा घटा, फिर भी रुपये को सहारा क्यों नहीं मिला
आमतौर पर जब किसी देश का व्यापार घाटा घटता है, तो उसकी मुद्रा को सहारा मिलता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। नवंबर में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट घटकर 24.53 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले 5 महीनों का सबसे निचला स्तर है।
अक्टूबर में यह 41.68 अरब डॉलर पर था। इसके बावजूद रुपये में सुधार नहीं आया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि पूंजी निकासी का दबाव व्यापार घाटे में आई राहत से कहीं ज्यादा भारी पड़ गया। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने रुपये की कमजोरी को और गहरा कर दिया।
FII की बिकवाली बना सबसे बड़ा दबाव
रुपये की गिरावट के पीछे सबसे अहम कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की लगातार बिकवाली मानी जा रही है। इस महीने अब तक FII भारतीय शेयर बाजार से 21,073.83 करोड़ रुपये की निकासी कर चुके हैं। खास बात यह है कि वे सभी कारोबारी सत्रों में नेट सेलर बने हुए हैं। सोमवार को ही FII ने 1,468.32 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए।
जब विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये पर सीधा दबाव पड़ता है। यही वजह है कि रुपये को किसी भी सकारात्मक घरेलू आंकड़े से फिलहाल राहत नहीं मिल पा रही है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील की अनिश्चितता का असर
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर बनी अनिश्चितता भी रुपये की कमजोरी का एक बड़ा कारण है। बाजार को उम्मीद थी कि इस समझौते को लेकर जल्द कोई स्पष्ट संकेत मिलेगा, लेकिन अब तक तस्वीर साफ नहीं हो पाई है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइर्स एलएलपी के ट्रेजरी प्रमुख अनिल कुमार भंसाली के मुताबिक, ट्रेड डील का पहला चरण साल के अंत से पहले साइन होने की बात कही जा रही है, लेकिन अभी भी यह दूर नजर आ रहा है। इस अनिश्चितता ने USD/INR में रिकवरी को रोक दिया है और हर दिन डॉलर की खरीदारी देखने को मिल रही है।
डॉलर में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों से मिली थोड़ी राहत
हालांकि रुपये पर दबाव बना हुआ है, लेकिन गिरावट इससे भी ज्यादा तेज हो सकती थी। विदेशी मुद्रा कारोबारियों का कहना है कि डॉलर इंडेक्स में हल्की कमजोरी और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने रुपये को कुछ हद तक सहारा दिया है। छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती दिखाने वाला डॉलर इंडेक्स 0.03 प्रतिशत गिरकर 98.27 पर कारोबार कर रहा था। वहीं ब्रेंट क्रूड 0.61 प्रतिशत टूटकर 60.19 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट राहत की बात होती है, क्योंकि इससे आयात बिल कम होता है।
क्या 92 तक फिसल सकता है रुपया
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि तकनीकी तौर पर रुपया अभी भी कमजोर जोन में बना हुआ है। केडिया एडवाइजरी के अनुसार, USD/INR रिकॉर्ड ऊंचे स्तरों पर ट्रेड कर रहा है और इसमें तेजी का रुझान बरकरार है।
20DEMA करीब 90.06 पर सपोर्ट दे रहा है, जबकि RSI 73.89 पर है, जो ओवरबॉट कंडीशन दिखाता है। इसका मतलब यह है कि गिरावट के बाद कुछ समय के लिए कंसोलिडेशन हो सकता है, लेकिन अगर दबाव बना रहा, तो डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर की ओर भी बढ़ सकता है। तत्काल सपोर्ट 90.06 और 90.00 के आसपास माना जा रहा है।
निर्यात बढ़ा, आयात घटा फिर भी कमजोरी क्यों
नवंबर में भारत के निर्यात आंकड़े काफी मजबूत रहे हैं। वस्तुओं का निर्यात बढ़कर 38.13 अरब डॉलर पहुंच गया, जो 6 महीने का उच्च स्तर है। सालाना आधार पर निर्यात में 19.38 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसमें इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स गुड्स की बड़ी भूमिका रही। खास बात यह रही कि अमेरिका को निर्यात 22 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा।
वहीं आयात 1.88 प्रतिशत घटकर 62.66 अरब डॉलर रहा, जिसमें सोना, कच्चा तेल, कोयला और कोक के आयात में गिरावट दिखी। इसके बावजूद रुपये में मजबूती नहीं आई, क्योंकि बाजार फिलहाल कैपिटल फ्लो यानी पूंजी की आवाजाही को ज्यादा तवज्जो दे रहा है।
HSBC PMI और महंगाई के आंकड़ों का असर
HSBC कंपोजिट PMI नवंबर में घटकर 58.9 पर आ गया है। यह आंकड़ा मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों सेक्टर में ग्रोथ जारी रहने का संकेत देता है, लेकिन रफ्तार धीमी होने की ओर भी इशारा करता है।
वहीं थोक महंगाई यानी WPI नवंबर में लगातार दूसरे महीने निगेटिव रही और माइनस 0.32 प्रतिशत पर दर्ज की गई। हालांकि महीने-दर-महीने आधार पर दालों और सब्जियों जैसी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई। कमजोर महंगाई और धीमी ग्रोथ भी रुपये के लिए सकारात्मक संकेत नहीं मानी जा रही है।
शेयर बाजार की गिरावट ने बढ़ाया दबाव
घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी का असर भी रुपये पर पड़ा है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 363 अंक गिरकर 84,849 के स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी 106 अंक टूटकर 25,920 के आसपास कारोबार करता दिखा। जब शेयर बाजार में गिरावट आती है और विदेशी निवेशक बिकवाली करते हैं, तो इसका सीधा असर करेंसी मार्केट पर पड़ता है।










