सुप्रीम कोर्ट में बांके बिहारी मंदिर पर सुनवाई, देहरी पूजा को लेकर यूपी सरकार को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट में बांके बिहारी मंदिर पर सुनवाई, देहरी पूजा को लेकर यूपी सरकार को नोटिस

बांके बिहारी मंदिर की दर्शन व्यवस्था और देहरी पूजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। अदालत ने यूपी सरकार और High Power Committee से जवाब मांगा है। मामला धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है।

New Delhi: मथुरा स्थित श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर की दर्शन व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने धार्मिक परंपराओं, भक्तों की आस्था और प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मंदिर में दर्शन के समय में बदलाव और सदियों पुरानी देहरी पूजा को बंद किए जाने के फैसले पर अब सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार और न्यायालय द्वारा नियुक्त High Power Committee से जवाब मांगा है। यह मामला केवल व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या प्रशासनिक फैसले मंदिर की आंतरिक धार्मिक परंपराओं से ऊपर हो सकते हैं।

CJI की पीठ ने जारी किया नोटिस

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली भी शामिल हैं, ने इस मामले में प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए हैं कि सभी संबंधित पक्ष 7 जनवरी 2026 तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करें। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि वह इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं से जुड़े संवैधानिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार करेगी।

किसने दायर की याचिका और क्या है मांग

यह याचिका श्री बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन समिति की ओर से गोपेश गोस्वामी और रजत गोस्वामी के माध्यम से दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि High Power Committee द्वारा लिए गए फैसले मंदिर की सदियों पुरानी परंपराओं के खिलाफ हैं। विशेष रूप से मंदिर के दर्शन समय में बदलाव और देहरी पूजा को बंद करने का निर्णय सीधे तौर पर गोस्वामी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

दर्शन समय में बदलाव बना विवाद की जड़

याचिका में कहा गया है कि मंदिर के खुलने और बंद होने के समय में जो बदलाव किए गए हैं, वे न केवल परंपराओं के खिलाफ हैं, बल्कि इससे भगवान बांके बिहारी जी महाराज की दैनिक सेवा और विश्राम व्यवस्था भी प्रभावित होती है। मंदिर में दर्शन केवल एक सार्वजनिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक धार्मिक प्रक्रिया है, जिसमें देवता के जागने, विश्राम करने और शयन का समय तय परंपराओं के अनुसार होता है।

देहरी पूजा क्यों है इतनी महत्वपूर्ण

देहरी पूजा को बांके बिहारी मंदिर की सबसे पवित्र और विशिष्ट परंपराओं में से एक माना जाता है। याचिका के अनुसार, यह पूजा उस समय की जाती है, जब मंदिर आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहता है।

  • सुबह 6:00 बजे से 8:00 बजे तक
  • दोपहर 1:00 बजे से 3:00 बजे तक
  • रात 9:00 बजे से 10:00 बजे तक

इन समयों में गोस्वामी समुदाय द्वारा देहरी पर सुगंध, फूल, दीप और प्रार्थनाएं अर्पित की जाती हैं। भक्तों की मान्यता है कि देहरी भगवान के चरणों का प्रतीक है और इस पूजा के बिना मंदिर की सेवा अधूरी मानी जाती है।

धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी है कि देहरी पूजा को बंद करना संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। इन अनुच्छेदों के तहत प्रत्येक धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक कार्य, पूजा पद्धति और परंपराओं का पालन करने का अधिकार प्राप्त है। गोस्वामी समुदाय का कहना है कि High Power Committee को मंदिर की आंतरिक धार्मिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का हवाला

याचिका में 8 अगस्त को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का भी हवाला दिया गया है। उस आदेश में स्पष्ट कहा गया था कि समिति मंदिर की आंतरिक धार्मिक प्रथाओं जैसे पूजा, सेवा और प्रसाद वितरण में दखल नहीं देगी। इसके बावजूद दर्शन समय में बदलाव और देहरी पूजा पर रोक लगाना अदालत के आदेश की अवहेलना मानी जा रही है।

मंदिर समिति की ओर से क्या कहा गया

मंदिर समिति की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि High Power Committee ने बिना धार्मिक विशेषज्ञों से सलाह लिए ऐसे फैसले किए हैं, जो परंपराओं को नुकसान पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि नए समय-सारणी से भगवान के विश्राम और शयन का समय प्रभावित हो रहा है, जो धार्मिक दृष्टि से गंभीर विषय है।

देवता के विश्राम पर CJI की तीखी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी ने सभी का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि देवता को एक मिनट के लिए भी आराम नहीं करने दिया जा रहा है। उन्होंने इसे देवताओं का शोषण करार देते हुए कहा कि यही वह समय होता है, जब सबसे ज्यादा शोषण होता है। CJI ने यह भी कहा कि कई बार केवल वही लोग विशेष पूजा कर पाते हैं, जो मोटी रकम अदा कर सकते हैं, जबकि आम श्रद्धालुओं की आस्था पीछे छूट जाती है।

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