ईरान युद्ध का भारत की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर, तेल, महंगाई और GDP ग्रोथ में अनिश्चितता बढ़ी

पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के चलते भारत की GDP ग्रोथ घट सकती है और महंगाई बढ़ सकती है। तेल व ऊर्जा महंगे होने से उत्पादन, रोजगार और घरेलू मांग प्रभावित होगी।

ईरान युद्ध से भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। EY रिपोर्ट के अनुसार रीयल GDP लगभग 1% घट सकती है और महंगाई 1.5% बढ़ सकती है। तेल, ऊर्जा और रोजगार-प्रधान सेक्टर्स पर विशेष असर नजर आएगा।

India GDP: पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के चलते भारत की आर्थिक वृद्धि (GDP Growth) और महंगाई पर गंभीर असर पड़ सकता है। EY की इकॉनमी वॉच रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह संघर्ष अगले वित्त वर्ष तक जारी रहता है, तो भारत की रीयल GDP ग्रोथ करीब 1 फीसदी घट सकती है। साथ ही खुदरा महंगाई दर (CPI) लगभग 1.5 फीसदी तक बढ़ सकती है। यह असर विशेष रूप से तेल और ऊर्जा पर निर्भर सेक्टर्स में नजर आएगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि टेक्सटाइल, पेंट, केमिकल, फर्टिलाइजर्स, सीमेंट और टायर जैसे रोजगार-प्रधान सेक्टर्स सीधे प्रभावित होंगे। इन सेक्टर्स में आय या रोजगार में कमी से घरेलू मांग कमजोर हो सकती है। इससे न सिर्फ उत्पादन घटेगा बल्कि उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता पर भी असर पड़ेगा।

तेल और ऊर्जा बाजार में उठापटक

भारत अपनी करीब 90 फीसदी कच्चे तेल की जरूरत विदेश से पूरी करता है। इसके अलावा नेचुरल गैस और फर्टिलाइजर्स के लिए भी आयात पर निर्भरता ज्यादा है। इसलिए वैश्विक तेल बाजार में उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

EY की रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण वैश्विक कच्चे तेल और ऊर्जा बाजार में सप्लाई, भंडारण, परिवहन और कीमतों पर असर पड़ा है। इन व्यवधानों को सामान्य होने में समय लग सकता है, भले ही संघर्ष जल्द खत्म हो जाए। इससे तेल और ऊर्जा से जुड़े कई अन्य सेक्टर प्रभावित होंगे।

महंगाई और GDP पर संभावित झटका

रिपोर्ट में EY ने अनुमान लगाया है कि अगर ईरान युद्ध का असर पूरे FY27 तक बना रहता है, तो भारत की रीयल GDP ग्रोथ करीब 1 फीसदी कम हो सकती है। वहीं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर लगभग 1.5 फीसदी तक बढ़ सकती है। फरवरी 2026 में EY ने FY27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ 6.8 से 7.2 फीसदी के बीच रहने का अनुमान जताया था।

महंगाई में बढ़ोतरी का असर सीधे उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता पर पड़ेगा। तेल और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से परिवहन, उत्पादन और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं। इससे घरेलू मांग कमजोर होने की संभावना है।

काउंटर-साइक्लिकल नीति की जरूरत

EY ने कहा है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को मजबूत काउंटर-साइक्लिकल पॉलिसी अपनानी होगी। इसमें बड़े और औद्योगिक राज्यों को शामिल करना जरूरी है। इसके साथ ही FY26 में बनाए गए इकॉनमिक स्टेबलाइजेशन फंड (ESF) को और मजबूत किया जाना चाहिए। सरकार ने पहले ही 1 लाख करोड़ रुपये का ESF बनाया है, जो वैश्विक जोखिमों से निपटने में वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है।

इस फंड का उद्देश्य ऐसे समय में आर्थिक संतुलन बनाए रखना है जब तेल कीमतों में उछाल, महंगाई और वैश्विक तनाव से अर्थव्यवस्था दबाव में हो।

कच्चे तेल की कीमत में तेजी

28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 फीसदी की तेजी देखी गई है। इस तेजी का सीधा असर भारत की ईंधन कीमतों और उत्पादन लागत पर पड़ा है। महंगाई बढ़ने से घरेलू बाजार में मांग घट सकती है और विभिन्न उद्योगों की लागत बढ़ सकती है।

OECD का अनुमान

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने भी अनुमान लगाया है कि अगले वित्त वर्ष में भारत की GDP ग्रोथ घटकर 6.1 फीसदी रह सकती है। यह मौजूदा वित्त वर्ष में 7.6 फीसदी की अपेक्षित वृद्धि से कम है। OECD ने चेतावनी दी है कि वैश्विक अनिश्चितता और तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को प्रभावित कर सकती हैं।

EY ने रिपोर्ट में यह भी कहा है कि तेल और ऊर्जा की कीमतों में तेजी से रोजगार-प्रधान सेक्टर्स में आय और रोजगार घट सकता है। इससे कुल घरेलू मांग कमजोर होगी। टेक्सटाइल, फर्टिलाइजर्स और सीमेंट जैसे सेक्टर्स में उत्पादन धीमा पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरतों की खरीद क्षमता कम होगी। इससे बाजार में मांग कम होने की संभावना है और कई व्यवसायिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

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