आने वाले महीनों में महंगाई आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ा सकती है। सिस्टेमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में महंगाई दर आगामी तिमाहियों में बढ़कर 6-7 फीसदी तक पहुंच सकती है।
बिजनेस न्यूज़: भारत में आने वाली तिमाहियों के दौरान महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है। सिस्टेमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर बढ़कर 6 से 7 प्रतिशत के बीच पहुंच सकती है। यदि कीमतों में बढ़ोतरी का यह अनुमान सही साबित होता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने महंगाई को नियंत्रित करने की चुनौती बढ़ सकती है।
रिपोर्ट में मौजूदा रेपो रेट 5.50 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.50 से 7 प्रतिशत तक किए जाने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, यह विश्लेषकों का अनुमान है, न कि RBI की ओर से घोषित कोई आधिकारिक निर्णय। ब्याज दरों पर अंतिम फैसला केंद्रीय बैंक आर्थिक आंकड़ों, महंगाई के रुझान और विकास दर समेत कई कारकों का आकलन करने के बाद लेता है।
कच्चे तेल और उत्पादन लागत से बढ़ सकता है महंगाई का दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, कमजोर मानसून और अल नीनो की आशंका महंगाई के जोखिम को बढ़ा सकती है। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से परिवहन, विनिर्माण और कई अन्य क्षेत्रों की लागत प्रभावित होती है। इसका असर वस्तुओं और सेवाओं की अंतिम कीमतों पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के दौरान गैर-वित्तीय कंपनियों की इनपुट लागत में सालाना आधार पर लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि का दावा किया गया है। इसी अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 45 प्रतिशत तेजी का भी उल्लेख है। इन आंकड़ों की अवधि और गणना के आधार को प्रकाशन से पहले मूल रिपोर्ट से सत्यापित करना जरूरी है।
कंपनियां जब बढ़ती लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पातीं, तो उनके मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि वे कीमतें बढ़ाती हैं, तो उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा की वस्तुएं और सेवाएं महंगी हो सकती हैं।
परिवारों की महंगाई संबंधी उम्मीदें भी ऊंची

रिपोर्ट में RBI के घरेलू महंगाई अपेक्षा सर्वे का हवाला देते हुए कहा गया है कि सितंबर 2026 में परिवारों की औसत महंगाई अपेक्षा 9.1 प्रतिशत रही। इसका अर्थ है कि सर्वे में शामिल परिवारों को भविष्य में कीमतें बढ़ने की आशंका थी। हालांकि, महंगाई संबंधी अपेक्षाएं वास्तविक महंगाई दर से अलग होती हैं और इन्हें उसी रूप में समझना चाहिए।
खाद्य पदार्थों, ऊर्जा और उर्वरकों पर सरकारी सहायता कीमतों के दबाव को सीमित करने में भूमिका निभा सकती है। यदि ऐसी सहायता घटती है या वैश्विक स्तर पर इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो घरेलू महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
रेपो रेट बढ़ने पर होम लोन और कार लोन होंगे महंगे?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी से बैंकों की फंडिंग लागत प्रभावित हो सकती है और इसका असर ग्राहकों की उधारी दरों पर पड़ सकता है। यदि RBI ब्याज दरें बढ़ाता है, तो रेपो रेट से जुड़ी फ्लोटिंग ब्याज दर वाले होम लोन और अन्य कर्ज की EMI बढ़ सकती है या कर्ज चुकाने की अवधि लंबी हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर बैंक की नीति, लोन की शर्तों और ब्याज दर में हुए बदलाव पर निर्भर करेगा। फिक्स्ड रेट वाले कर्ज पर तत्काल असर जरूरी नहीं है।
ऐसे में कर्ज लेने वाले लोगों को अपनी मासिक आय, जरूरी खर्च और EMI के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। संभावित ब्याज दर वृद्धि को ध्यान में रखकर बजट तैयार करना भी उपयोगी हो सकता है।











