फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक पहल में शामिल होगा फिनलैंड, रूस से लगी सीमा के कारण बढ़ी अहमियत

फिनलैंड ने फ्रांस की फॉरवर्ड न्यूक्लियर डिटरेंस पहल में शामिल होने का फैसला किया है। रूस से लगी सीमा के बीच यह कदम यूरोपीय सुरक्षा के लिए अहम है।

फिनलैंड ने फ्रांस की फॉरवर्ड न्यूक्लियर डिटरेंस पहल में शामिल होने का फैसला किया है। दोनों देशों ने इसकी पुष्टि की। रूस से लगी लंबी सीमा वाले फिनलैंड का कदम यूरोपीय सुरक्षा रणनीति में बदलाव के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हेलसिंकी: फिनलैंड ने फ्रांस की ‘फॉरवर्ड न्यूक्लियर डिटरेंस’ यानी अग्रिम परमाणु प्रतिरोधक पहल में शामिल होने का फैसला किया है। दोनों देशों ने सोमवार को जारी संयुक्त बयान में इसकी पुष्टि की। रूस के साथ लंबी सीमा साझा करने वाले फिनलैंड का इस पहल में शामिल होना यूरोप की बदलती सुरक्षा रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फ्रांस की परमाणु छतरी का विस्तार

फ्रांस पिछले कुछ समय से अपने परमाणु प्रतिरोधक तंत्र को यूरोप के अन्य सहयोगी देशों तक विस्तारित करने की पहल कर रहा है। इसका उद्देश्य संयुक्त सैन्य अभ्यासों और अन्य सहयोगी व्यवस्थाओं के जरिए यूरोपीय देशों की सुरक्षा क्षमता को मजबूत करना है। दोनों देशों के संयुक्त बयान में कहा गया, “फिनलैंड ने फॉरवर्ड डिटरेंस में शामिल होने का फैसला किया है।”

फिनलैंड इस पहल में शामिल होने वाला 10वां यूरोपीय देश बन गया है। इससे पहले ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड, स्वीडन, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, ग्रीस और डेनमार्क इस व्यवस्था में शामिल हो चुके थे। नॉर्वे ने भी मई में इस पहल से जुड़ने का फैसला किया था। इस तरह फ्रांस की पहल में शामिल यूरोपीय देशों की संख्या अब 10 हो गई है।

अमेरिका की बदली NATO नीति के बीच यूरोप की नई रणनीति

फ्रांस की इस पहल की पृष्ठभूमि में यूरोप की बदलती सुरक्षा परिस्थितियां हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के NATO को लेकर रुख में बदलाव के बाद यूरोपीय देश अपनी सामूहिक सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं को लेकर नए विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

इसी व्यापक सुरक्षा पुनर्मूल्यांकन के बीच फ्रांस अपने परमाणु प्रतिरोधक तंत्र को यूरोपीय सहयोगियों के साथ साझा सैन्य अभ्यासों के माध्यम से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

फिनलैंड का इसमें शामिल होना विशेष महत्व रखता है, क्योंकि देश रूस के साथ लंबी सीमा साझा करता है और 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बाद उसकी सुरक्षा प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया था।

फ्रांस और फिनलैंड के बीच नई रणनीतिक साझेदारी

फिनलैंड का यह फैसला फ्रांस के साथ उसकी नई रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों द्वारा सोमवार को हेलसिंकी में इस साझेदारी पर हस्ताक्षर किए जाने थे।

फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने सोशल मीडिया पर इस फैसले की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह कदम “सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यूरोपीय सुरक्षा को मजबूत करने” से जुड़ा है।

स्टब ने साथ ही इस बात पर जोर दिया कि फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता NATO की परमाणु व्यवस्था को “न तो प्रतिस्थापित करेगी और न ही उसके साथ ओवरलैप करेगी।”

उन्होंने कहा कि फिनलैंड की पहली प्राथमिकता NATO और यूरोपीय संघ के हिस्से के रूप में काम करना है।

क्या है फ्रांस की ‘फॉरवर्ड डिटरेंस’ पहल?

फ्रांस की पहल के तहत यूरोप के भागीदार देशों के साथ संयुक्त अभ्यास किए जाएंगे। इसके अलावा इसमें भाग लेने वाले देशों को पहली बार सीमित अवधि के लिए फ्रांस के परमाणु हथियारों से लैस विमानों की मेजबानी करने की अनुमति मिल सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यूरोपीय देशों को फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के साथ अधिक प्रत्यक्ष रूप से जोड़ना है।

हालांकि, फ्रांस अपने परमाणु हथियारों पर राष्ट्रीय नियंत्रण बनाए रखेगा। परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का अंतिम फैसला फ्रांस के राष्ट्रपति के पास ही रहेगा।

इसका अर्थ है कि भागीदार देशों की भागीदारी बढ़ने के बावजूद फ्रांस अपने परमाणु शस्त्रागार पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार किसी अन्य देश या संयुक्त यूरोपीय संस्था को नहीं देगा।

फिनलैंड की सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव

फिनलैंड लंबे समय तक सैन्य गुटनिरपेक्षता की नीति पर कायम रहा था। लेकिन फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बाद उसकी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव आया।

इसी बदलाव के तहत फिनलैंड ने 2023 में NATO की सदस्यता हासिल की और दशकों पुरानी सैन्य गैर-संरेखण की नीति को समाप्त किया।

अब फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक पहल में शामिल होने का फैसला फिनलैंड की बदलती सुरक्षा नीति का एक और महत्वपूर्ण कदम है।

हालांकि, राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने स्पष्ट किया है कि फिनलैंड की प्राथमिक सुरक्षा व्यवस्था NATO और यूरोपीय संघ के साथ ही जुड़ी रहेगी।

परमाणु हथियारों को लेकर संसद का फैसला

फिनलैंड ने परमाणु हथियारों से जुड़े अपने कानून में भी हाल में महत्वपूर्ण बदलाव किया है।

जून में फिनलैंड की संसद ने देश में परमाणु हथियारों पर लागू व्यापक प्रतिबंध हटाने के पक्ष में मतदान किया। इस बदलाव के बाद जरूरत पड़ने पर देश की रक्षा के लिए परमाणु हथियारों को फिनलैंड में लाने, वहां से ले जाने, उनकी आपूर्ति करने या उन्हें रखने की अनुमति दी जा सकती है।

यह बदलाव फिनलैंड की रक्षा नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है। पहले देश में परमाणु हथियारों से संबंधित ऐसी गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंध था।

अब फ्रांस की फॉरवर्ड डिटरेंस पहल में शामिल होने के फैसले के साथ यह नीति यूरोपीय सुरक्षा सहयोग के व्यापक संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

रूस से लगी सीमा के कारण बढ़ी रणनीतिक अहमियत

फिनलैंड की भौगोलिक स्थिति इस पूरे घटनाक्रम को खास महत्व देती है। देश रूस के साथ लंबी सीमा साझा करता है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में रूस से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को लेकर चिंता बढ़ी है।

ऐसे में फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ना फिनलैंड के लिए सुरक्षा सहयोग का एक नया आयाम खोलता है। हालांकि, यह व्यवस्था NATO की मौजूदा सुरक्षा प्रतिबद्धताओं का विकल्प नहीं है।

फिनलैंड के राष्ट्रपति ने भी स्पष्ट किया है कि देश NATO और EU के ढांचे के भीतर अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाएगा।

यूरोप में मजबूत होती सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था

फ्रांस की पहल में अब 10 यूरोपीय देश शामिल हो चुके हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड, स्वीडन, नीदरलैंड्स, बेल्जियम, ग्रीस, डेनमार्क, नॉर्वे और अब फिनलैंड की भागीदारी से यह व्यवस्था यूरोपीय सुरक्षा चर्चा में अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। फ्रांस अपने परमाणु शस्त्रागार पर राष्ट्रीय नियंत्रण बनाए रखते हुए सहयोगी देशों के साथ अभ्यास और सैन्य सहयोग बढ़ाने की नीति अपना रहा है।

फिनलैंड का फैसला ऐसे समय में आया है, जब यूरोप अपनी सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। NATO में शामिल होने और परमाणु हथियारों से जुड़े अपने कानून में बदलाव के बाद फ्रांस की पहल से जुड़ना फिनलैंड की सुरक्षा नीति में आए व्यापक बदलाव की अगली कड़ी के रूप में सामने आया है।

कुल मिलाकर, फ्रांस की फॉरवर्ड न्यूक्लियर डिटरेंस पहल यूरोपीय देशों के बीच परमाणु सुरक्षा सहयोग का एक नया ढांचा विकसित करने की कोशिश है। फिनलैंड की भागीदारी से इस पहल का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया है, खासकर रूस के साथ उसकी साझा सीमा और यूरोप की मौजूदा सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए।

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