पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में पूर्व मेयर फिरहाद हकीम से जुड़ी व्यावसायिक इकाइयों पर जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। मामला वक्फ संपत्ति की जमीन पर कथित रूप से कारोबार संचालित किए जाने के आरोपों से जुड़ा है। 13 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, संस्थागत भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच कर रहे आयोग के अधिकारियों ने दक्षिण कोलकाता के चेतला इलाके में एक संपत्ति की तलाशी ली। इससे पहले जांच टीम फिरहाद हकीम से जुड़ी कंपनियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का निरीक्षण भी कर चुकी थी। जांच का मुख्य उद्देश्य जमीन के स्वामित्व, उसके इस्तेमाल और कारोबार से संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल करना है। हालांकि, वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जे का आरोप अभी जांच का विषय है और इसे किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
रिपोर्टों के अनुसार, जांच का संबंध टॉलीगंज सर्कुलर रोड स्थित उन व्यावसायिक इकाइयों से है, जिनमें पॉलीथीन और रसायन निर्माण से जुड़ी फैक्ट्रियां तथा मार्बल कारोबार शामिल हैं। जांचकर्ताओं को शिकायत मिली थी कि इन प्रतिष्ठानों को संचालित करने के लिए जो जमीन इस्तेमाल की जा रही है, वह जोहरा बेगम वक्फ एस्टेट की संपत्ति है और उस पर कथित रूप से अनधिकृत कब्जा किया गया है। इसी शिकायत के आधार पर जांच अधिकारियों ने संबंधित स्थानों का निरीक्षण किया और कारोबार से जुड़े रिकॉर्ड की जानकारी जुटाई।
इस मामले में जमीन की वास्तविक मिल्कियत और उसके इस्तेमाल की वैधता सबसे महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आई है। जांच अधिकारियों को यह पता लगाना है कि संबंधित भूखंड का मालिकाना हक किसके पास है, कारोबार संचालित करने वाली कंपनियों को वहां काम करने की अनुमति किस आधार पर मिली और किरायेदारी से जुड़े दस्तावेज क्या कहते हैं। इसके साथ ही जमीन के पुराने रिकॉर्ड, संपत्ति के हस्तांतरण और संबंधित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पंजीकरण की जानकारी भी जांच के दायरे में आ सकती है। इन तथ्यों की पुष्टि होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितना दम है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस जांच में कोलकाता नगर निगम के कर राजस्व और सर्वे विभाग के अधिकारियों की भूमिका भी सामने आई है। जमीन से संबंधित पुराने रिकॉर्ड और नक्शों की मदद से संपत्ति की स्थिति समझने की कोशिश की जा रही है। जांच अधिकारियों ने कथित तौर पर वर्ष 1905 का नक्शा भी मांगा है, ताकि जमीन के इतिहास और स्वामित्व संबंधी दावों का मिलान किया जा सके। पुराने राजस्व रिकॉर्ड इस तरह के विवादों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि उनसे यह समझने में मदद मिलती है कि किसी संपत्ति का ऐतिहासिक स्वरूप क्या था और समय के साथ उसके इस्तेमाल में क्या बदलाव हुए। और किराये की रसीदें तथा समझौते उनके पास हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वहां लंबे समय से कई अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे हैं। उनका पक्ष है कि वक्फ संपत्ति होने और उस पर किरायेदार के रूप में कारोबार करने के बीच अंतर है तथा किराया दिए जाने के दस्तावेज उनके दावे का समर्थन करते हैं। इन दावों और शिकायतकर्ता के आरोपों की सत्यता जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट हो सकेगी।
जांच की कार्रवाई के दौरान संबंधित कंपनियों के दस्तावेज, परिसर का इस्तेमाल और जमीन से जुड़े रिकॉर्ड अहम माने जा रहे हैं। किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान का किसी विवादित संपत्ति पर संचालित होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके संचालक ने अवैध कब्जा किया है। इसके लिए जमीन के स्वामित्व, वैध किरायेदारी, अनुमति और दूसरे प्रासंगिक दस्तावेजों की जांच जरूरी होती है। यही कारण है कि इस मामले में शिकायत और संबंधित पक्ष के जवाब दोनों को ध्यान में रखकर आगे की जांच की स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
फिरहाद हकीम पश्चिम बंगाल की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं और कोलकाता नगर निगम के मेयर के रूप में भी काम कर चुके हैं। उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से जुड़ी जांच इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि यह मामला सार्वजनिक संपत्ति, जमीन के इस्तेमाल और संस्थागत जवाबदेही जैसे मुद्दों से संबंधित है। हालांकि, किसी राजनीतिक पद पर रह चुके व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज होने या उसके कारोबार की जांच किए जाने से आरोप अपने आप सिद्ध नहीं हो जाते। जांच एजेंसी को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निष्कर्ष निकालना होगा।
वक्फ संपत्ति के इस्तेमाल को लेकर उठे इस विवाद में अब जमीन के दस्तावेज और किरायेदारी से संबंधित रिकॉर्ड विशेष महत्व रखते हैं। यदि जांच में वैध किरायेदारी के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं, तो वे फिरहाद हकीम के पक्ष को स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं। वहीं, यदि दस्तावेजों में अनियमितता या जमीन के इस्तेमाल में नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई पर विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
इस पूरे मामले में आगे की कार्रवाई के लिए जांच अधिकारियों की रिपोर्ट, जमीन के पुराने रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि तलाशी के दौरान कौन-कौन से दस्तावेज प्राप्त हुए और जांच एजेंसी ने उनके आधार पर क्या निष्कर्ष निकाला। जब तक इन बिंदुओं पर आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आती, तब तक वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जे और कारोबार से जुड़े आरोपों को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।









