जी7 देशों ने ऊर्जा संकट से निपटने के लिए एक अहम फैसला लिया है। सदस्य देशों ने अपने इमरजेंसी रिजर्व से करीब 100 मिलियन बैरल यानी 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और डीजल बाजार में जारी करने पर सहमति जताई है।
G7 Oil Reserve Release: दुनिया के प्रमुख औद्योगिक देशों के समूह G7 ने ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने आपातकालीन तेल भंडार से करीब 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और डीजल जारी करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बढ़ते दबाव और वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच इस फैसले को अहम माना जा रहा है। इसके साथ ही सदस्य देशों ने ऊर्जा निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाने का आश्वासन भी दिया है।
ऊर्जा संकट के बीच G7 का बड़ा कदम
वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच G7 देशों ने आपातकालीन तेल भंडार के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इस योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के माध्यम से करीब 100 मिलियन बैरल यानी 10 करोड़ बैरल तेल बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा। इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर ईंधन की आपूर्ति को बनाए रखना और कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद करना है।
G7 के संयुक्त बयान के मुताबिक, सदस्य देश ऊर्जा बाजार की मौजूदा परिस्थितियों पर नजर बनाए हुए हैं। तेल की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत रखने के लिए सभी देशों के बीच समन्वय स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा, देशों ने यह भी भरोसा दिलाया है कि वे ऊर्जा निर्यात पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने से बचेंगे, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बाधित न हो।
ट्रंप प्रशासन के दबाव में बना सहमति का माहौल
तेल भंडार जारी करने के फैसले के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका भी चर्चा में है। अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें घरेलू राजनीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई हैं। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने पर जोर दे रहा है।
इसी सिलसिले में अमेरिका ने यूरोपीय संघ से अपने आपातकालीन डीजल भंडार का इस्तेमाल करने की मांग की थी। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि अतिरिक्त ईंधन बाजार में आने से आपूर्ति का दबाव कम हो सकता है। वहीं, ऊर्जा निर्यात रोकने की संभावित चेतावनी ने यूरोपीय देशों की चिंताएं बढ़ा दी थीं। यूरोप की ऊर्जा जरूरतों में अमेरिकी डीजल की महत्वपूर्ण भूमिका है।
ऐसे में अमेरिका की ओर से निर्यात रोकने का कोई भी कदम यूरोपीय ऊर्जा बाजार पर असर डाल सकता है। इस परिस्थिति में ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने और संभावित संकट से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत और बढ़ गई।

अमेरिका में डीजल की कीमतें बनीं चिंता का विषय
अमेरिका में डीजल की बढ़ती कीमतें आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ परिवहन और माल ढुलाई क्षेत्र के लिए भी चुनौती बनी हुई हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शुक्रवार को अमेरिका में डीजल की औसत कीमत 6.37 डॉलर प्रति गैलन दर्ज की गई। इससे पहले 22 सितंबर को यह कीमत बढ़कर 6.52 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी।
डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। ट्रक परिवहन, कृषि, विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला जैसे कई क्षेत्र डीजल पर निर्भर हैं। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ सकती है, जिसका प्रभाव वस्तुओं की कीमतों और महंगाई पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आपातकालीन भंडार से तेल जारी करने का फैसला बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव वैश्विक मांग, तेल उत्पादन, परिवहन व्यवस्था और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।
इससे पहले भी जारी किया जा चुका है आपातकालीन तेल भंडार
वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल पहले भी किया जा चुका है। मार्च में ईरान युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के नेतृत्व में करीब 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने पर सहमति बनी थी। इसे अब तक की सबसे बड़ी समन्वित आपातकालीन तेल रिलीज के रूप में देखा गया। रणनीतिक तेल भंडार का मुख्य उद्देश्य युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं, आपूर्ति में रुकावट या अन्य अप्रत्याशित परिस्थितियों के दौरान ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। इन भंडारों का इस्तेमाल आमतौर पर तब किया जाता है, जब सामान्य बाजार व्यवस्था पर असाधारण दबाव पड़ता है।
G7 का ताजा निर्णय भी इसी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, तेल भंडार जारी करने से कीमतों में तत्काल और स्थायी गिरावट की गारंटी नहीं मिलती। बाजार की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि अतिरिक्त तेल कितनी तेजी से उपलब्ध कराया जाता है और वैश्विक ऊर्जा मांग की स्थिति क्या रहती है।











