मुजफ्फरपुर स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय यानी BRABU में पीएचडी दाखिले को लेकर राजभवन ने नया और महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। बिहार के विश्वविद्यालयों में शोध की गुणवत्ता बनाए रखने और पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में सीटों की संख्या को निर्धारित मानकों के अनुरूप रखने के लिए अब किसी एक पीएचडी प्रवेश चक्र में उपलब्ध रिक्त सीटों की एक तिहाई से अधिक सीटें नहीं भरी जाएंगी। साथ ही वर्ष 2026 तक की कुल रिक्त सीटों में अधिकतम दो तिहाई सीटों पर ही नामांकन लेने का प्रावधान किया गया है। यह निर्देश बिहार के कृषि विश्वविद्यालय और बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय को छोड़कर राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों पर लागू होगा।
राजभवन की ओर से दो अक्टूबर 2026 को पीएचडी दाखिले को लेकर सख्ती से निर्देश जारी किया गया है। इसमें विश्वविद्यालयों को पीएचडी आर्डिनेंस और पीएचडी रेगुलेशन, 2026 में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार ही नामांकन प्रक्रिया संचालित करने को कहा गया है। राजभवन के आधिकारिक आदेशों की सूची में भी दो अक्टूबर को पीएचडी दाखिले से संबंधित निर्देश दर्ज है। इसका सीधा असर बिहार विश्वविद्यालय समेत राज्य के विश्वविद्यालयों में चल रही और आगामी पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पर पड़ेगा।
नए प्रावधान के तहत किसी एक पीएचडी एडमिशन चक्र में विश्वविद्यालय अपनी उपलब्ध रिक्त सीटों में से एक तिहाई से ज्यादा सीटों पर नामांकन नहीं ले सकेगा। वहीं 2026 सत्र तक जो सीटें खाली हैं, उनमें अधिकतम दो तिहाई सीटों तक ही दाखिला लेने की अनुमति होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में उपलब्ध शोध पर्यवेक्षकों, शोध सुविधाओं और अन्य संसाधनों की वास्तविक क्षमता के अनुरूप ही शोधार्थियों का नामांकन करना है।
इसका मतलब यह नहीं है कि BRABU में पीएचडी की सभी खाली सीटें एक साथ भर दी जाएंगी। नए नियम में सीटों को चरणबद्ध तरीके से भरने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। विश्वविद्यालय को यह देखना होगा कि किसी विभाग में कितने शोध पर्यवेक्षक उपलब्ध हैं, प्रत्येक पर्यवेक्षक के अधीन पहले से कितने शोधार्थी काम कर रहे हैं और निर्धारित मानकों के अनुसार वह कितने नए शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर सकता है। इसी आधार पर पीएचडी की वास्तविक प्रवेश क्षमता निर्धारित करनी होगी।
राजभवन के निर्देश का एक महत्वपूर्ण पहलू शोध पर्यवेक्षण क्षमता है। पीएचडी में सिर्फ सीटों की संख्या तय कर देने से शोध प्रक्रिया पूरी नहीं होती। प्रत्येक शोधार्थी को शोध पर्यवेक्षक की जरूरत होती है, जो शोध विषय के चयन, शोध पद्धति, साहित्य समीक्षा, डेटा संग्रह, विश्लेषण और शोध प्रबंध तैयार करने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करता है। यदि किसी विभाग में उपलब्ध पर्यवेक्षकों की क्षमता से अधिक शोधार्थियों का नामांकन हो जाए तो शोध की निगरानी और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। नए निर्देश में इसी पहलू को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है।
बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पहले से अलग-अलग सत्रों को लेकर चलती रही है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर सितंबर 2026 में पीएचडी एडमिशन टेस्ट 2025 और 2026 से संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी। इससे स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश से जुड़ी प्रक्रिया चल रही है और नए राजभवन निर्देश का महत्व ऐसे समय में और बढ़ जाता है।
BRABU की वेबसाइट पर पीएचडी से जुड़ी पूर्व अधिसूचनाओं में भी अलग-अलग प्रवेश सत्रों की प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध है। जुलाई 2026 में विश्वविद्यालय ने पीएचडी कोर्स में प्रवेश से संबंधित प्रक्रिया के लिए अधिसूचना जारी की थी। इसके अलावा 2025 और 2026 के विषयवार रिक्तियों से संबंधित संशोधित अधिसूचना भी सितंबर 2026 में जारी की गई। अब नई व्यवस्था के तहत इन रिक्त सीटों को भरने की प्रक्रिया निर्धारित सीमा और शोध पर्यवेक्षण क्षमता के अनुसार करनी होगी।
राजभवन के निर्देश में विश्वविद्यालयों को पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखने को भी कहा गया है। विश्वविद्यालयों को लंबित नामांकन प्रक्रिया जल्द पूरी करने और आगे की प्रवेश प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से संचालित करने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि पीएचडी में प्रवेश की प्रक्रिया लंबे समय तक खिंचती न रहे और अभ्यर्थियों को प्रवेश, शोध कार्य तथा आगे की अकादमिक प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
नए नियमों में NET पात्रता को लेकर भी बदलाव किया गया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार जिस वर्ष अभ्यर्थी ने UGC-NET या संबंधित पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण की है, उसे उसी वर्ष के पीएचडी प्रवेश चक्र के लिए पात्र माना जाएगा। उदाहरण के तौर पर 2024 के प्रवेश सत्र के लिए 2024 में NET उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को पात्र माना जाएगा। इस प्रावधान का उद्देश्य प्रवेश प्रक्रिया को निर्धारित शैक्षणिक चक्र के साथ जोड़ना बताया गया है।
राजभवन ने पीएचडी सीटों के निर्धारण में पारदर्शिता पर भी जोर दिया है। विश्वविद्यालयों को विभागवार और विषयवार उपलब्ध वास्तविक शोध पर्यवेक्षण क्षमता का आकलन करना होगा। इसके बाद ही पीएचडी के लिए सीटों की संख्या निर्धारित की जानी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि केवल पुराने रिकॉर्ड में दर्ज रिक्त सीटों के आधार पर नई सीटें घोषित नहीं की जा सकतीं, बल्कि वर्तमान समय में उपलब्ध शिक्षक, शोध पर्यवेक्षक और शोध सुविधाओं को ध्यान में रखना होगा।
यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब बिहार के विश्वविद्यालयों में पीएचडी सीटों की संख्या और शोध पर्यवेक्षण क्षमता को लेकर राजभवन ने गंभीरता दिखाई है। हाल ही में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश के लिए बिना अनुमति सीटों की संख्या बढ़ाने और शोध पर्यवेक्षण क्षमता से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए उच्चस्तरीय ऑडिट कमेटी गठित की गई है। कमेटी को 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है।
इस मामले के बाद सभी विश्वविद्यालयों को यह स्पष्ट किया गया है कि पीएचडी सीटों की संख्या तय करते समय उपलब्ध संसाधनों का वास्तविक आकलन जरूरी है। राजभवन के निर्देश के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर विश्वविद्यालयों में ऑडिट के माध्यम से यह भी जांच की जा सकती है कि विज्ञापित पीएचडी सीटें संबंधित विषय में उपलब्ध शोध पर्यवेक्षण क्षमता के अनुरूप हैं या नहीं और प्रवेश प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित की जा रही है या नहीं।
BRABU के शोधार्थियों और पीएचडी प्रवेश की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए इस बदलाव का सीधा महत्व है। अब किसी विभाग में खाली पड़ी सीटों की संख्या देखकर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकेगा कि उन सभी सीटों पर एक साथ प्रवेश हो जाएगा। विश्वविद्यालय को राजभवन के नए निर्देश के अनुसार उपलब्ध सीटों, शोध पर्यवेक्षकों और निर्धारित नियमों के आधार पर प्रवेश क्षमता तय करनी होगी।
मान लीजिए किसी विषय में पीएचडी की कई सीटें लंबे समय से खाली हैं। नई व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय एक ही प्रवेश चक्र में उन सभी सीटों को भरने के बजाय निर्धारित सीमा के भीतर ही नामांकन ले सकेगा। इससे प्रवेश प्रक्रिया चरणबद्ध हो सकती है। हालांकि वास्तविक संख्या प्रत्येक विषय में उपलब्ध रिक्तियों, शोध पर्यवेक्षकों और संबंधित नियमों के आधार पर तय होगी।
शोध की गुणवत्ता को लेकर यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पीएचडी एक लंबी अकादमिक प्रक्रिया है। शोधार्थी को केवल प्रवेश परीक्षा या नामांकन तक सीमित नहीं रहना होता, बल्कि उसे शोध प्रस्ताव तैयार करने, विषय पर विस्तृत अध्ययन करने, शोध पद्धति अपनाने, डेटा जुटाने और शोध प्रबंध तैयार करने जैसी कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में पर्यवेक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। इसलिए उपलब्ध पर्यवेक्षकों की क्षमता के अनुसार ही शोधार्थियों की संख्या तय करने पर जोर दिया गया है।
राजभवन के निर्देश का एक अन्य उद्देश्य पीएचडी प्रवेश में संभावित अनियमितताओं को रोकना भी है। यदि किसी विश्वविद्यालय में उपलब्ध क्षमता से अधिक सीटें घोषित की जाती हैं या निर्धारित प्रक्रिया के बाहर सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है तो इससे प्रवेश की पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं। नए निर्देश में सीट निर्धारण को स्पष्ट, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित बनाने के लिए कहा गया है।
BRABU में पहले से पीएचडी से संबंधित कई अधिसूचनाएं जारी होती रही हैं। विश्वविद्यालय की आधिकारिक अधिसूचना सूची में 2025 और 2026 के पीएचडी एडमिशन टेस्ट से जुड़ी सूचना, विषयवार रिक्तियों की संशोधित स्थिति और पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया से संबंधित विभिन्न नोटिस दर्ज हैं। अब राजभवन के नए निर्देश के बाद विश्वविद्यालय को आगे की प्रक्रिया में नए प्रावधानों को ध्यान में रखना होगा।
छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वे पीएचडी प्रवेश से संबंधित BRABU की आधिकारिक अधिसूचनाओं पर नजर बनाए रखें। सीटों की वास्तविक संख्या, विषयवार रिक्तियां, पात्रता, प्रवेश परीक्षा या मेरिट प्रक्रिया और आवेदन की समयसीमा जैसी जानकारी विश्वविद्यालय की ओर से जारी अधिसूचना में ही अंतिम रूप से स्पष्ट होगी। केवल पुरानी सीट संख्या या अनौपचारिक जानकारी के आधार पर आवेदन संबंधी निर्णय लेना उचित नहीं होगा।
नए नियम से विश्वविद्यालयों पर भी शोध की गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी बढ़ेगी। उन्हें हर विभाग में शोध पर्यवेक्षकों की उपलब्धता का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी शिक्षक के निर्धारित क्षमता से अधिक शोधार्थी न हों। साथ ही शोध सुविधाओं, पुस्तकालय, प्रयोगशाला और विषय विशेष से जुड़ी अन्य अकादमिक जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा।
राजभवन के आदेश के बाद पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है। एक तरफ लंबित प्रवेश प्रक्रिया को समय पर पूरा करना है, दूसरी तरफ नए नियमों के अनुसार सीटों की संख्या और शोध पर्यवेक्षण क्षमता का सही आकलन भी करना है। दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाकर ही आगे की प्रक्रिया संचालित करनी होगी।
कुल मिलाकर BRABU समेत बिहार के विश्वविद्यालयों में पीएचडी प्रवेश के लिए अब सीटों की संख्या पर स्पष्ट सीमा लागू की गई है। एक पीएचडी प्रवेश चक्र में उपलब्ध रिक्त सीटों की एक तिहाई से अधिक सीटें नहीं भरी जाएंगी, जबकि 2026 सत्र तक उपलब्ध कुल रिक्त सीटों में अधिकतम दो तिहाई सीटों तक ही नामांकन लिया जा सकेगा। इसके साथ शोध पर्यवेक्षकों की उपलब्धता, उनकी निर्धारित क्षमता और विश्वविद्यालय में मौजूद शोध सुविधाओं को भी ध्यान में रखना अनिवार्य होगा। राजभवन ने इन नियमों के पालन को लेकर सभी संबंधित विश्वविद्यालयों को निर्देश दिए हैं।












