गयाजी में पितृपक्ष का धार्मिक माहौल शुरू हो गया है। पितरों के प्रति श्रद्धा और तर्पण-पिंडदान के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया है। फल्गु नदी के तट से लेकर विष्णुपद मंदिर और शहर के दूसरे प्रमुख पिंडदान स्थलों तक धार्मिक गतिविधियां बढ़ गई हैं। श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त जलांजलि, श्राद्ध और पिंडदान की प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं। गयाजी में पितृपक्ष के दौरान हर साल बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और इस बार भी प्रशासन की ओर से तीर्थयात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए व्यापक तैयारियां की गई हैं।
26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर फल्गु नदी में स्नान, श्राद्ध और गयापाल तीर्थपुरोहित की पांवपूजा की परंपरा निभाई जा रही है। इसके बाद 27 सितंबर से आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के साथ पितरों के निमित्त मुख्य श्राद्ध और तर्पण का क्रम शुरू होगा। इस तरह गयाश्राद्ध के धार्मिक कार्यक्रम कई दिनों तक अलग-अलग वेदियों और तीर्थस्थलों पर चलते हैं।
गया जी में पिंडदान की धार्मिक परंपरा में फल्गु नदी का विशेष स्थान माना जाता है। श्रद्धालु यहां स्नान और तर्पण के बाद पितरों के निमित्त कर्मकांड करते हैं। फल्गु तट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। पुरोहितों के निर्देशन में लोग अपने परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए जल अर्पित करते हैं और निर्धारित विधि के अनुसार श्राद्धकर्म करते हैं। प्रशासनिक वेबसाइट भी फल्गु नदी को गया जी के प्रमुख पिंडदान स्थलों में शामिल करती है।
पितृपक्ष के दौरान देवघाट समेत फल्गु नदी के अलग-अलग घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। दूर-दराज से आने वाले लोग अपने पुरोहितों से संपर्क कर कर्मकांड की प्रक्रिया पूरी करते हैं। कई परिवार पहले से तय परंपरा के अनुसार अलग-अलग वेदियों पर जाकर पिंडदान करते हैं। पिंडदान की प्रक्रिया कितने दिन चलेगी और किन-किन स्थानों पर कर्मकांड किया जाएगा, यह परिवार की परंपरा और पुरोहित द्वारा बताए गए विधान के अनुसार अलग हो सकता है।
विष्णुपद मंदिर गयाजी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। फल्गु नदी के आसपास स्थित इस मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जुड़ी धार्मिक मान्यता है। पितृपक्ष के दौरान यहां भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रद्धालु पुरोहितों के निर्देशन में पितरों के निमित्त पूजा और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करते हैं। प्रशासन की ओर से भी विष्णुपद क्षेत्र को पितृपक्ष के दौरान महत्वपूर्ण स्थान के रूप में तैयार किया गया है।
अक्षयवट भी गया जी के प्रमुख पवित्र स्थलों में माना जाता है। पिंडदान की धार्मिक परंपरा में इसका विशेष महत्व बताया जाता है। श्रद्धालु फल्गु और विष्णुपद क्षेत्र के साथ अक्षयवट पर भी निर्धारित कर्मकांड करते हैं। हालांकि हर श्रद्धालु के लिए सभी वेदियों पर जाना जरूरी हो, ऐसा एक समान नियम नहीं माना जा सकता। कर्मकांड का क्रम परिवार की परंपरा, पुरोहित के निर्देश और श्रद्धालु की उपलब्धता के अनुसार अलग हो सकता है।
पितृपक्ष के दौरान गया जी में केवल एक या दो स्थानों पर ही धार्मिक गतिविधियां नहीं होतीं, बल्कि कई वेदियों और तीर्थस्थलों पर अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्राद्धकर्म किया जाता है। 27 सितंबर को प्रतिपदा के अवसर पर ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामशिला, रामकुंड और काकबली जैसे स्थानों पर पिंडदान का विधान बताया गया है। इसके अगले दिन 28 सितंबर को उत्तर मानस, उदीची, कनखल, दक्षिण मानस और जिह्वालोल जैसे स्थलों पर श्राद्धकर्म किया जाएगा।
29 सितंबर को तृतीया के अवसर पर सरस्वती स्नान, पंचरत्न दान, मातंगवापी और धर्मारण्य से जुड़े श्राद्धकर्म का क्रम रहेगा। 30 सितंबर को चतुर्थी के दिन ब्रह्मसरोवर, काकबली और तारक ब्रह्म दर्शन से जुड़े धार्मिक कार्यक्रम निर्धारित हैं। इस तरह पितृपक्ष के अलग-अलग दिनों में अलग-अलग वेदियों का महत्व सामने आता है और श्रद्धालु अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कर्मकांड पूरा करते हैं।
गया जी में पिंडदान को लेकर धार्मिक मान्यता सदियों पुरानी है। श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनकी स्मृति में श्राद्धकर्म करने के लिए यहां पहुंचते हैं। फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट जैसे स्थान इस धार्मिक परंपरा के प्रमुख केंद्र हैं। पितृपक्ष के दौरान इन स्थानों पर धार्मिक गतिविधियां काफी बढ़ जाती हैं और पूरा गया शहर तीर्थयात्रियों से गुलजार हो जाता है।
देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं के कारण गयाजी में यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और शहर के प्रमुख मार्गों पर तीर्थयात्रियों की आवाजाही बढ़ रही है। प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, यातायात, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी सुविधाओं को लेकर तैयारी की है। पितृपक्ष मेले के दौरान श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए विभिन्न विभागों के बीच समन्वय किया जा रहा है।
पिंडदान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को स्थानीय धार्मिक परंपराओं और प्रशासन की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जाती है। भीड़ वाले स्थानों पर सामान और बच्चों का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। गयाजी प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर तीर्थयात्रियों के लिए सहायता और आपातकालीन संपर्क की जानकारी भी उपलब्ध कराई गई है। आधिकारिक पोर्टल पर हेल्पलाइन नंबर 9266628168 और कंट्रोल रूम नंबर 0631-2222333 दिया गया है।
पितृपक्ष के दौरान गयाजी में पूजा और पिंडदान कराने के लिए बड़ी संख्या में पुरोहित और गयापाल तीर्थपुरोहित भी सक्रिय रहते हैं। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पुरोहित से कर्मकांड की जानकारी लेते हैं। पिंडदान की सामग्री, पूजा की अवधि और अलग-अलग वेदियों पर किए जाने वाले कर्मकांड के संबंध में पहले से जानकारी लेना यात्रियों के लिए उपयोगी हो सकता है।
पिंडदान की सामग्री भी कर्मकांड के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सामान्य रूप से तिल, कुश, चावल या आटा, जल, पुष्प और पूजा से जुड़ी अन्य सामग्री का उपयोग किया जाता है। कई जगहों पर पुरोहित या स्थानीय व्यवस्था के माध्यम से पूजा सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। बाहर से आने वाले श्रद्धालु अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार आवश्यक सामग्री के बारे में पहले ही जानकारी ले सकते हैं।
गयाजी में पितृपक्ष के दौरान धार्मिक कर्मकांड के साथ-साथ शहर की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है। होटल, धर्मशाला, परिवहन, पूजा सामग्री, भोजनालय और स्थानीय दुकानों में तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ जाती है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु कई दिनों तक शहर में रुकते हैं, जिससे स्थानीय कारोबारियों और सेवा प्रदाताओं को भी काम मिलता है।
प्रशासन की ओर से इस दौरान साफ-सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने के कारण घाटों और प्रमुख धार्मिक स्थलों पर सफाई व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। स्वास्थ्य शिविर और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशासनिक तैयारियों में इन व्यवस्थाओं को शामिल किया गया है।
गया जी में पितृपक्ष मेला 25 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक आयोजित किए जाने की जानकारी प्रशासनिक पोर्टल पर दी गई है। वहीं अलग-अलग धार्मिक गणना और गयाश्राद्ध के क्रम के अनुसार 26 सितंबर को पूर्णिमा के कर्मकांड तथा 27 सितंबर से पितरों के निमित्त मुख्य श्राद्ध की शुरुआत मानी जा रही है। इस वजह से अलग-अलग रिपोर्टों में पितृपक्ष मेले और गयाश्राद्ध की शुरुआत की तारीख अलग संदर्भों में दिखाई दे सकती है।
इस बार पितृपक्ष की तिथियों में भी विशेष स्थिति बताई गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नवमी तिथि के क्षय के कारण इस बार पितृपक्ष का क्रम 14 दिनों का रहेगा। 27 सितंबर से शुरू होकर यह 10 अक्टूबर को महालया और सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। इस अवधि में अलग-अलग तिथियों पर संबंधित श्राद्धकर्म किए जाएंगे।
फल्गु नदी के तट पर श्रद्धालुओं की मौजूदगी से गयाजी में धार्मिक वातावरण बन गया है। लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए जल अर्पित कर रहे हैं और पुरोहितों के निर्देशन में निर्धारित कर्मकांड पूरा कर रहे हैं। कई परिवारों के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि अपने दिवंगत परिजनों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का अवसर भी होती है।
विष्णुपद मंदिर क्षेत्र में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ रही है। मंदिर और आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियों के कारण प्रशासन को भीड़ प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना पड़ रहा है। श्रद्धालुओं को निर्धारित व्यवस्था के अनुसार मंदिर में प्रवेश और पूजा करने की सलाह दी जाती है। मंदिर से जुड़े मौजूदा प्रवेश नियमों की जानकारी यात्रा से पहले प्राप्त करना भी जरूरी है।
पितृपक्ष के दौरान गया जी आने वाले लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने कर्मकांड का कार्यक्रम पहले से तय करें। किस दिन किस वेदी पर जाना है, कितने समय की आवश्यकता होगी और पूजा सामग्री की व्यवस्था कैसे होगी, इसकी जानकारी स्थानीय पुरोहित या आधिकारिक व्यवस्था से लेना उपयोगी रहेगा। इससे भीड़ के बीच अनावश्यक परेशानी से बचा जा सकता है।
गयाजी में पितृपक्ष की शुरुआत के साथ शहर में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ने की उम्मीद है। आने वाले दिनों में फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट, प्रेतशिला, रामशिला और दूसरी वेदियों पर धार्मिक गतिविधियां और तेज होंगी। अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्रद्धालु निर्धारित स्थानों पर जाकर श्राद्ध और पिंडदान करेंगे।
इस धार्मिक आयोजन को देखते हुए प्रशासन ने तीर्थयात्रियों की सहायता के लिए आधिकारिक पोर्टल भी सक्रिय किया है। इसमें पिंडदान से जुड़े स्थलों, यात्रा, सुविधाओं, हेल्पलाइन और खोए हुए श्रद्धालुओं की सहायता जैसी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। किसी श्रद्धालु के परिवार से बिछड़ने या किसी अन्य आपात स्थिति में आधिकारिक हेल्पलाइन और कंट्रोल रूम से संपर्क किया जा सकता है।
गयाजी में शुरू हुआ पितृपक्ष आने वाले दिनों में और व्यापक रूप लेगा। फल्गु तट पर तर्पण, देवघाट सहित विभिन्न घाटों पर श्राद्धकर्म, विष्णुपद में दर्शन और अलग-अलग वेदियों पर पिंडदान का क्रम चलता रहेगा। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के आने के साथ शहर में धार्मिक गतिविधियों के साथ प्रशासनिक तैयारियां भी लगातार बढ़ेंगी।
फिलहाल 26 सितंबर को पूर्णिमा के अवसर पर फल्गु स्नान, श्राद्ध और गयापाल तीर्थपुरोहित की पांवपूजा से धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण चरण शुरू हो गया है। 27 सितंबर से प्रतिपदा के साथ पितरों के निमित्त श्राद्ध और पिंडदान का मुख्य क्रम आगे बढ़ेगा। 10 अक्टूबर को महालया और सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस वर्ष का पितृपक्ष कार्यक्रम समाप्त होगा। गयाजी इस पूरे दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पितृकर्म का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।










