Ghamasaan Movie Review: अरशद वारसी का दमदार टैलेंट भी नहीं बचा पाया भटकी कहानी को, जानें कैसी है फिल्म

Ghamasaan Movie Review: अरशद वारसी ने शानदार अभिनय किया, लेकिन फिल्म की कमजोर और भटकी हुई कहानी असर नहीं छोड़ पाती। जानें कैसी है ‘घमासान’ और क्या इसे देखना

'द बैंडिट क्वीन' के कास्टिंग डायरेक्टर और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म 'पान सिंह तोमर' के निर्देशक तिग्मांशु धूलिया एक बार फिर डकैतों की कहानी लेकर दर्शकों के बीच लौटे हैं।

  • Movie Review: 'घमासान'
  • कलाकार: अरशद वारसी , प्रतीक गांधी , राजपाल यादव और इशिता दत्ता
  • लेखक: पीयूष सिंह और राम यश सिंह
  • निर्देशक: तिग्मांशु धूलिया
  • निर्माता: अश्विनी चौधरी और ज्योति देशपांडे
  • रिलीज डेट: 11 सितंबर 2026
  • रेटिंग: 2.5/5

Ghamasaan Movie Review: डकैतों, अपराध और बुंदेलखंड की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर निर्देशक तिग्मांशु धूलिया एक बार फिर इसी दुनिया में लौटे हैं। उनकी नई फिल्म 'घमासान' में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी जैसे प्रतिभाशाली कलाकार मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों की पृष्ठभूमि, पुलिस कार्रवाई, डकैतों का नेटवर्क और राजनीतिक दांव-पेच देखने को मिलते हैं।

फिल्म का आधार दिलचस्प है और कलाकारों की कास्टिंग भी उम्मीद जगाती है। लेकिन लगभग ढाई घंटे की यह फिल्म कहानी को जिस तरह विकसित करती है, उसमें कई जगह गति और प्रभाव की कमी महसूस होती है। नतीजा यह है कि मजबूत कलाकारों और वास्तविक लोकेशन के बावजूद फिल्म पूरी तरह से प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाती।

क्या है 'घमासान' की कहानी?

फिल्म की कहानी बुंदेलखंड और चित्रकूट के आसपास सक्रिय कुख्यात डकैत महाराज के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार अरशद वारसी ने निभाया है। इलाके में उसके नाम का खौफ है और पुलिस लंबे समय से उसे पकड़ने की कोशिश कर रही है। सरकार इस मिशन की जिम्मेदारी आईपीएस अधिकारी आदित्य को सौंपती है। प्रतीक गांधी इस पुलिस अधिकारी की भूमिका में नजर आते हैं। उन्हें स्पेशल टास्क फोर्स की कमान देकर चित्रकूट भेजा जाता है, जहां उनका सामना महाराज के नेटवर्क से होता है।

मामला तब और गंभीर हो जाता है जब महाराज के वफादारों में से एक आदित्य की पत्नी का अपहरण कर लेता है। इसके बाद कहानी पुलिस अधिकारी के निजी संघर्ष और अपराध की दुनिया के बीच घूमने लगती है। इस मिशन में आदित्य को कालिका नाम के किरदार से भी मदद मिलती है, जिसे राजपाल यादव ने निभाया है।

अरशद वारसी का किरदार सबसे बड़ी कमजोरी

अरशद वारसी को एक खूंखार डकैत के रूप में देखना फिल्म की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक था। लेकिन फिल्म उनके किरदार की क्षमता का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाती। महाराज के अतीत, उसके अपराधों और उसके आतंक की पर्याप्त झलक दर्शकों को नहीं मिलती। किरदार का खौफ मुख्य रूप से उसके गुर्गों और दूसरे पात्रों की बातों के जरिए सामने आता है। खुद महाराज को ज्यादातर समय निष्क्रिय स्थिति में दिखाया गया है और उनका किरदार कहानी के बड़े हिस्से में अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं कर पाता।

क्लाइमेक्स में उन्हें एक्शन करते हुए जरूर देखा जाता है, लेकिन तब तक फिल्म काफी आगे बढ़ चुकी होती है। अरशद जैसे अभिनेता से जिस तीव्रता और दबदबे की उम्मीद थी, फिल्म वह देने में चूक जाती है।

प्रतीक गांधी ने संभाला मोर्चा

प्रतीक गांधी को कहानी में अपेक्षाकृत ज्यादा जगह मिली है और उन्होंने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। पुलिस अधिकारी के रूप में उनका प्रदर्शन नियंत्रित और विश्वसनीय नजर आता है। खास बात यह है कि कई दृश्यों में प्रतीक बिना ज्यादा संवाद के भी अपनी भावनाएं व्यक्त करने में सफल रहते हैं। हालांकि, फिल्म में उनके किरदार के लिए भी एक्शन के पर्याप्त अवसर नहीं हैं।

राजपाल यादव को सीमित स्क्रीन स्पेस मिला है, लेकिन उन्होंने अपने हिस्से की भूमिका प्रभावी ढंग से निभाई है। इशिता दत्ता भी अपने किरदार में सहज नजर आती हैं। सहायक कलाकारों का प्रदर्शन भी कुल मिलाकर संतोषजनक है।

निर्देशन और कहानी में कहां हुई चूक?

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी स्क्रीनप्ले और पेसिंग है। पहले हिस्से में कहानी काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है, जबकि दूसरे भाग में घटनाएं अपेक्षाकृत तेजी से सामने आती हैं। फिल्म का आधार बुंदेलखंड के कुख्यात डकैत ददुआ जैसे वास्तविक अपराधी चरित्रों से प्रेरित दुनिया की याद दिलाता है। ऐसे किरदार के जरिए एक बेहद प्रभावशाली क्राइम ड्रामा तैयार किया जा सकता था, लेकिन कहानी उसके अतीत और आतंक को पर्याप्त गहराई नहीं देती।

राजनीतिक पहलू भी कहानी में अचानक प्रवेश करता है और कई बार मुख्य कथानक से ध्यान भटकाता है। यही वजह है कि फिल्म न तो पूरी तरह डकैत ड्रामा बन पाती है और न ही एक मजबूत क्राइम थ्रिलर का रूप ले पाती है।

फिल्म में क्या अच्छा है?

'घमासान' की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय है। कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को सहजता से निभाया है। इसके अलावा जंगल, गांव और चित्रकूट की वास्तविक लोकेशन फिल्म को प्राकृतिक माहौल देती हैं। बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि के बावजूद संवाद इतने कठिन नहीं हैं कि सामान्य दर्शक कहानी को समझ न सके। फिल्म का वातावरण भी इसके विषय के अनुरूप तैयार किया गया है।

देखें या नहीं?

अगर आपको डकैत, गैंगस्टर और पुलिस-क्राइम ड्रामा पसंद हैं, तो 'घमासान' को एक बार देखा जा सकता है। हालांकि, इससे बहुत बड़े सस्पेंस या लगातार रोमांच की उम्मीद करना सही नहीं होगा।

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