हैदराबाद में RSS प्रमुख मोहन भागवत का संबोधन, बोले- 'दुनिया के कल्याण के लिए भारत को विश्वगुरु बनना होगा'

हैदराबाद में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया के कल्याण के लिए भारत को विश्वगुरु बनना होगा। जानिए भाषण के मुख्य बिंदु और भागवत के विचार।

हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर अहम विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत का “विश्वगुरु” बनना किसी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का विषय नहीं, बल्कि आज की दुनिया की आवश्यकता है। 

हैदराबाद: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान भारत के विश्वगुरु बनने के महत्व पर बात की। उन्होंने कहा कि यह केवल राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक आवश्यकता है। भागवत ने जोर देकर कहा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत, प्रतिबद्धता, मानवीय मूल्यों के विकास और सामाजिक परिवर्तन पर निरंतर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने भारत की वैश्विक भूमिका में आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शन के महत्व पर भी प्रकाश डाला और स्पष्ट किया, विश्वगुरु बनना हमारी महत्वाकांक्षा नहीं है।

विश्वगुरु की अवधारणा पर जोर

मोहन भागवत ने कहा कि भारत का विश्वगुरु बनना केवल एक विचार या नारा नहीं है, बल्कि इसके पीछे निरंतर परिश्रम, सामाजिक परिवर्तन और मानवीय मूल्यों के विकास की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लक्ष्य स्वतः प्राप्त नहीं होता, बल्कि इसके लिए समाज के हर स्तर पर ईमानदार प्रयास जरूरी हैं।

उनके शब्दों में, हमें फिर से विश्वगुरु बनने का कार्य करना होगा। यह हमारी महत्वाकांक्षा नहीं है, बल्कि दुनिया की जरूरत है। लेकिन यह बिना कड़ी मेहनत के संभव नहीं है।

तकनीक और मानवता का संतुलन

अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि तकनीक का विकास अपरिहार्य है, लेकिन यह जरूरी है कि तकनीक मानवता पर हावी न हो। उन्होंने कहा कि भारत को दुनिया को यह दिखाना होगा कि तकनीकी प्रगति के बावजूद मानवीय मूल्यों की प्रधानता बनी रह सकती है।

टेक्नोलॉजी आएगी, AI आएगा, लेकिन तकनीक इंसानियत की मालिक नहीं बनेगी। इंसानियत तकनीक की मालिक रहेगी, उन्होंने कहा। उनका मानना है कि मानवीय बुद्धि और नैतिक विवेक के साथ तकनीक का उपयोग दुनिया को सकारात्मक दिशा में ले जा सकता है, न कि विनाशकारी प्रवृत्तियों की ओर।

सेवा की भावना पर विचार

मोहन भागवत ने सेवा की अवधारणा पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सच्ची सेवा वह होती है, जिसमें किसी प्रकार के प्रतिफल या पुरस्कार की अपेक्षा न हो। उन्होंने चुनावी संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार सेवा को लेन-देन की तरह देखा जाता है, जो सेवा की मूल भावना के विपरीत है।उनके अनुसार, “सेवा करने वाले का अधिकार केवल सेवा करना है। सेवा मेरा कर्तव्य है और इसके बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाज में स्थायी सकारात्मक परिवर्तन तभी संभव है, जब सेवा निस्वार्थ भाव से की जाए।

RSS प्रमुख ने कहा कि संघ का एक प्रमुख उद्देश्य व्यक्तित्व विकास है, ताकि लोग समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव ला सकें। उन्होंने दावा किया कि संघ से जुड़े स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में समाज का विश्वास अर्जित कर रहे हैं और उनके कार्यों की व्यापक सराहना हो रही है। उनके अनुसार, जब व्यक्ति अपने आचरण और कार्यों से उदाहरण प्रस्तुत करता है, तभी समाज और अंततः दुनिया का व्यवहार बदलता है।

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