शिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होते ही वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी टकराव और तेज हो गया। शनिवार को विधानसभा परिसर में दोनों दलों के विधायक हाथों में तख्तियां लेकर पहुंचे और एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन किया। दोनों पक्षों ने अपने-अपने आरोपों के साथ नारेबाजी की। शुक्रवार को सत्र के पहले दिन भी इसी मुद्दे पर सदन में जमकर हंगामा हुआ था और कार्यवाही प्रभावित हुई थी।
विधानसभा परिसर में हुए प्रदर्शन के दौरान भाजपा विधायकों ने कांग्रेस के खिलाफ वंदे मातरम् को लेकर नारे लगाए। दूसरी ओर कांग्रेस विधायकों ने भाजपा पर राष्ट्रगान से जुड़े प्रोटोकॉल और सम्मान को लेकर सवाल उठाए। इस तरह सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही दोनों दलों के बीच माहौल तनावपूर्ण नजर आया।
विवाद की जड़ कांग्रेस कार्य समिति यानी CWC के उस फैसले को लेकर है, जिसमें कांग्रेस ने वंदे मातरम् के पहले दो पदों को गाने की बात कही है। कांग्रेस की ओर से इसे 1937 के ऐतिहासिक प्रस्ताव के अनुरूप बताया गया है। वहीं भाजपा इस फैसले का विरोध कर रही है और पूरे वंदे मातरम् के गायन की मांग कर रही है।
हिमाचल विधानसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि कांग्रेस कार्य समिति का फैसला विधानसभा की कार्यवाही पर लागू नहीं हो सकता। उनका कहना था कि विधानसभा संविधान, कानून और स्थापित संसदीय परंपराओं के अनुसार चलेगी, किसी राजनीतिक दल की कार्यसमिति के प्रस्ताव के आधार पर नहीं। उन्होंने विधानसभा सत्र की शुरुआत में पूरे वंदे मातरम् के गायन की अपेक्षा जताई थी।
जयराम ठाकुर के इस बयान के बाद मामला और ज्यादा राजनीतिक हो गया। भाजपा ने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय सम्मान और देशभक्ति से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि पार्टी ने अपने ऐतिहासिक प्रस्ताव के आधार पर अपना रुख तय किया है और इसे भाजपा राजनीतिक मुद्दा बना रही है।
दरअसल, हिमाचल विधानसभा का मानसून सत्र 21 अगस्त से 3 सितंबर 2026 तक चलना है। विधानसभा के आधिकारिक पोर्टल पर भी इस सत्र की अवधि दर्ज है। शनिवार, 22 अगस्त के लिए सदन की कार्यसूची और पूर्व निर्धारित प्रश्नों की जानकारी भी उपलब्ध कराई गई है।
सत्र के पहले दिन शुक्रवार को विवाद उस समय बढ़ा जब भाजपा विधायकों ने वंदे मातरम् के गायन की मांग को लेकर आपत्ति जताई। विधानसभा अध्यक्ष की ओर से परंपरा का हवाला देते हुए बताया गया कि सदन की शुरुआत राष्ट्रगान से होती है और राष्ट्रगीत को लेकर निर्धारित परंपरा का पालन किया जाता है। इसके बावजूद भाजपा विधायकों ने विरोध किया और सदन के भीतर नारेबाजी की। बाद में कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
शनिवार को परिसर में हुए प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया कि विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है। दोनों दलों के विधायक अपने-अपने पक्ष को मजबूती से रखने में जुटे हैं। भाजपा की ओर से जहां वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस के फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं कांग्रेस ने भाजपा पर राजनीतिक मुद्दे को सदन की कार्यवाही पर हावी करने का आरोप लगाया है।
भाजपा के प्रदर्शन में विधायकों के हाथों में अलग-अलग संदेश लिखी तख्तियां दिखाई दीं। पार्टी नेताओं का कहना है कि विधानसभा जैसी संवैधानिक संस्था में राष्ट्रीय गीत से जुड़े विषय को लेकर स्पष्ट स्थिति होनी चाहिए। भाजपा का तर्क है कि किसी राजनीतिक संगठन का आंतरिक फैसला विधानसभा की स्थापित परंपरा और नियमों से ऊपर नहीं हो सकता।
दूसरी तरफ कांग्रेस का रुख यह है कि वंदे मातरम् को लेकर पार्टी का निर्णय ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ा है। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में इस विषय पर विस्तार से चर्चा के बाद 1937 के प्रस्ताव के अनुरूप शुरुआती दो पदों को गाने की बात सामने आई थी।
इस विवाद ने हिमाचल की राजनीति में एक नया मुद्दा जोड़ दिया है। मानसून सत्र में पहले से ही कई राजनीतिक और जनहित के मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के आमने-सामने आने की संभावना है। ऐसे में सत्र की शुरुआत ही वंदे मातरम् विवाद से होने के कारण आगे की कार्यवाही में भी टकराव की आशंका बढ़ गई है।
हिमाचल विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया की ओर से इससे पहले सर्वदलीय बैठक में सदन को सौहार्दपूर्ण माहौल में चलाने की अपील की गई थी। विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर भी अध्यक्ष की ओर से सदन को सहयोग और सामंजस्य से चलाने से संबंधित जानकारी उपलब्ध है।
हालांकि जमीन पर तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। सत्र के पहले ही दिन दोनों दलों के विधायकों के बीच तीखी नोकझोंक और नारेबाजी देखने को मिली। भाजपा विधायकों ने विरोध जताते हुए वॉकआउट भी किया।
वंदे मातरम् विवाद केवल हिमाचल तक सीमित नहीं है। अगस्त 2026 में कांग्रेस के CWC फैसले के बाद भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले की आलोचना करते हुए इसे देशहित के खिलाफ बताया और भाजपा की ओर से इसके विरोध की बात कही।
इसी राष्ट्रीय राजनीतिक माहौल का असर अब हिमाचल विधानसभा में भी दिखाई दे रहा है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और भाजपा विपक्ष में है। ऐसे में वंदे मातरम् का मुद्दा दोनों दलों के बीच राजनीतिक ताकत दिखाने का माध्यम भी बन गया है।
भाजपा नेता लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि विधानसभा की कार्यवाही किसी पार्टी के केंद्रीय संगठन के फैसले के आधार पर नहीं चल सकती। जयराम ठाकुर ने इसी संदर्भ में कहा था कि "देश संविधान से चलेगा, कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फरमान से नहीं।" उनके बयान का मूल तर्क यही था कि विधानसभा की अपनी संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया होती है।
कांग्रेस की ओर से इस पर जवाब देते हुए अपने निर्णय को ऐतिहासिक प्रस्ताव और पार्टी की आधिकारिक नीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी का कहना है कि वंदे मातरम् के गायन को लेकर उसका रुख किसी अपमान की भावना से नहीं बल्कि ऐतिहासिक निर्णय के संदर्भ में है।
विधानसभा परिसर में हुए प्रदर्शन के बाद अब सबकी नजर सदन की अगली कार्यवाही पर है। यदि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम रहते हैं तो आने वाले दिनों में भी नारेबाजी और हंगामे की स्थिति बन सकती है। इससे विधानसभा में प्रश्नकाल और विधायी कामकाज प्रभावित होने की आशंका भी है।
विपक्ष पहले ही सरकार पर कई मुद्दों को लेकर हमलावर है, जबकि सरकार की ओर से भी विपक्ष को सदन में जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने की अपील की गई है। ऐसे में वंदे मातरम् का विवाद यदि लंबा खिंचता है तो यह सत्र के राजनीतिक एजेंडे को भी प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल हिमाचल विधानसभा परिसर में कांग्रेस और भाजपा के प्रदर्शन ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। एक तरफ भाजपा पूरे वंदे मातरम् और विधानसभा की संवैधानिक परंपराओं की बात कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस CWC के ऐतिहासिक फैसले के आधार पर अपने रुख का बचाव कर रही है। जयराम ठाकुर का साफ कहना है कि CWC का फैसला विधानसभा में नहीं चलेगा।
अब देखना यह है कि विधानसभा अध्यक्ष और दोनों दल इस गतिरोध को किस तरह खत्म करते हैं और क्या मानसून सत्र की आगे की कार्यवाही सामान्य रूप से चल पाती है। फिलहाल इतना तय है कि वंदे मातरम् का विवाद हिमाचल विधानसभा के मानसून सत्र का पहला बड़ा सियासी टकराव बन चुका है।