हिमाचल के आंगनबाड़ी और स्कूलों में बदलेगा मेन्यू, बच्चों को मिलेगा कोदा, राजमा और चौलाई जैसे पहाड़ी भोजन

हिमाचल की नई पोषण नीति-2026 के तहत आंगनबाड़ी और स्कूलों में कोदा, राजमा, कुलथ और चौलाई जैसे पौष्टिक पहाड़ी खाद्य पदार्थ शामिल होंगे।

हिमाचल प्रदेश कैबिनेट ने सुरक्षित अन्न-निरोगी जन अभियान के तहत पोषण नीति-2026 को मंजूरी दी है। इसके अंतर्गत आंगनबाड़ी और स्कूलों के भोजन में पारंपरिक पहाड़ी खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार ने कुपोषण और एनीमिया कम करने के लिए 10 साल के लक्ष्य तय किए हैं।

शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार ने बच्चों और महिलाओं के पोषण में सुधार के लिए नई पहल की है। शनिवार को हुई कैबिनेट बैठक में सुरक्षित अन्न-निरोगी जन अभियान के तहत हिमाचल प्रदेश पोषण नीति-2026 को मंजूरी दी गई। इसके तहत आंगनबाड़ी केंद्रों और स्कूलों के भोजन में कोदा, फाफरा, राजमा, कुलथ और चौलाई जैसे पारंपरिक पहाड़ी खाद्य पदार्थों को बढ़ावा देने की योजना है। सरकार का लक्ष्य कुपोषण कम करने के साथ खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना भी है।

हिमाचल में आंगनबाड़ी और स्कूलों के मेन्यू में शामिल होंगे पहाड़ी व्यंजन

हिमाचल प्रदेश में बच्चों के पोषण को बेहतर बनाने के लिए सरकार पारंपरिक खानपान को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में हिमाचल प्रदेश पोषण नीति-2026 को मंजूरी दी गई। यह नीति सुरक्षित अन्न-निरोगी जन अभियान का हिस्सा है।

इसके तहत आंगनबाड़ी केंद्रों और स्कूलों में मिलने वाले भोजन में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करने पर जोर दिया जाएगा। कोदा, फाफरा, राजमा, कुलथ, चौलाई, चिलगोजा और मौसमी फलों जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों को पोषण योजनाओं से जोड़ने की योजना है।

इस पहल का उद्देश्य बच्चों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराने के साथ स्थानीय खाद्य परंपराओं को भी प्रोत्साहित करना है। पर्वतीय, जनजातीय और दूरदराज के क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जिला स्तर पर पोषण कार्ययोजनाएं तैयार करने पर भी जोर दिया गया है।

10 साल में कुपोषण कम करने का लक्ष्य

नई पोषण नीति में बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कई लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। सरकार अगले 10 वर्षों में बच्चों में बौनेपन की दर 10 प्रतिशत से कम, दुबलेपन की दर 5 प्रतिशत से कम और कम वजन की दर 8 प्रतिशत से नीचे लाना चाहती है।

नीति में केवल भोजन की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और उनमें जरूरी पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया है। चावल, आटा, तेल, दूध और नमक जैसे खाद्य पदार्थों में आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन ए व डी जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने की पहल की जाएगी।

खाद्य सुरक्षा की निगरानी के लिए कंडाघाट स्थित कंपोजिट टेस्टिंग लैब को उन्नत करने की योजना भी बनाई गई है। इसके साथ मोबाइल फूड एवं वाटर टेस्टिंग लैब के माध्यम से मौके पर खाद्य पदार्थों और पानी की जांच को बढ़ावा दिया जाएगा।

राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति, फिर भी कई चुनौतियां

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में बच्चों के पोषण से जुड़े कई संकेतक राष्ट्रीय औसत से बेहतर हैं। राज्य में बौनेपन की दर 20.6 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 29.3 प्रतिशत बताया गया है। इसी तरह, दुबलेपन की दर 10.4 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 19 प्रतिशत है। कम वजन की दर राज्य में 16.8 प्रतिशत और राष्ट्रीय औसत 31.8 प्रतिशत बताई गई है।

गंभीर तीव्र कुपोषण की दर हिमाचल में 2.4 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 5.2 प्रतिशत है। हालांकि, राज्य में अतिरिक्त मोटापे की दर 2.7 प्रतिशत बताई गई है, जो राष्ट्रीय औसत 1.3 प्रतिशत से अधिक है।

ये आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण के साथ बच्चों में मोटापे जैसी समस्या पर भी ध्यान देना जरूरी है। नई नीति के तहत पोषण, खाद्य सुरक्षा और स्थानीय जरूरतों को एक साथ जोड़कर काम करने की योजना है। अब इस पहल का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्धारित लक्ष्यों को जमीन पर लागू करने के लिए विभाग किस तरह काम करते हैं।

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