हिंद महासागर में डियागो गार्सिया पर विवाद, ब्रिटेन की नीति को ट्रंप ने किया खारिज

हिंद महासागर में डियागो गार्सिया पर विवाद, ब्रिटेन की नीति को ट्रंप ने किया खारिज

हिंद महासागर के डिएगो गार्सिया द्वीप को मॉरीशस को सौंपने पर ट्रंप ने ब्रिटेन की आलोचना की। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया और जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केवल ताकत को सम्मान मिलता है।

America: हिंद महासागर में अमेरिकी परमाणु अड्डे वाले डिएगो गार्सिया द्वीप को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मची है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे "भारी मूर्खता" बताया। ब्रिटेन ने पिछले साल मई में मॉरीशस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत मॉरीशस को डिएगो गार्सिया सहित पूरे चागोस द्वीपसमूह का संप्रभु स्वामी घोषित किया गया। यह समझौता दशकों पुराने विवाद का समाधान करने और द्वीप का "विऔपनिवेशीकरण" सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया था।

ट्रंप ने ब्रिटेन पर उठाए सवाल

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर पोस्ट में कहा कि अमेरिका का नाटो सहयोगी ब्रिटेन बिना किसी कारण के डिएगो गार्सिया द्वीप मॉरीशस को सौंप रहा है। उनका कहना था कि चीन और रूस इस कदम को कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने इसे ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावों से जोड़ते हुए कहा कि ब्रिटेन का यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि अमेरिका केवल ताकत को पहचानता है और उनके नेतृत्व में देश को पहले से अधिक सम्मान मिला है।

अमेरिकी सैन्य महत्व और इतिहास

डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य अड्डा 1971 में स्थापित किया गया था। यह निर्णय निक्सन प्रशासन द्वारा लिया गया था, और उस समय दक्षिण एशिया में अमेरिकी नौसैनिक शक्ति बनाए रखने के लिए जरूरी था। द्वीप का उपयोग बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारतीय नीतियों पर दबाव बनाने के लिए भी किया गया। इस दौरान परमाणु ऊर्जा से चलने वाले युद्धपोत और आधुनिक विमानवाहक पोत तैनात किए गए थे। भारत ने साहसिक कदम उठाते हुए पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश को मुक्त कराया, जिससे अमेरिका की रणनीति चुनौतीपूर्ण स्थिति में आ गई।

मॉरीशस को संप्रभुता देने में भारत की भूमिका

ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते में मॉरीशस को डिएगो गार्सिया का संप्रभुत्व लौटाने का निर्णय लिया गया। भारत ने इस प्रक्रिया में शांतिपूर्ण और कूटनीतिक सहयोग दिया। नई दिल्ली ने ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते का समर्थन करते हुए यह सुनिश्चित किया कि हिंद महासागर में क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। भारत की भूमिका से यह सुनिश्चित हुआ कि द्वीप का हस्तांतरण संतुलित और शांतिपूर्ण तरीके से होगा।

ट्रंप की चेतावनी

ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ब्रिटेन का यह कदम न केवल अमेरिकी हितों के खिलाफ है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करता है। उनका कहना था कि यह मूर्खता का कार्य है और अमेरिका को ग्रीनलैंड समेत अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी ताकत बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने यूरोपीय सहयोगियों, विशेषकर डेनमार्क और उसके साझेदारों को चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केवल ताकत का सम्मान होता है।

ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते का महत्व

ब्रिटेन और मॉरीशस द्वारा हस्ताक्षरित यह संधि पूरे चागोस द्वीपसमूह को मॉरीशस का संप्रभु घोषित करती है। इसमें डिएगो गार्सिया भी शामिल है। इस समझौते का उद्देश्य उपनिवेशवादी इतिहास को समाप्त करना और द्वीप का नियंत्रण मॉरीशस को सौंपना है। ब्रिटिश संसद द्वारा इसे अनुमोदित किए जाने के बाद द्वीप का वास्तविक नियंत्रण मॉरीशस को स्थानांतरित किया जाएगा। 

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