Holi 2026: कुछ जगहों पर नहीं होता त्योहार का शोर, जाने क्यों

Holi 2026: कुछ जगहों पर नहीं होता त्योहार का शोर, जाने क्यों

भारत में अधिकांश जगहों पर होली उत्साह और रंगों के साथ मनाई जाती है, लेकिन कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां परंपरा, आस्था और धार्मिक मान्यताओं के कारण यह त्योहार नहीं खेला जाता। उत्तराखंड, झारखंड, गुजरात और तमिलनाडु के इन स्थानों में सैकड़ों सालों से शांति और श्रद्धा के साथ दिन बिताया जाता है।

Holi 2026: भारत में होली का त्योहार आमतौर पर उल्लास और रंगों के साथ मनाया जाता है, लेकिन उत्तराखंड के Rudraprayag जिले के कुरझां और क्विली, झारखंड के Bokaro जिले के दुर्गापुर, गुजरात के Banaskantha जिले का रामसन और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में सैकड़ों सालों से होली नहीं खेली जाती। स्थानीय आस्था, धार्मिक परंपराएं और ऐतिहासिक घटनाएं इन गांवों में शांति बनाए रखने का कारण हैं। यहां के लोग परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ करते हैं और रंग खेलने से परहेज करते हैं।

उत्तराखंड और झारखंड के गांवों में क्यों नहीं खेली जाती होली?

Rudraprayag जिले के कुरझां और क्विली गांवों में करीब डेढ़ सौ साल से होली नहीं मनाई जाती। स्थानीय मान्यता है कि यहां की आराध्य देवी त्रिपुर सुंदरी को शोर और हुड़दंग पसंद नहीं है। इसी आस्था के चलते होली के दिन गांव में शांति रखी जाती है। लोग सामान्य दिन की तरह पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन रंग खेलने की परंपरा नहीं निभाते।

वहीं Bokaro जिले के दुर्गापुर गांव में भी एक सदी से अधिक समय से होली नहीं खेली जाती। कहा जाता है कि वर्षों पहले होली के दिन राजा के पुत्र और बाद में स्वयं राजा का निधन हो गया था। इसके बाद राजा के आदेश पर गांव में होली पर रोक लगा दी गई। ग्रामीण आज भी इस परंपरा को मानते हैं और इसे तोड़ना अशुभ मानते हैं।

गुजरात का गांव जहां 200 साल से नहीं पड़ा रंग

Banaskantha जिले के रामसन गांव, जिसे प्राचीन काल में रामेश्वर कहा जाता था, में करीब 200 वर्षों से होली नहीं मनाई जाती। लोक कथाओं के अनुसार भगवान राम वनवास काल में यहां आए थे। कुछ मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि संतों ने गांव को श्राप दिया था, जिसके बाद से यहां रंगों का त्योहार नहीं मनाया जाता।

ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा का उल्लंघन करने से अनहोनी हो सकती है। इसलिए होली के दिन यहां सामान्य दिनचर्या रहती है और कोई सार्वजनिक उत्सव आयोजित नहीं किया जाता।

तमिलनाडु में क्यों नहीं दिखती होली की धूम?

दक्षिण भारत के कई हिस्सों, खासकर Tamil Nadu में होली की वैसी धूम नहीं दिखती जैसी उत्तर भारत में नजर आती है। होली की पूर्णिमा के आसपास यहां ‘मासी मागम’ का पर्व मनाया जाता है, जो पितरों को समर्पित होता है।

मान्यता है कि इस दिन पूर्वजों की आत्माएं पवित्र जल में स्नान करने आती हैं। लोग नदी और तालाबों में स्नान कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ऐसे में रंग खेलने की परंपरा यहां प्रमुख नहीं है और धार्मिक अनुष्ठान को प्राथमिकता दी जाती है।

आस्था, परंपरा और स्थानीय मान्यताओं का असर

भारत विविधताओं का देश है, जहां हर क्षेत्र की अपनी अलग संस्कृति और परंपरा है। जहां एक ओर मथुरा, वृंदावन और बरसाना जैसे स्थानों पर होली कई दिनों तक मनाई जाती है, वहीं कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां इस दिन शांति और सादगी बनी रहती है।

इन स्थानों पर होली न मनाने के पीछे स्थानीय आस्था, ऐतिहासिक घटनाएं और धार्मिक विश्वास प्रमुख कारण हैं। ग्रामीण इन परंपराओं को अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हें आगे बढ़ाते आ रहे हैं।

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