देश का पहला IIT, IIT Kharagpur, एक पुराने जेल कैंप से शुरू हुआ था। आजादी के बाद तकनीकी शिक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई और बाद में यह राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बना।
IIT Kharagpur: देश में तकनीकी शिक्षा की मजबूत नींव रखने वाला IIT Kharagpur सिर्फ अपनी पढ़ाई और रिसर्च के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी शुरुआत के लिए भी जाना जाता है। यह संस्थान उस हिजली डिटेंशन कैंप में शुरू हुआ था, जहां कभी स्वतंत्रता सेनानियों को कैद रखा जाता था। बाद में यही जगह देश के पहले IIT के रूप में विकसित हुई।
तकनीकी शिक्षा की जरूरत से जन्मा पहला IIT
आजादी से पहले ही यह महसूस किया जाने लगा था कि देश को आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए बड़े तकनीकी संस्थानों की जरूरत होगी। इसी सोच के तहत 1946 में एन.आर. सरकार समिति का गठन किया गया। समिति ने सुझाव दिया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में विश्वस्तरीय तकनीकी संस्थान खोले जाएं।

समिति की सिफारिशों के आधार पर पहला IIT शुरू करने का फैसला लिया गया। शुरुआत में मई 1950 में इसकी कक्षाएं कोलकाता के एस्प्लानेड ईस्ट स्थित एक इमारत में शुरू हुईं। कुछ महीनों बाद संस्थान को खड़गपुर के हिजली इलाके में शिफ्ट कर दिया गया।
जहां कभी कैद थे स्वतंत्रता सेनानी
IIT Kharagpur का कैंपस जिस इमारत में शुरू हुआ, वह पहले हिजली डिटेंशन कैंप था। अंग्रेजों के शासनकाल में यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े युवाओं को रखा जाता था। यह जगह 1931 की उस घटना के लिए भी जानी जाती है, जब दो निहत्थे कैदियों पर गोली चलाई गई थी।
बाद में इसी ऐतिहासिक परिसर को शिक्षा और रिसर्च के केंद्र में बदल दिया गया। दुनिया में ऐसे बहुत कम संस्थान हैं, जिनकी शुरुआत किसी जेल परिसर से हुई हो। यही वजह है कि IIT Kharagpur की कहानी बाकी संस्थानों से अलग मानी जाती है।
224 छात्रों से शुरू हुआ था सफर
अगस्त 1951 में जब पहला अकादमिक सत्र शुरू हुआ, तब संस्थान में केवल 224 छात्र और 42 शिक्षक थे। शुरुआती दौर में यहां 10 विभागों के साथ पढ़ाई शुरू हुई थी। लैब, क्लासरूम और प्रशासनिक दफ्तर सभी उसी ऐतिहासिक इमारत में संचालित होते थे।
संस्थान के विकास में देश और विदेश के कई विशेषज्ञों की अहम भूमिका रही। कैंपस का डिजाइन प्रसिद्ध स्विस वास्तुकार डॉ. वर्नर मोसर के मार्गदर्शन में तैयार किया गया। धीरे-धीरे यहां आधुनिक मशीनें और उन्नत वर्कशॉप भी स्थापित की गईं।
राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का मिला दर्जा
18 अगस्त 1951 को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने IIT Kharagpur का औपचारिक उद्घाटन किया। इसके बाद संस्थान तेजी से आगे बढ़ता गया। मार्च 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नई इमारत की नींव रखी।
बाद में 15 सितंबर 1956 को संसद द्वारा पारित कानून के तहत IIT Kharagpur को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। इसके साथ ही इसे स्वायत्त विश्वविद्यालय का दर्जा भी मिला, जिसने देश में तकनीकी शिक्षा के नए दौर की शुरुआत की।












