इजरायल ने मिडिल ईस्ट में दुश्मनों का किया सफाया, अब कौन होगा क्षेत्र का प्रमुख

इजरायल ने मिडिल ईस्ट में दुश्मनों का किया सफाया, अब कौन होगा क्षेत्र का प्रमुख

इजरायल ने ईरान, हमास और हिजबुल्लाह के शीर्ष कमांडरों को निशाना बनाकर मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा दी। ईरान कमजोर हुआ और इजरायल की राजनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय पकड़ मजबूत हुई है।

World News: इजरायल ने हमास, हिजबुल्लाह, हूती और ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया है। अयातुल्ला अली खामनेई की मौत के बाद मिडिल ईस्ट की राजनीतिक और सैन्य संरचना पूरी तरह बदल गई है। अब सवाल यह उठता है कि इस क्षेत्र का नया प्रमुख कौन होगा और इजरायल कितना प्रभाव कायम कर सकता है।

हमास, हूती और हिजबुल्लाह के नेताओं के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर का सफाया इजरायल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान में हुए हमलों में 40 से अधिक शीर्ष कमांडर मारे गए हैं, जिससे ईरान की सैन्य और राजनीतिक शक्ति कमजोर हो गई है। अमेरिका के समर्थन और आधुनिक मिसाइल तकनीक के इस्तेमाल से इजरायल ने यह दिखा दिया कि वह अपने सबसे बड़े विरोधियों तक पहुंचने और उन्हें समाप्त करने में सक्षम है।

मिडिल ईस्ट में इजरायल की सैन्य श्रेष्ठता

ईरान पर किए गए हमलों के बाद इजरायल ने यह साबित किया है कि वह मिडिल ईस्ट में सैन्य रूप से सबसे सक्षम देश है। गाजा, लेबनान, यमन और ईरान में दुश्मनों को निशाना बनाकर उसने अपनी शक्ति का संदेश दिया है। इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि मिडिल ईस्ट में किसी भी बड़े प्रतिरोध का सामना करने में इजरायल सक्षम है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इजरायल की सैन्य श्रेष्ठता अब केवल प्रतिरोध को कुचलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसकी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करती है। यूएई, बहरीन और मोरक्को जैसे देश पहले ही इजरायल के साथ संबंध स्थापित कर चुके हैं, जिससे क्षेत्र में उसकी पकड़ और बढ़ गई है।

ईरान का कमजोर होना

अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया है कि ईरान अब बातचीत के लिए तैयार हो गया है। ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री ने ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने की कोशिश की थी। अयातुल्ला खामनेई लगातार परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन उनकी मौत से ईरान की प्रतिरोध क्षमता कमजोर हो गई। इस स्थिति में इजरायल की रणनीति सफल मानी जा रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार ईरान अब अपनी शर्तें थोपने की स्थिति में नहीं है। इसके विपरीत, इजरायल का दबदबा अब क्षेत्र के अन्य देशों पर भी असर डाल सकता है। यूएई, बहरीन और मोरक्को जैसे देशों के साथ स्थापित मजबूत संबंध इसके प्रमाण हैं।

यूएई, बहरीन और मोरक्को के साथ बढ़ते संबंध

यूएई और इजरायल के बीच 2020 में कई समझौते हुए थे। इन समझौतों के तहत दोनों देशों ने आर्थिक और राजनयिक संबंध मजबूत किए। इसी तरह, बहरीन ने अब्राहम समझौते के बाद इजरायल के साथ व्यापार और राजनीतिक संबंध बढ़ाए। मोरक्को ने भी अमेरिकी मध्यस्थता में इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए। इन कदमों से इजरायल की राजनीतिक पकड़ और बढ़ी है और मिडिल ईस्ट में उसकी भूमिका मजबूत हुई है।

साथ ही सऊदी अरब और यूएई जैसे देश वैश्विक निवेश को आकर्षित करने और आर्थिक आधुनिकीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। इजरायल इन देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर अपनी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहा है।

वैश्विक निवेशकों पर प्रभाव

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बावजूद इजरायल और उसके सहयोगी देशों की आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। हालांकि, लगातार सैन्य घटनाओं से वैश्विक निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए इजरायल और अमेरिका को सतत निगरानी और रणनीतिक योजना की आवश्यकता होगी।

चीन और रूस की भूमिका

ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के दौरान चीन और रूस ने सीधे हस्तक्षेप नहीं किया। उन्होंने केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हमले की निंदा की। चीन का पूरा ध्यान अपने व्यापार और आर्थिक हितों पर है और वह युद्ध में सीधा शामिल नहीं होना चाहता। रूस लंबे समय से यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है और अमेरिका के खिलाफ मिडिल ईस्ट में शामिल होने का जोखिम नहीं लेना चाहता।

Leave a comment