भारत का रक्षा निर्यात नई ऊंचाइयों पर, ब्रह्मोस के बाद ड्रोन और स्मार्ट हथियारों पर बड़ा दांव

भारत रक्षा निर्यात के नए दौर में प्रवेश कर रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल के बाद अब स्वदेशी ड्रोन, स्मार्ट हथियार और एडवांस डिफेंस सिस्टम वैश्विक बाजार में भारत की

वर्षों से भारत के रक्षा निर्यात की पहचान ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ जुड़ी रही है। यह मिसाइल इस बात का प्रतीक बन चुकी है कि भारत अत्याधुनिक रक्षा तकनीक विकसित कर उसे वैश्विक बाजार में निर्यात करने की क्षमता रखता है।

नई दिल्ली: भारत का रक्षा निर्यात अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। लंबे समय तक ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत की रक्षा क्षमताओं और वैश्विक बाजार में पहचान का प्रमुख चेहरा रही है, लेकिन अब देश की रक्षा निर्यात रणनीति इससे कहीं आगे बढ़ रही है। आधुनिक युद्ध की बदलती जरूरतों को देखते हुए भारत ड्रोन, सटीक मारक क्षमता वाले हथियार, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और ऑटोनॉमस तकनीक के क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बना रहा है।

वित्त वर्ष 2026 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश ने इस अवधि में 38,424 करोड़ रुपये के रक्षा उपकरणों का निर्यात किया, जो पिछले वित्त वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये की तुलना में करीब 62 प्रतिशत अधिक है। भारत अब 80 से ज्यादा देशों को रक्षा उत्पादों की आपूर्ति कर रहा है। वहीं, रक्षा निर्यात से जुड़ी भारतीय कंपनियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।

बदल रहा है वैश्विक रक्षा बाजार

आज का युद्ध केवल टैंक, लड़ाकू विमान और बड़ी मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध और दुनिया के अन्य संघर्षों ने दिखाया है कि छोटे लेकिन प्रभावी हथियार, ड्रोन, लॉयटरिंग म्यूनिशन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और सटीक हमला करने वाली तकनीक आधुनिक सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

दुनिया भर की सेनाएं अब ऐसे हथियारों की मांग कर रही हैं, जो कम लागत में लंबी दूरी तक प्रभावी हमला कर सकें और जरूरत पड़ने पर स्वचालित तरीके से काम कर सकें। भारत का रक्षा उद्योग इसी बदलाव को ध्यान में रखते हुए अपनी उत्पादन क्षमता और तकनीकी विकास पर जोर दे रहा है।

ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम पर भारत का फोकस

भारतीय कंपनियां अब अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। नोएडा स्थित आईजी डिफेंस द्वारा विकसित लंबी दूरी का वन-वे अटैक ड्रोन 'काल' इसी दिशा में एक उदाहरण है। कंपनी के अनुसार, यह ड्रोन लंबी दूरी तक उड़ान भरने, कई घंटे हवा में बने रहने और भारी पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है।

डिफेंस विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ड्रोन युद्ध का स्वरूप बदलने वाले हैं। कम लागत और उच्च प्रभावशीलता के कारण कई देश पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ ड्रोन आधारित समाधानों में भी निवेश कर रहे हैं। भारत के रक्षा निर्यात पोर्टफोलियो में अब पिनाका रॉकेट सिस्टम, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, एटीएजीएस तोप, स्वाति रडार, ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और आधुनिक गोला-बारूद शामिल हो चुके हैं।

हथियारों में बढ़ रही स्मार्ट तकनीक की भूमिका

आधुनिक हथियारों की ताकत केवल उनके आकार या मारक क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि उनके अंदर मौजूद सेंसर, गाइडेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर तकनीक भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों के निर्माण तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि हथियारों के अंदर इस्तेमाल होने वाली स्मार्ट तकनीक विकसित करने पर भी ध्यान दे रहा है। 

भविष्य में रक्षा निर्यात का बड़ा हिस्सा ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर और कंट्रोल टेक्नोलॉजी से जुड़ा हो सकता है, जो हथियारों को ज्यादा सटीक और प्रभावी बनाते हैं।

50 हजार करोड़ रुपये के निर्यात लक्ष्य की ओर भारत

भारत सरकार ने वर्ष 2029-30 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी कंपनियों के साथ-साथ निजी रक्षा कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2026 के रक्षा निर्यात में निजी कंपनियों का योगदान 17,353 करोड़ रुपये रहा, जबकि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने 21,071 करोड़ रुपये का योगदान दिया।

भारत पहले ही कई देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर चुका है। फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति, अर्मेनिया को पिनाका रॉकेट सिस्टम और अन्य देशों को रडार, विमान, हेलीकॉप्टर और नौसैनिक उपकरणों का निर्यात भारत की बढ़ती रक्षा क्षमता को दर्शाता है।

Leave a comment