भारत की पहली स्वदेशी MRI मशीन तैयार, रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू के सहयोग से स्टार्टअप ने रचा इतिहास

बेंगलुरु के स्टार्टअप वॉक्सेलग्रिड्स ने भारत की पहली स्वदेशी MRI मशीन विकसित की। रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू के सहयोग से बनी यह मशीन सस्ती, हल्की और ऊर्जा दक्षहै।

बेंगलुरु के स्टार्टअप वॉक्सेलग्रिड्स ने भारत की पहली स्वदेशी MRI मशीन विकसित की है। यह मशीन विदेशी विकल्पों की तुलना में सस्ती, हल्की और ऊर्जा दक्ष है। स्टार्टअप को रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू का भी सहयोग मिला।

बेंगलुरु: भारत की पहली स्वदेशी MRI मशीन विकसित करने में बेंगलुरु के स्टार्टअप वॉक्सेलग्रिड्स ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। पूरी तरह भारतीय तकनीक से तैयार यह मशीन विदेशी MRI मशीनों की तुलना में कम लागत, कम बिजली खपत और आसान रखरखाव जैसी कई विशेषताओं के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

भारतीय तकनीक से तैयार हुई पहली स्वदेशी MRI मशीन

बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप वॉक्सेलग्रिड्स ने देश की पहली स्वदेशी MRI मशीन विकसित कर चिकित्सा उपकरण निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अब तक भारत उच्च तकनीक वाली MRI मशीनों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहा है, लेकिन इस नई तकनीक के आने से देश में मेडिकल उपकरणों के स्वदेशी निर्माण को नई गति मिलने की उम्मीद है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस मशीन का डिज़ाइन और तकनीक पूरी तरह भारतीय है। कंपनी का दावा है कि यह विदेशी MRI मशीनों की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ती और 50 प्रतिशत हल्की है। इसके कारण अस्पतालों में इसकी स्थापना और रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान होगा।

कम लागत और कम बिजली खपत इसकी बड़ी खासियत

वॉक्सेलग्रिड्स द्वारा विकसित MRI मशीन को भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसमें विदेशी मशीनों की तुलना में कम केबल का उपयोग किया गया है, जिससे इसकी संरचना अधिक सरल बनती है। साथ ही यह कम बिजली की खपत करती है, जिससे संचालन लागत भी घटती है।

मशीन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें महंगी हीलियम गैस के स्थान पर नाइट्रोजन आधारित प्रणाली का विकल्प उपलब्ध कराया गया है। इससे मशीन के संचालन और रखरखाव का खर्च काफी कम हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस तकनीक से MRI जांच की कुल लागत में भी उल्लेखनीय कमी आने की संभावना है।

अर्जुन अरुणाचलम ने रखा स्वदेशी तकनीक का आधार

इस परियोजना के पीछे इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर अर्जुन अरुणाचलम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में GE हेल्थकेयर के रिसर्च सेंटर में कार्य किया। भारत लौटने के बाद IIT बॉम्बे में अध्यापन के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि देश के कई शैक्षणिक और शोध संस्थानों के पास अपनी MRI मशीनें तक उपलब्ध नहीं हैं।

उन्होंने देखा कि विदेशी कंपनियां भारतीय संस्थानों के साथ तकनीक साझा करने में रुचि नहीं दिखातीं। इसी अनुभव ने उन्हें पूरी तरह स्वदेशी MRI मशीन विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

संकट के समय मिला रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू का साथ

कोविड-19 महामारी के दौरान स्टार्टअप आर्थिक संकट से गुजर रहा था। इसी दौरान एक बड़ी विदेशी कंपनी ने साझेदारी का प्रस्ताव दिया, लेकिन कंपनी ने इसे स्वीकार नहीं किया। संस्थापकों का मानना था कि इससे स्वदेशी तकनीक पर उनका नियंत्रण कमजोर हो सकता था।

इसी कठिन दौर में उद्योगपति रतन टाटा ने स्टार्टअप पर भरोसा जताया। वर्ष 2015 में पहली मुलाकात के दौरान ही उन्होंने कंपनी को शुरुआती समर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में जोहो (Zoho) के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने भी इस पहल का समर्थन किया और भारतीय तकनीक पर आधारित MRI मशीन विकसित करने के प्रयासों में सहयोग दिया।

स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत हर वर्ष MRI मशीनों के आयात पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करता है। यदि स्वदेशी तकनीक से बनी मशीनें बड़े स्तर पर उत्पादन में आती हैं, तो इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाना आसान होगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत अभियान के लिए भी यह उपलब्धि महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कम लागत वाली स्वदेशी MRI मशीनें सरकारी और निजी अस्पतालों में जांच सेवाओं को अधिक सुलभ बना सकती हैं, जिससे मरीजों को भी कम खर्च में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने की उम्मीद है।

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